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Thursday, 13 September 2018

वैवाहिक समस्याएँ और समाधान(ज्योतिषशास्त्र)

वैवाहिक समस्याओं के लिए मुख्य रूप से विभिन्न ग्रह ही उत्तरदायी हैं। अतः इन ग्रहों के शान्ति हेतु विविध मंत्रों का प्रयोग किया जा सकता है-
 
* सूर्य
तान्त्रिक मन्त्र- 'ऊँ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः'
पौराणिक मन्त्र-'जपाकुसुमसङ्काशं काश्यपेयं महाद्युतिम्।
तमोऽरिं सर्वपापध्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम्।।'
जप संख्या- 7000
रत्न- माणिक्य
* चंद्र
तान्त्रिक मन्त्र- 'ऊँ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः'
पौराणिक मन्त्र- 'दधिशघ्खतुषाराभं क्षीरोदार्णवसम्भवम्।
नमामि शशिनं सोमं शम्भोर्मुकुट भूषणम्।।'
जप संख्या- 11000
रत्न- मोती
* मंगल
तान्त्रिक मन्त्र- 'ऊँ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः'
पौराणिक मन्त्र- 'धरणीगर्भसम्भूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम्।
कुमारं शक्तिहस्तं च मंगलं प्रणमाम्यहम्।।'
जप संख्या- 10,000
रत्न- मूंगा
* बुध
तान्त्रिक मन्त्र- 'ऊँ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः'
पौराणिक मन्त्र- 'प्रियङ्गुकलिकाश्यामं रूपेणाप्रतिमं बुधम्।
सौम्यं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम्।।'
जप संख्या- 9,000
रत्न- पन्ना
* गुरू
तान्त्रिक मन्त्र- 'ऊँ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरूवे नमः'
पौराणिक मन्त्र- 'देवानां च ट्टषीणां च गुरूं कांचनसन्निभम्।
बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम्।।'
जप संख्या- 19,000
रत्न- पुखराज
* शुक्र
तान्त्रिक मन्त्र- 'ऊँ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः'
पौराणिक मन्त्र- 'हिमकुन्द मृणालाभं दैत्यानां परमं गुरूम्।
सर्वशास्त्रप्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम्।।'
जप संख्या- 16,000
रत्न- हीरा
* शनि
तान्त्रिक मन्त्र- 'ऊँ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः'
पौराणिक मन्त्र- 'ऊँ नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।
छाया मार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्।।'
जप संख्या- 23,000
रत्न- नीलम
* राहु
तान्त्रिक मन्त्र- 'ऊँ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः'
पौराणिक मन्त्र- 'ऊँ अर्धकायं महावीर्यं चन्द्रादित्यविमर्दनम्।
सिंहिकागर्भसम्भूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम्।।'
जप संख्या- 18,000
रत्न- गोमेद
* केतु
तान्त्रिक मन्त्र- 'ऊँ प्रां प्रीं प्रौं सः केतवे नमः'
पौराणिक मन्त्र- 'ऊँ पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रहमस्तकम्।
रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम्।।'
जप संख्या-17,000
रत्न- लहसुनिया
वैवाहिक कष्टकारक शनि के उपाय लालकिताब
- सफेदे का पत्ता अपनी जेब में रखें।
