Showing posts with label गुरुकुल. Show all posts
Showing posts with label गुरुकुल. Show all posts

Sunday, 11 November 2018

पाराशरी ज्योतिष में त्रिकोण भाव मीमांसा

१. महर्षि पराशर - ज्योतिषशास्त्र वैदिक संहिताओं  के समान ही अत्यंत प्राचीन शास्त्रों में सम्मिलित है और इस शास्त्र के 18 प्रवर्तक  ऋषियों की चर्चा ज्योतिषशास्त्र के ग्रंथों में उपलब्ध होती है। ये आचार्य हैं ब्रह्मा, आचार्य, वशिष्ठ, अत्रि, मनु, पौलस्त्य,रोमश, मरीचि, अङ्गिरा, व्यास, नारद, शौनक, भृगु, च्यवन, यवन, गर्ग, कश्यप और पराशर। जबकि स्वयं शक्तिपुत्र महर्षि पराशर 19 ऋषियों को इस ज्योतिषशास्त्र का प्रवर्त्तक स्वीकृत करते हैं और कहते हैं -

"विश्वसृङ्नारदो व्यासो वसिष्ठोऽत्रि: पराशर:।लोमशो यवन: सूर्यश्च्यवन: कश्यपो भृगु:।।

पुलस्त्यो मनुराचार्य: पौलिश: शौनकोऽङ्गिरा:।गर्गो मरीचिरित्येते ज्ञेया: ज्योति:प्रवर्त्तका:।। "

२. महर्षि पराशर की रचनाएँ
महर्षि पराशर एक पौराणिक व्यक्तित्व हैं और इनकी संस्कृत जगत में महती प्रतिष्ठा है। महर्षि पराशर के नाम से कई आचार्यों ने अनेक ग्रंथों का प्रणयन किया है, किन्तु ज्योतिषशास्त्र के कुछ ऐसे कालजयी ग्रन्थ हैं जिन्हें निर्विवाद रूप से महर्षि पराशर की रचना के रूप में स्वीकार किया गया है। ज्योतिषपितामह महर्षि पराशर ने ज्योतिषशास्त्र के तीनों प्रमुख स्कन्धों सिद्धान्त, संहिता और होराशास्त्र इन सब पर अपने विद्वत्तापूर्ण सिद्धान्तों के प्रणयन से जनसामान्य का कल्याण किया है। इन रचनाओं में बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् , लघु पाराशरी, मध्य पाराशरी, पाराशरी संहिता, वृद्धपराशर सिद्धान्त, पराशरस्मृति, कृषि पराशर आदि प्रमुख हैं। बृहत्पाराशरहोराशास्त्र एक अत्यन्त विशालकाय ग्रन्थ है, जिसमें शताधिक अध्याय और 5 सहस्त्र से भी अधिक श्लोकों का संग्रह है। इस पाराशरीहोरा ग्रन्थ में उपलब्ध प्रमुख सिद्धान्तों का संकलन कर लघुपाराशरी या उडुदायप्रदीप नामक विशिष्ट परन्तु अपेक्षाकृत लघुकाय ग्रंथ की रचना हुई -
" वयं पाराशरीं होरामनुसृत्य यथामति।
उडुदायप्रदीपाख्यं कुर्मो दैवविदां मुदे।।"

३. त्रिकोण भाव 

जन्म कुंडली में उपस्थित बारह भावों की अलग-अलग संज्ञाएँ कही गई हैं। प्रथम भाव अर्थात् लग्न को तनु, द्वितीय भाव की धन, तृतीय भाव की भ्रातृ, चतुर्थ की मित्र, पञ्चम की पुत्र, षष्ठ की शत्रु, सप्तम की स्त्री, अष्टम की मृत्यु, नवम की धर्म, दशम की कर्म, एकादश की आय और बारहवें भाव कि व्यय संज्ञा होती है -

' तन्वर्थसहजबान्धवपुत्रारिस्त्रीविनाशपुण्यानि।
कर्मायव्ययभावा लग्नाद्या भावतश्चिन्त्या:।।'
इन लग्नादि द्वादश भावों की उनकी प्रकृति के अनुसार चतुरस्र,कण्टक, केन्द्र,पणफर,आपोक्लिम, उपचय, अनुपचय, त्रिकोण आदि विशिष्ट संज्ञाएँ भी उपलब्ध होती हैं। लग्नादि द्वादश भावों में से पञ्चम तथा नवम भाव को त्रिकोण कहा गया है-
'धर्मसुतयोस्त्रिकोणं...'। जबकि वशिष्ठ संहिता ग्रन्थ में पञ्चम तथा नवम भाव के साथ साथ लग्न भाव को भी त्रिकोण भावों में परिगणित किया गया है।

