भारतीय ज्ञानपरम्परा में ज्योतिषशास्त्र का महत्त्व कालगणना, पञ्चाङ्ग निर्माण तथा शुभाशुभ मुहूर्तनिर्णय के कारण विशेष रूप से स्वीकार किया गया है। वैदिक साहित्य से लेकर वेदाङ्गज्योतिष एवं उत्तरवर्ती मुहूर्तग्रन्थों तक काल के सूक्ष्म विभाजन और उसके व्यावहारिक उपयोग का निरूपण प्राप्त होता है। किन्तु कालान्तर में ज्योतिष की अनेक अवधारणाएँ लोकमानस में भय और भ्रान्ति का कारण बन गईं। भद्रा भी ऐसी ही एक संकल्पना है, जिसे सामान्यतः मांगलिक कार्यों के लिए अशुभ तथा सर्वथा वर्जनीय मान लिया जाता है। प्रश्न यह है कि क्या भद्रा का सम्पूर्ण काल वास्तव में अशुभ है अथवा उसका फल परिस्थितियों और कार्यविशेष के अनुसार बदलता है? इस प्रश्न का समाधान पारम्परिक ज्योतिषीय ग्रन्थों के विवेकपूर्ण अध्ययन से ही सम्भव है।
भद्रा शब्द का अर्थ एवं ज्योतिषीय स्वरूप
संस्कृत वाङ्मय में ‘भद्र’ शब्द सामान्यतः शुभ, कल्याणकारी, हितकर तथा मंगलप्रद अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। वैदिक साहित्य और ब्राह्मणग्रन्थों में भी इसका प्रयोग कल्याण एवं अभ्युदय के सन्दर्भ में मिलता है। इसके विपरीत मुहूर्तशास्त्र में ‘भद्रा’ नाम से प्रसिद्ध विष्टि करण को मांगलिक कार्यों के लिए प्रतिकूल माना गया है। ज्योतिषशास्त्र में भद्रा के दो अर्थों का भेद समझना आवश्यक है। पहला, तिथि की संज्ञा और दूसरा, विष्टि नामक करण। पञ्चाङ्ग के पाँच अवयव तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण हैं। तिथियों को नन्दा, भद्रा, जया, रिक्ता तथा पूर्णा नामक पाँच वर्गों में विभाजित किया गया है। द्वितीया, सप्तमी और द्वादशी भद्रा संज्ञक तिथियाँ हैं, जिन्हें अनेक पारम्परिक मान्यताओं में विवाह, प्रतिष्ठा, यात्रा तथा राजकीय कार्यों के लिए अनुकूल माना गया है। इसके विपरीत, तिथि के आधे भाग को करण कहते हैं। ग्यारह करणों में बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज तथा विष्टि सात चर करण हैं, जबकि शकुनि, चतुष्पद, नाग और किंस्तुघ्न चार स्थिर करण हैं। विष्टि करण ही सामान्यतः भद्रा कहलाता है। मांगलिक कार्यों के निषेध से सम्बन्धित लोकमान्यता मुख्यतः इसी करण पर आधारित है।
भद्रा का काल, भेद एवं अंग-विभाजन