- ताँबे, स्टील या लोहे के पात्र में रखा जल पीएँ।
- आटे की गोलियाँ मछलियों को खिलाएँ।
- काले उड़द (400 ग्राम) जल में प्रवाह दें।
- भोजन का पहला ग्रास गाय को दें।
- शनिवार सायंकाल में उड़द दाल की खिचड़ी अवश्य खाएँ।
वैवाहिक विलम्ब व प्रतिबन्ध के उपाय
* अग्नि महापुराण के 18वें अध्याय में वर्णित गौरी प्रतिष्ठा विधि का प्रयोग करें।
* ‘‘ऊँ क्लीं विश्वासुर्नाम गन्धर्वः कन्यानामधिपतिः लभामि देवदत्तां कन्यां सुरूपां सालंकारां तस्मै विश्वावसवे स्वाहा’’
इस गन्धर्वराज मन्त्र का दस हजार जप करें।
* पुरूषों के शीघ्र विवाह के लिए अधोलिखित मन्त्र का 108 बार जप करे-
‘‘पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्यानुसारिणीम्।
तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्।।
* कनकधारा स्तोत्र का 21 पाठ 90 दिन तक करें।
* श्रीरामदरबार चित्र का पञ्चोपचार पूजन के बाद निम्नलिखित दोहे का 21 बार जप करें-
‘‘तब जनक पाइ वशिष्ठ आयसु ब्याह साज संवारि कै।
मांडवी श्रुतिकीरति उरमिला कुँअरि लई हँकारि कै।।’’
* इस सन्दर्भ में शुक्रवार को किया जानेवाला माँ गौरी का व्रत भी प्रशस्त माना गया है। निराहार व्रत के बाद सायंकाल पंचमुखी दीपक जलाएँ। पुनः अधोलिखित मन्त्र का 108 बार जप करें-
‘‘बालार्कायुतसत्प्रभां करतले लोलाम्बमालाकुलां मालां सन्दधतीं मनोहरतनुं मन्दस्मिताधोमुखीम्।
मन्दं मन्दमुपेयुषीं वरयितुं शम्भुं जगन्मोहिनीं, वन्दे देवमुनीन्द्रवन्दितपदाम् इष्टार्थदां पार्वतीम्।।’’
* वैवाहिक विलम्ब अथवा प्रतिबन्ध योगों में शनि की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अतः ऐसी परिस्थिति में निम्नलिखित मंत्र का प्रयोग शीघ्र ही फल देता है-
‘‘कोणस्थः पिंगलों बभ्रुः कृष्णो रौन्द्रोऽन्तको यमः। सौरिः शनैश्चरो मन्दः पिप्पलाश्रय संस्थितः।।
एतानि शनि-नामानि जपेदश्वत्थसन्निधौ।
शनैश्चरकृता पीड़ा न कदापि भविष्यति।।’’
शनिवार को सायंकाल पीपल वृक्ष के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएँ, और उपरोक्त मन्त्र का 36 बार जप करें।
* योग्य पुरोहित के सन्निध्य में अत्यन्त प्रभावशाली ‘शनि-पाताल क्रिया’ का अनुष्ठान कराएँ।
यदि जन्माङ्ग में मंगल दोष विद्यमान हो और इस कारण से विवाह में विलम्ब हो रहा हो तो अधोलिखित उपाय शीघ्र ही फल प्रदान करते हैं-
मंगल चण्डिका स्तोत्र का 21 पाठ नित्य करें-
‘रक्ष रक्ष जगन्मातर्देवि मंगलचण्डिके।
हारिके विपदां राशेः हर्षमंगलकरिके।।
हर्षमंगलदक्षे च हर्षमंगलदायिके।
शुभे मंगलदक्षे च शुभे मंगलचण्डिके।।
मंगले मंगलार्हे च सर्वमंगलमंगले।
सदा मंगलदे देवि सर्वेषां मंगलालये।।’’
- मंगलस्तोत्र का नित्य 21 बार जप करें।
- सौभाग्याष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र का पाठ करें।
- मंगल यन्त्र की विधिपूर्वक स्थापना करें।
- योग्य पुरोहित के द्वारा कन्या का कुंभ अथवा विष्णु विवाह अत्यन्त गोपनीय तरीके से करवाएँ। गोपनीयता ही इस प्रयोग के सफलता की कुञ्जी होती है।