४. त्रिकोण भावों के लिए प्रयुक्त संज्ञाएँ
ज्योतिष शास्त्र के प्राचीन ग्रंथों में प्रत्येक भाव के लिए अनेक संख्याओं का प्रयोग किया जाता रहा है इस क्रम में लग्न पंचम और नवम भाव के लिए भी अनेक संख्याएं प्रयुक्त हुई हैं।
* लग्न भाव - देह, मूर्ति, अङ्ग, तनु, उदय, कल्प, आद्य आदि संज्ञाओं का प्रयोग लग्न भाव के लिए हुआ है - 'लग्नं मूर्त्तिस्तथाङ्गं तनुरुदयवपु: कल्पमाद्यं...'
* पञ्चम भाव - तनय, बुद्धि, विद्या, आत्मज, वाक्,  पञ्चम और तनुज संज्ञाओं का प्रयोग पञ्चम या सुत भाव के लिए किया जाता है - '...तनयं बुद्धिविद्यात्मजाख्यम्। वाक्स्थानं पञ्चमं स्यातनुजमथ...'
* नवम भाव - ' गुर्वाख्यं धर्मसंज्ञं नवममिह शुभं स्यात्तपोमार्गसञ्ज्ञम् ' अर्थात् नवम भाव के लिए गुरु, धर्म,शुभ,तप और मार्ग संज्ञा का उल्लेख ज्योतिषशास्त्र के प्राचीन ग्रंथों में मिलता है।

५. त्रिकोण भावों के कारक ग्रह
महर्षि पराशर ने अपनी रचना बृहत्पाराशरहोराशास्त्र में लग्नादि द्वादश भावों के लिए विशिष्ट कारक ग्रहों की व्यवस्था दी है। इसी व्यवस्था के अंतर्गत त्रिकोण भाव अर्थात लग्न भाव, पञ्चम भाव तथा नवम भाव के कारक ग्रह अधोलिखित हैं-
* लग्न भाव - सूर्य
* पञ्चम भाव - बृहस्पति
* नवम भाव - बृहस्पति

६. त्रिकोण भावों की संख्या वस्तुतः कितनी ?
जन्मकुंडली के द्वादश भावों की उनकी समान प्रकृति व प्रवृत्ति के आधार पर विशिष्ट संज्ञा देने की प्रवृत्ति ज्योतिषशास्त्रीय आचार्यों में प्राप्त होती है। जहां कुछ विद्वान त्रिकोण भाव में केवल पञ्चम तथा नवम भाव को स्वीकार करते हैं। वहीं कुछ विद्वान पञ्चम और नवम के साथ-साथ लग्न भाव को भी त्रिकोण संज्ञा से अभिहित करते हैं। यहां यह अत्यन्त आवश्यक हो जाता है कि लघुपाराशरी ग्रन्थ में वर्णित त्रिकोण शब्द से महर्षि पराशर को कौन-कौन से भाव अभिप्रेत हैं यह स्पष्ट हो। अत: निम्नलिखित बिन्दुओं के आलोक में द्वारा उपरोक्त शंका का समाधान प्राप्त हो सकता है-
* सर्वप्रथम तो त्रिकोण शब्द में ही उपलब्ध ' त्रि ' शब्द ही इस दिशा की ओर इंगित करता है कि त्रिकोण भावों की संख्या 'त्रि' अर्थात तीन ही है और ज्योतिषशास्त्र के प्रवर्तक ऋषियों में से कुछ ने लग्न को भी त्रिकोण भाव में परिगणित कर इसे पञ्चम और नवम भाव के साथ सम्मिलित कर लिया है तो त्रिकोण भावों में की संख्या तीन होने का मत पुष्ट होता है।
* स्वयं लघुपाराशरी ग्रन्थ में भी कई अन्तःसाक्ष्य प्राप्त होते हैं जो त्रिकोण भावों की संख्या दो से अधिक होने की ओर संकेत करते हैं। इस सन्दर्भ में इस ग्रंथ का श्लोक क्रमांक ६ द्रष्टव्य है - ' सर्वे त्रिकोणनेतारो ग्रहा: ...' जिसमें त्रिकोण के स्वामियों के लिए द्विवचनान्त 'नेतारौ' शब्द के स्थान पर  बहुवचनान्त 'नेतार:' शब्द का प्रयोग हुआ है।
* राजयोग वर्णन क्रम में लघु पाराशरी ग्रन्थ में प्राप्त यह श्लोक भी उपरोक्त संबंध में विचारणीय है-
' कर्मलग्नाधिनेतारावन्योन्याश्रयसंस्थितौ।
राजयोगाविति प्रोक्तं विख्यातो विजयी भवेत्।।'
अर्थात् दशमेश और लग्नेश यदि परस्पर स्थान-परिवर्तन कर स्थित हों तो राजयोग का निर्माण होता है और यह जातक को विख्यात और विजयी बनाता है। यहां ध्यातव्य है कि यदि लग्न को केवल केन्द्र स्थान माना जाए तो फिर उपरोक्त श्लोक निरर्थक हो जाएगा। क्योंकि लग्नेश अर्थात् केन्द्रेश और दशमेश अर्थात एक और केन्द्रेश के मध्य का स्थान परिवर्तन संबंध राजयोग का निर्माण करने में समर्थ नहीं हो सकता। उपरोक्त श्लोक के अर्थ की उचित संगति तभी बैठ सकती है जब हम लग्न को त्रिकोण स्थान मानें। तब लग्न अर्थात् त्रिकोण स्थान और दशम अर्थात केन्द्र स्थान के स्वामियों के मध्य का स्थान परिवर्तन संबंध राजयोग का निर्माण करेगा और यही सिद्धान्त महर्षि पराशर को भी अभीष्ट है-
' केन्द्रत्रिकोणनेतारौ दोषयुक्तावपि स्वयम्।
सम्बन्धमात्राद्बलिनौ भवेतां योगकारकौ।।'
         अत: उपरोक्त तथ्यों के आधार पर यह प्रमाणित हो जाता है कि त्रिकोण स्थानों की संख्या तीन ही है और त्रिकोण शब्द लग्न भाव, पञ्चम भाव और नवम भाव का वाचक है।