परम्परागत पञ्चाङ्गीय गणना के अनुसार प्रत्येक चन्द्रमास में आठ तिथ्यर्धों में विष्टि करण का विधान होता है। शुक्ल पक्ष की अष्टमी और पूर्णिमा के पूर्वार्ध तथा चतुर्थी और एकादशी के उत्तरार्ध में भद्रा मानी जाती है। कृष्ण पक्ष में सप्तमी और चतुर्दशी के पूर्वार्ध तथा तृतीया और दशमी के उत्तरार्ध में इसकी स्थिति स्वीकार की गई है। अतः भद्रा निरन्तर रहने वाला काल नहीं है; उसका वास्तविक समय करण की गणना से निर्धारित होता है। भद्रा के आठ नाम कराली, नन्दिनी, रौद्री, सुमुखी, दुर्मुखी, त्रिशिरा, वैष्णवी और हंसी बताए गए हैं। कालगत स्थिति के आधार पर दिवा-भद्रा, रात्रि-भद्रा, क्रमागत तथा अक्रमागत भद्रा का विचार भी किया जाता है। पक्षभेद से शुक्ल पक्ष की भद्रा को सर्पिणी तथा कृष्ण पक्ष की भद्रा को वृश्चिकी कहा जाता है। मुहूर्तशास्त्र में भद्रा के मुख, कण्ठ, हृदय, नाभि, कटि और पुच्छ नामक छह अंग माने गए हैं। तीस घटी के परम्परागत मध्यमान में इनके लिए क्रमशः पाँच, एक, दस, पाँच, छह और तीन घटी निर्धारित की गई हैं। विभिन्न अंगों से अलग-अलग फल सम्बद्ध किए गए हैं। मुखभाग में कार्यारम्भ को कार्यहानि, कण्ठभाग को मृत्यु, वक्षस्थल को धनहानि, नाभि को विघ्न तथा कटिभाग को बुद्धिनाश से जोड़ा गया है। इसके विपरीत, भद्रा-पुच्छ को विजय और कार्यसिद्धि के अनुकूल माना गया है। नारदीय परम्परा में प्रचलित ‘पुच्छे ध्रुवो जयः’ इसी मान्यता का परिचायक है।
भद्रा की पौराणिक उत्पत्ति और अशुभता की धारणा
भद्रा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में पौराणिक तथा मुहूर्तशास्त्रीय ग्रन्थों में विविध आख्यान मिलते हैं। एक परम्परा में उसे सूर्य और छाया की पुत्री माना गया है, जबकि वशिष्ठसंहिता से सम्बद्ध आख्यान में उसकी उत्पत्ति भगवान शिव के तृतीय नेत्र से प्रकट अग्निज्वालाओं से बताई गई है। पौराणिक वर्णनों में उसका स्वरूप अत्यन्त उग्र, विकराल तथा अग्निमय है। देवासुर-संग्राम में दैत्यों के संहार से सम्बद्ध आख्यान भी उसकी प्रचण्ड शक्ति का परिचय देते हैं। ऐसे वर्णनों ने जनमानस में भद्रा के प्रति भय की भावना को बल प्रदान किया। मुहूर्तशास्त्र में विष्टि करण के निषेधात्मक विधान के साथ जब इस पौराणिक स्वरूप को जोड़ा गया, तब भद्रा को सर्वथा अशुभ मानने की प्रवृत्ति विकसित हुई। वशिष्ठसंहिता, नारदसंहिता तथा ज्योतिर्विदाभरण जैसे ग्रन्थों में मांगलिक कार्यों के लिए भद्रा से बचने की परम्परागत मान्यता प्राप्त होती है। ‘विष्टिर्नेष्टा तु मङ्गले’ इसी विचार को व्यक्त करने वाली प्रसिद्ध उक्ति है। तथापि, शास्त्रीय निषेध का अर्थ यह नहीं है कि भद्रा प्रत्येक कार्य और प्रत्येक परिस्थिति में समान रूप से प्रतिकूल होती है। उसके फलविचार में अनेक अपवाद और विशेष नियम भी वर्णित हैं।
भद्रा कब शुभफलदायिनी मानी जाती है?