- सौन्दर्य लहरी (श्लोक 1-27) का पाठ करें।
- सावित्री व्रत का सश्रद्धा अनुष्ठान करें।
- सोंठ, सौंफ, मौलसिरी के फूल, सिंगरक, मालकंगनी और लाल चन्दन समभाग लें। इसे जल में मिलाकर मंगलवार को स्नान करें।
- बेल, जटामांसी, लाख के फूल, हिंगलू, बल, चन्दन और मूवला औषधियों को पानी में मिलाकर मंगलवार को स्नान करें।
लाल किताब के उपाय-
* मंगलवार को रेवडि़याँ या बताशे बहते हुए जल में प्रवाहित करें।
* तुलसी के पत्ते व काली मिर्च का सेवन करें।
* मंगलवार को गुड़ व मसूर की दाल अवश्य खाएँ।
* गाय को गुड़ या चीनी मिली रोटियाँ खिलाएँ।
* तन्दूर की मीठी रोटियों का दान करें।
* बन्दरों को जलेबी, शकरपारे आदि खिलाएँ।
वैवाहिक विघटन से बचाव : लाल किताब उपाय
* यदि कन्या के जन्माङ्ग में वैवाहिक विघटन, वैधव्य, पार्थक्य आदि के योग बन रहे हों तो अधोलिखित उपचार करें। विवाहोत्सव में कन्यादान के समय यह प्रयोग करना श्रेयस्कर होता है। जन्माङ्ग में जो ग्रह वैवाहिक कष्ट के लिए उत्तरदायी हो उस ग्रह से संबन्धित रत्न अथवा धातु के बराबर वजन वाले दो टुकड़े लें। कन्यादान का संकल्प लेते समय ये दोनों टुकड़े कन्या के दाहिने हाथ में रखें। कन्यादान तथा विवाह समाप्ति के बाद इनमें से एक टुकड़ा बहते हुए जल में प्रवाहित करें, जबकि दूसरा टुकड़ा अथवा वस्तु कन्या अपने पास आजीवन संभालकर रखे। यह वस्तु जब तक कन्या के पास रहेगी वह तथा उसका वैवाहिक जीवन सुरक्षित रहेगा।
* बुध खाना नं. 12 में हो कर कष्ट उत्पन्न कर रहा हो तो विवाह के समय स्टील के बने बिना जोड़वाले दो छल्ले लें। एक जातक को पहनाएँ तथा दूसरा जल प्रवाह दें।
* शुक्र खाना नं. 4 में रहकर कष्टकारक हो तो स्त्री से चार महीने के अन्दर दुबारा विवाह करें।
* कन्यादान के समय कन्या को चाँदी की ईंट दें।
* बृहस्पति कृत अशुभ से बचाने के लिए कन्या को शुद्ध सोने का सिक्का दें।
* वैवाहिक विघटन से बचने के लिए विवाह के समय ताँबे के बरतन में साबुत हरी मूंग भरें। ढक्कन बंद करें और संकल्पपूर्वक कन्या का भाई अथवा पिता इसे जल प्रवाह दे।
व्रत
* सोलह सोमवार के व्रत निष्ठापूर्वक करें।
* संतोषी माता का व्रत भी इस दृष्टि से आश्चर्यजनक फल देने वाला है।
* वट सावित्री का व्रत करें।
* मंगलागौरी व्रत व पूजन का अनुष्ठान करें।
विशेष उपाय शीघ्र विवाह हेतु (अनुभूत)
काफी उपाय करने के बाद भी यदि कन्या का विवाह न हो रहा हो तो इस प्रयोग को अवश्य करें। किसी भी मंगलवार के दिन कन्या निराहार व्रत करे। पीपल के 108 पत्ते प्रातःकाल तोड़ लाएँ। किसी सिद्ध हनुमान मंदिर में जाकर हनुमान जी के विग्रह के समक्ष बैठ जाएँ। वहीं केसर की स्याही बनाएँ तथा लाल चन्दन की कलम से पीपल के पत्तों पर ‘राम’ लिखें। कन्या मौली ले और इन पत्तों की माला बना लें। फिर हनुमान जी के सामने हाथ जोड़कर कहें- ‘‘मेरा विवाह आप शीघ्र करा दें, अन्यथा आज से 108 वें दिन आकर यही वरमाला आपको पहना दूंगी।’’ इसके बाद कन्या वापस मंदिर से चली जाए और वापस मुड़कर न देखे। इस प्रयोग के बाद कन्या का विवाह अतिशीघ्र हो जाता है।