७. मेषादि द्वादश लग्नों में त्रिकोणाधिपति
मेष वृष आदि द्वादश राशियों के आधार पर द्वादश लग्न भी होते हैं। बारह अलग-अलग लग्नों में लग्नेश पञ्चमेश और नवमेश भी भिन्न-भिन्न होते हैं। निम्नलिखित सूची द्वारा मेषादि द्वादश लग्नों के त्रिकोणेशों को स्पष्ट किया जा सकता है -
* मेष लग्न - मेष लग्न के लग्न भाव, पञ्चम भाव और नवम भाव में क्रमशः मेष राशि, सिंह राशि तथा धनु राशि होती है, अतः लग्न भाव में स्थित मेष राशि का स्वामी मंगल, पञ्चम भाव में स्थित सिंह राशि का स्वामी सूर्य तथा नवम भाव में स्थित धनु राशि का स्वामी बृहस्पति मेष लग्न में त्रिकोणेश होंगे। अतः मेष लग्न में मंगल, सूर्य और बृहस्पति त्रिकोणाधिपति होते हैं।
* वृष लग्न - इसी तरह वृष लग्न में शुक्र, बुध और शनि त्रिकोणेश होंगे।
* मिथुन लग्न - मिथुन लग्न में बुध, शुक्र और शनि त्रिकोणेश होते हैं।
* कर्क लग्न - चंद्रमा, मंगल और बृहस्पति कर्क लग्न में त्रिकोण स्थानों के अधिपति होते हैं।
* सिंह लग्न - सिंह लग्न की कुंडली के लग्न भाव में सिंह राशि, पञ्चम भाव में धनु राशि तथा नवम भाव में मेष राशि होती है। अतः इस लग्न में सिंह राशि का स्वामी सूर्य, धनु राशि का स्वामी बृहस्पति तथा मेष राशि का स्वामी मंगल क्रमशः त्रिकोण स्थान के स्वामी होंगे।
* कन्या लग्न - इस लग्न में बुध, शनि और शुक्र त्रिकोणेश होते हैं।
* तुला लग्न - तुला लग्न के त्रिकोणेश शुक्र, शनि तथा बुध होंगे।
* वृश्चिक लग्न - मंगल, बृहस्पति और चंद्रमा इस लग्न में त्रिकोण स्थान के स्वामी होते हैं।
* धनु लग्न - धनु लग्न की कुंडली के लग्न भाव में धनु राशि, पञ्चम भाव में मेष राशि तथा नवम भाव में सिंह राशि होती है अतः बृहस्पति, मंगल और सूर्य इस लग्न में त्रिकोणेश होते हैं।
* मकर लग्न - शनि, शुक्र और बुध इस लग्न में त्रिकोणाधिपति होते हैं।
* कुंभ लग्न - कुंभ, मिथुन और तुला राशि इस लग्न के जन्माङ्ग में लग्न, पंचम और नवम भाव में स्थित होते हैं। अतः त्रिकोणेश शनि बुध और शुक्र होंगे।
* मीन लग्न - मीन लग्न की कुंडली के लग्न, पञ्चम और नवम भाव में क्रमशः मीन, कर्क और वृश्चिक राशियाँ विद्यमान होती हैं, अतः इस लग्न में त्रिकोणेश गुरु, चंद्रमा और मंगल होते हैं।