मुहूर्तशास्त्रीय परम्परा में विष्टि करण को युद्ध, शत्रुनिग्रह, दण्ड, बन्धन, अस्त्र-शस्त्र सम्बन्धी उपक्रम तथा अन्य उग्र कार्यों के लिए उपयुक्त माना गया है। शुद्धिदीपिका में इसके ऐसे उपयोगों का उल्लेख मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि भद्रा का निषेध मुख्यतः मंगलप्रधान कार्यों के सन्दर्भ में है, न कि प्रत्येक प्रकार की गतिविधि के लिए। भद्रा-पुच्छ को विजयकारक मानने के अतिरिक्त कुछ ग्रन्थों में रोगोपचार, संकट-निवारण, विवाद-निराकरण, राजदर्शन, जलयात्रा, पशुओं के संग्रह तथा कृषि से सम्बन्धित विशिष्ट कार्यों के लिए भी इसकी अनुकूलता बताई गई है। मुहूर्तगणपति की परम्परा में दुर्गापूजा, दान, दाह और घातादि कार्यों का उल्लेख मिलता है।
ज्योतिर्विदाभरण में हरितालिका-व्रत, जातकर्म, शिव-पार्वती पूजन, श्रावणी कर्म, होलिका से सम्बद्ध अनुष्ठान, जलाशयों का पूजन, पाकविधान तथा इष्टदेवता की उपासना जैसे कुछ कार्यों के लिए भी भद्रा की ग्राह्यता का उल्लेख है। इसी परम्परा में भगवान शिव की आराधना के सन्दर्भ में ‘नृणां सफलयत्यर्थं सा वा भर्गसपर्यया’ कथन प्राप्त होता है। इसका भाव यह है कि शिवोपासना के माध्यम से भद्रा की प्रतिकूलता के शमन और कार्यसिद्धि की सम्भावना मानी गई है। भद्रा की लोकगत स्थिति का विचार चन्द्रमा की राशि के आधार पर भी किया जाता है। परम्परागत मतों में इसे स्वर्ग, भूलोक और पाताल में स्थित माना गया है। कुछ मान्यताओं के अनुसार भूलोकवर्ती भद्रा अधिक सावधानी की अपेक्षा रखती है, जबकि स्वर्गवर्ती और पातालवर्ती भद्रा के लिए अनुकूल फल बताए गए हैं। विभिन्न ग्रन्थों में राशियों के वर्गीकरण में पाठभेद मिलने के कारण इस नियम का प्रयोग प्रामाणिक स्रोत की पुष्टि के बाद ही करना चाहिए।
भद्रा सम्बन्धी शास्त्रीय साहित्य का समग्र अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि उसका स्वरूप एकरेखीय नहीं है। एक ओर विष्टि करण को विवाह, प्रतिष्ठा तथा अन्य मांगलिक कार्यों के लिए सामान्यतः निषिद्ध माना गया है, तो दूसरी ओर भद्रा-पुच्छ, विशिष्ट कालगत स्थितियों तथा उग्र प्रकृति के कार्यों के लिए उसकी अनुकूलता भी स्वीकार की गई है। अतः सम्पूर्ण भद्रा काल को सर्वथा अशुभ घोषित करना शास्त्रीय परम्परा के विविध पक्षों की उपेक्षा करना होगा। भद्रा का फलनिर्णय करते समय तिथि और करण के अन्तर, करण के वास्तविक समय, उसके अंगों तथा कार्यविशेष का विचार आवश्यक है। साथ ही, विभिन्न ग्रन्थों में प्राप्त मतभेदों को समझने के लिए मूल पाठों का परीक्षण भी महत्त्वपूर्ण है। ये शुभाशुभ फल पारम्परिक ज्योतिषीय मान्यताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं; इन्हें आधुनिक वैज्ञानिक प्रमाणों से सिद्ध कारण-कार्य सम्बन्ध के समान नहीं मानना चाहिए। अन्ततः भद्रा के प्रति व्याप्त भय का समाधान अन्धस्वीकृति अथवा अन्धनिषेध में नहीं, बल्कि शास्त्रीय प्रमाणों के विवेकपूर्ण अध्ययन में निहित है। यही दृष्टिकोण लोकभ्रान्तियों के परिमार्जन और भारतीय ज्योतिषीय परम्परा के संतुलित पुनर्पाठ का आधार बन सकता है।