* शिवरात्रि के दिन जिस मंदिर में शिव पार्वती विवाह का अनुष्ठान हुआ हो। कन्या वहां जाय और विवाह की पूरी विधि को देखे। इस विवाहोत्सव में ‘लाजा’ (खील) भी बिखेरे जाते हैं। कन्या प्रातःकाल मंदिर जाए और वहां से इन खील के 11 दाने चुन कर खा ले। शीघ्र विवाह का योग बनेगा।
* रामचरितमानस के शिव पार्वती विवाह प्रसङ्ग का 11 सोमवार तक सश्रद्धा पाठ करें।
" श्रीरामजानकी के विवाह प्रसङ्ग का पाठ भी आश्चर्यजनक सफलता देता है।
* यदि कालसर्पयोग के कारण विवाह में विलम्ब हो रहा हो तो वैदिक विधि से इस दोष की शान्ति घर में करवाएँ। शुद्ध स्वर्ण के आठ नाग (सवाग्राम प्रति) बनवाकर जल में प्रवाह दें।
वैवाहिक कलहपूर्ण जीवन से मुक्ति
* इन परिस्थितियों को उत्पन्न करने वाले ग्रहों की पहचान योग्य ज्योतिषी से करवाने के बाद उत्तरदायी ग्रहों की शान्ति करवाएँ।
* पति की अवहेलना तथा तिरस्कार से पीडि़त कन्याएँ अधोलिखित मन्त्र का 108 बार जप नित्य करें। आश्चर्यजनक फल शीघ्र ही प्राप्त होंगे-
‘‘अभित्वा मनुजातेन दधामि मम वासना।
यशसो मम केवलो नान्यसा कीर्तयश्चन।।
यथा नकुलो विच्छिद्य संदधात्यहिं पुनः।
एवं कामस्य विच्छिन्नं से धेहि वो यादितिः।।
ऊँ क्लीं त्र्यम्बकम् यजामहे सुगन्धिम् पतिवेदनम्।
उर्वारूकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् क्लीं ऊँ।।’'
संपूर्ण जप काल में घी का दीपक प्रज्जवलित रखें।
शीघ्र फलदायक शाबर मन्त्र
यदि किसी पराई स्त्री अथवा पर पुरूष के कारण वैवाहिक जीवन विषाक्त हो रहा हो तो यह प्रयोग करें-
‘‘ओम् सत्यनाम आदेश गुरू को, लौंग-लौग मेरा भाई, इन्हीं लौंग ने शक्ति चलाई पहली लौंग राती मती, दूजी लौंग जोबन मती, तीजी लौंग अंग मरोड़े, चौथी लाैंग दोऊ कर जोड़े, चारों लौंग जो मेरी खाय---------- के पास से --------------- के पास आ जाय, गुरू की शक्ति मेरी भक्ति, फुरोमन्त्र ईश्वरी वाचा।’’ चार साबुत लौंग लें। उपरोक्त मन्त्र को 108 बार पढ़कर इस लौंग को खिला दें। पहले खाली स्थान में परस्त्री या परपुरूष का नाम हो जबकि दूसरे खाली स्थान में उपासक अपना नाम रखें।
रत्नधारण व रूद्राक्ष
* वैवाहिक विलम्ब के सन्दर्भ में गणेश रूद्राक्ष धारण करना चमत्कारिक फल देता है।
* वैवाहिक सुख हेतु बृहस्पति तथा शुक्र सर्वाधिक महत्वपूर्ण माने जाते हैं। जहाँ वैवाहिक जीवन के आरम्भ हेतु बृहस्पति उत्तरदायी हैं। वहीं शुक्र शय्या सुख व शारीरिक सुख प्रदान करते हैं। इनसे सम्बन्धित शान्ति उपाय सुखद वैवाहिक जीवन की कुञ्जी सिद्ध होती है।
* वैवाहिक विलम्ब व प्रतिबन्ध आदि परिस्थिति में पीला पुखराज (निर्दोष) साढ़े सात रत्ती का लें। स्वर्ण की मुद्रिका में बनवाकर गुरूवार के दिन तर्जनी अंगुली में धारण करें।
* शारीरिक अक्षमता आदि के कारण वैवाहिक जीवन नष्ट हो रहा हो तो हीरा (न्यूनतम एक कैरेट) धारण करेे।
* गौरी शंकर रूद्राक्ष विधि-पूर्वक धारण करने से वैवाहिक जीवन की विसंगतियों का नाश सहज ही हो जाता है।