८. त्रिकोणेशों का शुभत्व
त्रिकोणेशों का शुभत्व प्रतिपादित करते हुए महर्षि पराशर कहते हैं - ' सर्वे त्रिकोणनेतारो ग्रहा: शुभफलप्रदा:।' अर्थात् त्रिकोण स्थानों के अधिपति होने के उपरान्त सूर्यादि सभी ग्रह जातक को शुभ फल देने वाले होते हैं। ज्योतिषशास्त्र की फलित शाखा में सामान्यतया नवग्रहों को शुभ और पाप दो वर्गों में विभाजित किया गया है -
'गुरुबुधशुक्रा: सौम्या: सौरिकुजार्स्तु निगदिता: पापा:।
शशिजोऽशुभसंयुक्त: क्षीणश्च निशाकर: पाप:।।'
अर्थात् गुरु, बुध और शुक्र सौम्य या शुभ ग्रह हैं जबकि शनि, मंगल और सूर्य पाप या क्रूर ग्रह हैं। पाप ग्रहों से युक्त बुध पापी ग्रह माना जाता है, जबकि क्षीण चंद्र भी पाप ग्रह की ही श्रेणी में आते हैं। पूर्ण चंद्र को शुभ ग्रह माना गया है। ज्योतिषशास्त्र के उपरोक्त सामान्य सिद्धान्त के अनुसार शुभ ग्रह नैसर्गिक रूप से शुभ फल देने वाले होते हैं, जबकि पाप ग्रह नैसर्गिक रूप से जातक को पाप फल प्रदान करते हैं। महर्षि पराशर प्रणीत लघुपाराशरी ग्रन्थ इस दृष्टिकोण से नितांत भिन्न है। ज्योतिषशास्त्र के उपरोक्त परिपाटी से पूर्णतया अलग सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हुए महर्षि का कथन है कि कोई भी ग्रह चाहे वह नैसर्गिक शुभ ग्रह हो अथवा पाप ग्रह यदि वह कुंडली के त्रिकोण भाव अर्थात् लग्न, पञ्चम और नवम भाव में से किसी का भी अधिपति है तो वह जातक को केवल शुभ फल ही प्रदान करेगा। यहां जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि हम शुभ किसे कहें तो इसकी सामान्य परिभाषा है- 'मनोऽनुकूलं शुभम् '
महर्षि ने अपने सिद्धांत को और अधिक पुष्ट करने के लिए श्लोक क्रमांक 12 में भी इस विचार की ओर संकेत किया है। कर्क लग्न की कुंडली का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा है-
'कुजस्य कर्मनेतृत्त्वे प्रयुक्ता शुभकारिता।
त्रिकोणस्यापि नेतृत्त्वे न कर्मेशत्त्वमात्रत:।।'
इस उदाहरण में महर्षि ने मंगल के शुभकारी होने का विधान किया है। कर्क लग्न की इस कुंडली में मंगल पञ्चमेश और दशमेश दोनों हैं, अतः जिज्ञासुओं के मन में एक सहज शंका उत्पन्न हो सकती है कि मंगल के शुभ होने का कारण क्या है ? तो इस शंका का निवारण महर्षि ने ही प्रस्तुत किया है, और कहा है कि मंगल की शुभकारिता का कारण उसका त्रिकोणाधिपति होना है न कि उसका केन्द्रेश होना। इसी सिद्धांत के समर्थन में ज्योतिषशास्त्रीय ग्रन्थों में एक अन्य उक्ति प्राप्त होती है -
"लग्नमारोग्यमाख्यातं तस्मात्तदधिप: शुभ:।
नवमो भाग्यभावोऽस्ति बुद्धिभावश्च पंचम:।
तस्माद् तदाधिपत्येन ग्रहा: सर्वे शुभप्रदा:।।"