* जन्माङ्ग में यदि वैधव्य या विधुर होने का योग हो तो एकमुखी रूद्राक्ष स्वर्ण में जड़वाकर धारण करें।
* जीवन संबंधी संकट हो तो महामृत्युञ्जय मंत्र का अनुष्ठान योग्य पुरोहित के निर्देश में करें।

विविध वैवाहिक समस्याएँ एवं ज्योतिषशास्त्रीय निदान

       स्त्री तथा पुरूष के मध्य का आकर्षण, प्रेम, स्नेह तथा रागात्मक सम्बन्ध सृष्टि के आरम्भ से लेकर आज तक विद्यमान है। इसी रागात्मक आकर्षण को विवाह नामक संस्था के उदय का कारण माना जाता रहा है। स्त्री-पुरूष के मध्य संपर्क तथा शारीरिक निकटता तो आदि काल से ही अस्तित्व में था, परन्तु इस  संबध को मर्यादित रखना ही विवाह का मूल उद्देश्य है। जहां आरम्भ में विवाह हेतु कोई आयु सीमा नहीं थी, वहीं कालान्तर में विवाह के लिए स्त्री तथा पुरूष की आयु का निर्धारण किया गया। यह निर्धारण राजकीय या शासकीय न होकर सामाजिक था। वैवाहिक आयु-सीमा का यह सामाजिक निर्धारण आज भी देखा जा सकता है। क्षेत्र-जाति-समूह आदि के आधार पर इसमें विविधता भी है। प्रत्येक माता-पिता अपनी संतति के विवाह के विषय में काफी सजग रहते हैं। परन्तु काफी प्रयास के बाद भी जब सभी योग्यताओं से पूर्ण पुत्र अथवा पुत्री के विवाह की संभावना क्षीण होने लगती है, तब उस अभिभावक तथा उनकी संतति को होने वाली पीड़ा का अनुमान लगा पाना भी दुष्कर होता है। जबकि कुछ परिस्थितियों में यह देखा गया है कि विवाह तो बड़ी शीघ्रतापूर्वक और सहजता से हो गया, परन्तु विवाह के बाद नवविवाहित दम्पत्ति का जीवन कष्टप्रद तथा कलहपूर्ण हो जाता है। विवाह से जुड़ी इन समस्त समस्याओं को हम वैवाहिक विलम्ब, विवाह प्रतिबन्ध, वैवाहिक कलह, तलाक, वैधव्य-विधुरता आदि में विभाजित कर सकते हैं। मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन ग्रह-योगों से ही निर्धारित होता है, अतः इन दुःखद तथा कष्टप्रद परिस्थितियों के लिए भी विभिन्न ग्रहयोगों को ही उत्तरदायी मानना होगा। संतोष का विषय यह है कि इन समस्याओं के ज्योतिषीय समाधान (वैदिक, तांत्रिक, मंत्र, यंत्र, व्रत, रूद्राक्ष, रत्न, लाल किताब के उपाय, घरेलू टोटके) भी उपलब्ध हैं। किसी भी समस्या से मुक्ति के लिए यह आवश्यक है कि समस्या के मूल कारण को समझा जाय और फिर उसे दूर करने के उपाय किए जाएँ। इस सन्दर्भ में भी हमें इसी प्रक्रिया का आश्रय लेना होगा। विवाह से जुड़ी अलग-अलग समस्याओं के लिए विभिन्न ग्रहस्थितियाँ या ग्रहयोग उत्तरदायी होते हैं। अतः आवश्यक यह है कि पहले इन समस्याओं के कारणों का अन्वेषण किया जाय और फिर उनसे मुक्ति के उपायों पर दृष्टिपात किया जाय।

वैवाहिक विलम्ब के लिए उत्तरदायी ज्योतिषीय ग्रहयोग- जन्मपत्रिका के विभिन्न भावों के साथ-साथ, भावों के आधिपति ग्रह तथा उनका अन्य ग्रहों के साथ सम्बन्ध आदि कारक ही इस समस्या के जनक माने जा सकते हैं। कुछ ऐसे ही ग्रहयोग निम्नलिखित हैं-
* जन्मांग में मंगलीक दोष की उपस्थिति। अर्थात् लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम तथा द्वादश भाव में मंगल हो।
* सप्तम भाव अथवा सप्तमेश से शनि का सम्बन्ध हो।
* सूर्य लग्न अथवा सप्तम भाव में हो।
ऽ जन्मांग में कालसर्पयोग की उपस्थिति विवाह में पर्याप्त विलम्ब का कारण बनती है।
* शुक्र द्वितीय भाव में हो तथा द्वितीयेश मंगल के प्रभाव में हो।
* शनि सूर्य के साथ युति या दृष्टि सम्बन्ध बना रहा हो।
* शनि यदि उच्चस्थ हो पर लग्नेश या योगकारक न हो।
* मंगल तथा शुक्र साथ हो तथा इस पर शनि की दृष्टि हो।
* शुक्र चतुर्थ भाव में हो तथा बुध षष्ठस्थ हो।
* सूर्य तथा शनि सम सप्तक में हों।
* नवमेश तृतीय भाव में हो तथा सप्तमेश नवम भाव में हो।
* चन्द्र तथा शुक्र एक साथ हों अथवा परस्पर सप्तम भाव में हों।
* शनि वक्री हो तथा चतुर्थेश अथवा सप्तमेश होकर पाप प्रभाव में हो।
* वक्री शनि का प्रभाव द्वितीय भाव, द्वितीयेश, सप्तम भाव अथवा सप्तमेश पर हो।
* सूर्य शुक्र की राशियों (वृष, तुला) में हो तथा शुक्र सिंह राशि में हो।
* चन्द्रमा और शनि एक दूसरे की राशियों या समसप्तक में हों।
* सप्तम भाव में कर्क राशि हो और वहां शनि और चन्द्र के मध्य युति सम्बन्ध हो।
* शनि एवं मंगल एक दूसरे को पूर्ण दृष्टि से देख रहे हों अथवा उनमें राशि विनिमय हों।
* सप्तमेश वक्री होकर द्वितीय भावस्थ हो तथा शनि से दृष्ट हो।
* अष्टम भाव की नवांश राशि सप्तम भाव में हो और लग्न नवांश राशि में शुक्र हो।
* शुक्र पंचम भाव में हो और चतुर्थ भाव में राहु हो।
* राहु तथा केतु क्रमशः लग्न-सप्तम, द्वितीय-अष्टम अथवा पंचम-एकादश भाव में हो।
* सप्तम भाव पर वक्री ग्रहों का प्रभाव हो।
* जन्मलग्न तथा नवांश दोनों में ही बृहस्पति शनि से दृष्ट हो।
* बृहस्पति यदि शनि की राशियों में हो, विशेष रूप से कुंभ में।
* शुक्र तथा सप्तमेश पर शनि दृष्टिपात कर रहा हो।

विवाह प्रतिबन्धक योग- ज्योतिषशास्त्र के विभिन्न ग्रन्थों में ऐसे ग्रहयोगों के भी वर्णन मिल जाते हैं, जिनके कारण जातक अथवा जातिका का विवाह आजीवन नहीं हो पाता है। कुछ ऐसे ही ग्रहयोग द्रष्टव्य हैं-
* शनि तथा सूर्य, लग्न या सप्तम भाव में स्थित हों तथा इन दोनों ग्रहों के अंश भी समान हों।
* शनि तथा सूर्य का शुक्र के साथ युति संबंध हो अथवा शुक्र पर शनि तथा सूर्य दृष्टिपात कर रहे हों।
* द्वितीय, सप्तम तथा द्वादश भाव पाप पीडि़त हों।
* शनि लाभेश हाें तथा वक्री होकर सप्तम अथवा नवम भाव में स्थित हों।
* चन्द्र व शुक्र एक ही राशि में हो तथा इन ग्रहों पर शनि तथा मंगल की दृष्टि हो।
* शनि सूर्य की राशि में हों तथा सूर्य शनि की राशियों में हो।
* शुक्र सिंह या तुला राशि में हों तथा इसके द्वितीय तथा द्वादश भाव में शनि हो।
* सूर्य और शुक्र के मध्य 43 अंश तथा 20 कला से अधिक का अन्तर हो।
* द्वितीयेश, नवमेश, चतुर्थेश और सप्तमे में से जितने अधिक ग्रह बन्ध्या राशियों (मिथुन, सिंह, कन्या) में हों, विवाह की संभावना उतनी ही क्षीण होती जाती है।
* चन्द्रमा और शुक्र यदि एक दूसरे की राशि में स्थित हों, साथ ही पाप प्रभाव से युक्त हो, विशेष रूप से राहु तथा केतु।
* चन्द्रमा अथवा शुक्र यदि सप्तम अथवा लग्न भाव के अधिपति होकर बन्ध्या राशियों में स्थित हों।
* मंगल और शनि समान अंशों में हों और ये लग्नेश तथा सप्तमेश में भी हो।
कलहपूर्ण वैवाहिक जीवन- कुछ घटनाओं में देखा गया है कि विवाह के कुछ समय बाद ही पति पत्नी के मध्य लड़ाई-झगड़े, वैमनस्य आदि की अधिकता हो जाती है। वैसे कुछ सीमा तक यह सामान्य घटना ही है, परन्तु जब इस प्रकार के घटनाओं की पुनरावृत्ति होने लगती है तो दोनों का जीवन नरक के समान हो जाता है। कुछ ऐसे ही ग्रहयोग सूचीबद्ध किए जा रहे हैं-
* सप्तम में मंगल की राशि हो तथा मंगल का संबंध केतु से बन रहा हो तो दम्पत्ति कलहपूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं।
* मंगल यदि पृथिवी तत्व राशियों (वृष, कन्या, मकर) में हो।
* सप्तमस्थ मंगल पर शनि या राहु का प्रभाव हो।
* जन्मांग में गुरू वक्री हों साथ ही वक्री शनि के साथ कोई संबंध भी हो।
* लग्न में एक शुभ तथा एक अशुभ ग्रह हों।
* मंगल के साथ शनि लग्न, सप्तम, अष्टम या दशम स्थान में हों।
* लग्न में सिंह राशि हो तथा शनि सप्तमेश होकर द्वितीय भाव में स्थित हों।
* पंचमेश सप्तम भाव में तथा सप्तमेश पाप प्रभाव में हों तो पति-पत्नी एक दूसरे पर शक करते हैं।
* सप्तम भाव में सूर्य तथा राहु स्थित हों।
* सप्तम भाव में सूर्य तथा मंगल एक साथ हों।
* सप्तम भाव का आधिपति पंचम भाव में हों तथा सप्तमेश व पंचमेश पाप प्रभाव में हो तो जातक की स्त्री बहुधा अपने पिता के पास ही रहती है।
* सप्तमेश निर्बल हो तथा एकादश भाव का स्वामी सप्तम भाव में पाप ग्रहों के प्रभाव में हो।
* क्रूर ग्रह षष्ठेश होकर सप्तम भाव में हों तो ऐसे जातक की पत्नी झगड़ालू स्वभाव की होती है।
* शुक्र आर्द्रा, मूल, ज्येष्ठा अथवा कृत्तिका नक्षत्र में हों।
* राहु का बुध के साथ सम्बन्ध हो।
* यदि स्त्री के जन्मांग में नवमेश अथवा दशमेश नीच राशि में हो अथवा शत्रु राशियों में हो तो सास, ननद आदि से कष्ट।
* बृहस्पति राहु के साथ हो तो स्त्री से अलगाव।
* सप्तम भाव में शनि हो तो स्त्री झगड़ालू होती है।
* सप्तमेश पाप ग्रहों के नवांश में हो।
* सप्तमेश क्रूर षष्ठ्यंश में हो।
* चन्द्रमा सप्तमेश हो और पाप ग्रह के नवांश या पाप प्रभाव में हो।
* शनि, मंगल और राहु यदि सप्तम भाव में स्थित हो तो प्रेतजन्य पीड़ा के कारण वैवाहिक जीवन का विनाश हो जाता है।


वैवाहिक पार्थक्य (तलाक)- कुछ ग्रहस्थितियों के कारण पति-पत्नी आपसी सहमति से अलग हो जाते हैं अथवा कानूनन तलाक ले लेते हैं। ऐसी परिस्थितियों का निर्माण करने वाले ग्रहयोग निम्नलिखित हैं-
* सप्तमेश द्वादश भाव में द्वादशेश के साथ हो।
* द्वादशेश सप्तम भाव में सप्तमेश के साथ हो।
* द्वादशेश व सप्तमेश पंचम भाव में हो तथा पंचमेश का सम्बन्ध राहु तथा केतु के साथ हो।
* राहु और शनि लग्न या सप्तम भाव में एक साथ स्थित हों।
* अकेला सप्तमस्थ सूर्य भी वैवाहिक पार्थक्य कराने में सक्षम है।
* षष्ठेश अष्टम भाव में हो तथा सप्तमेश षष्ठ भाव में हो।
* सूर्य व चन्द्र एक साथ सप्तम भाव में हो।
* सूर्य, शुक्र व बुध एक साथ चतुर्थ भाव में हो तो पति-पत्नी अलग रहते हैं।
* अष्टम भाव में कोई भी शुभ ग्रह शनि या मंगल की राशि में हो।
* शुक्र व मंगल के मध्य राशि या नवांश परिवर्तन हो।
* सप्तमेश द्वादश भाव में हो तथा राहु लग्नस्थ हो।
* शुक्र बुध के साथ अष्टम भाव में हो।
* लग्नेश व सप्तमेश की द्वि-द्वादश स्थिति हो।
* शुक्र यदि आर्द्रा, मूल, कृत्तिका अथवा ज्येष्ठा नक्षत्र में हो।
वैधव्य/विधुर योग- जन्मांग में उपस्थित कुछ ग्रहयोग के कारण जीवन साथी की मृत्यु भी हो सकती है। कुछ ऐसे ही योग-
* शुक्र से चतुर्थ या अष्टम भाव पाप प्रभाव में हो तो जातक अपनी पत्नी को जलाकर मार देता है।
* द्वादश भाव में चन्द्रमा और सप्तम भाव में शुक्र स्थित हो तो भी जातक अपनी पत्नी की हत्या कर देता है।
* पाप ग्रहों के मध्य यदि शुक्र स्थित हो तो जातक की पत्नी की मृत्यु ऊँचाई से गिरकर होती है।
* पाप ग्रहों के मध्यस्थ शुक्र यदि अष्टम भावगत हो अथवा चतुर्थ भावगत हो तो जातक के पत्नी की मृत्यु फाँसी से होती है।
* ऐसा शुक्र यदि शुभ ग्रहों से युत अथवा दृष्ट न हो तो भी पत्नी का निधन फाँसी से होता है।
* पंचमेश सप्तमभाव में स्थित हो, सप्तमेश पाप ग्रहों से युत हो तथा शुक्र निर्बल हो तो गर्भ के कारण स्त्री की मृत्यु होती है।
* 'सारावली' के अनुसार अष्टमस्थ क्रूर ग्रह वैधव्य देते हैं।
* शुक्र नीच राशिस्थ हो या फिर चन्द्रमा नीच राशि में स्थित हो तो जातक की पत्नी की मृत्यु जल में डूूबने से होती है।
* यदि सप्तमेश पाप द्रेष्काण, भुजंग द्रेष्काण में हो पत्नी की मृत्यु फाँसी लगाकर होती है।
* सप्तमेश राहु तथा मान्दि के साथ हो तो पत्नी की मृत्यु विषभक्षण से होती है।
* यदि सप्तमेश शनि एवं मंगल के साथ हो अथवा क्रूर षष्ट्यंश में हो तो स्त्री की मृत्यु।
* यदि सप्तम भाव तथा सप्तमेश पाप ग्रहों के मध्य हों तो पत्नी का मरण होता है।
* सप्तमेश तथा बुध दोनों पापग्रहों के साथ नीच राशि, शत्रुक्षेत्री या अस्त होकर आठवें या बारहवें भाव में हो या पाप प्रभाव में हो तो ऐसी कन्या पति को मारने वाली होती है।
* सप्तमेश यदि अष्टम भाव में हो तो जीवनसाथी की मृत्यु होती है।
* चन्द्र से षष्ठ भाव में शनि, सातवें में राहु तथा आठवें में मंगल हो तो भी जीवनसाथी का मरण।
* सप्तमेश तथा अष्टमेश में युति सम्बन्ध हो तथा ये पाप प्रभाव में भी हों।
* दो या तीन पापग्रहों के साथ मंगल अष्टम भाव में हों।
* सप्तमेश बुध यदि नीचस्थ तथा पापप्रभाव में आकर अष्टम भाव में स्थित हो तो स्त्री पति की हत्या करने वाली होती है।
* षष्ठेश एवं अष्टमेश पापग्रहों के साथ षष्ठ या अष्टम स्थान में हों, तो युवावस्था में ही वैधव्य।
* सप्तमेश एवं द्वितीयेश राहु या केतु के साथ स्थित हों तथा शनि से दृष्ट हों तो पत्नी की मृत्यु शीघ्र।