९. त्रिकोणेशों की शुभकारिता का अपवाद
महर्षि पाराशर ने त्रिकोण स्थान के स्वामियों के शुभत्व को निर्विवाद रूप से स्वीकार तो किया है। परंतु साथ ही साथ उन्होंने कुछ ऐसी परिस्थितियों का भी उल्लेख किया है, जहां ये त्रिकोणेश शुभ फल के स्थान पर पाप फल देने वाले हो जाते हैं अथवा शुभ फल के साथ-साथ जातक को पाप फल भी प्रदान करते हैं। इस संदर्भ में महर्षि पराशर के उक्ति है -     'पतयस्त्रिषडायानां यदि पापफलप्रदा:'
अभिप्राय यह है कि त्रिकोण स्थानों के स्वामी यदि त्रिषडायेश भी हों अर्थात् तृतीय भाव,षष्ठ भाव या एकादश भाव के भी अधिपति हों तो ये त्रिकोणेश ही जातक को पाप फल प्रदान करते हैं। इसी श्लोक का अर्थ करते हुए अन्य टीकाकारों का मत है कि यदि त्रिकोणेश त्रिषडायेश भी हो जाएं तो त्रिकोणाधिपति शुभ फल देने के साथ-साथ जातक को पाप फल भी प्रदान करते हैं। इस सिद्धान्त पर अगर हम गंभीरतापूर्वक विचार करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि जो कोई भी ग्रह त्रिकोणेश होगा वह किसी भी परिस्थिति में तृतीयेश या एकादशेश नहीं हो सकता है। त्रिकोणेशों के केवल षष्ठेश होने की संभावना होती है और ऐसी परिस्थिति केवल कर्क, कन्या एवं मकर लग्न में ही संभव हो पाती है। कर्क लग्न में गुरु, कन्या लग्न में शनि एवं मकर लग्न में बुध त्रिकोणेश होने के साथ-साथ षष्ठेश होते हैं। अत: यह कहना अधिक उचित होगा कि यदि त्रिकोणेश, षष्ठेश हो तो वह पापफलद हो जाएगा अथवा शुभ फल देने के साथ-साथ कुछ अशुभ प्रभाव से युक्त फल भी जातक को प्रदान करेगा।

१०.राजयोगों के निर्माण में त्रिकोणेशों की भूमिका
लघुपाराशरी ग्रंथ में वर्णित राजयोगाध्याय में जितने भी राजयोगों का वर्णन है उसमें त्रिकोणेशों की भूमिका सर्वाधिक प्रमुख सिद्ध होती है। राजयोग उत्पन्न करने वाले इन ग्रह योगों पर दृष्टिपात करने से उपरोक्त सिद्धान्त और अधिक स्पष्ट हो जाएगा-
* केन्द्र भाव के अधिपतियों और त्रिकोण भाव के अधिपतियों के मध्य का संबंध विशेष रूप से राजयोग कारक होता है।
* केन्द्र भाव के अधिपति और त्रिकोण भाव के अधिपति यदि दोष युक्त हों तथापि उनके मध्य का संबंध राजयोग देने वाला होता है।
* दशम भाव का अधिपति और तृतीय त्रिकोण अर्थात् नवम भाव का स्वामी यदि व्यत्ययपूर्वक स्थित हों, एक साथ ही स्थित होकर नवम या फिर दशम भाव में स्थित हों या एक साथ होकर अन्य स्थान पर स्थित हों और अन्य देख रहा हो, तब भी जातक को राजयोग की प्राप्ति होती है।
* त्रिकोण स्थान के अधिपतियों के मध्य का कोई भी संबंध (चतुर्विध) राजयोग कारक होता है ।
* त्रिकोणेशों का संबंध यदि सर्वाधिक बली केंद्रेश अर्थात् दशमेश से हो जाए तब भी जातक को राजयोग की प्राप्ति होती है ‌।
* यदि कोई ग्रह त्रिकोणेश और केंद्रेश दोनों हो तो वह भी जातक को राजयोग का फल देता है।
* कर्म स्थान के स्वामी और लग्न स्थान अर्थात् त्रिकोण स्थान के स्वामी यदि व्यत्ययपूर्वक स्थित हों तब भी राजयोग बनता है।
* नवम भाव का अधिपति और दशम भाव का अधिपति अर्थात् प्रथम और तृतीय त्रिकोणेश व्यत्ययपूर्वक स्थित हों तब भी जातक राज्य सुख का भागी होता है।

११. त्रिकोणाधिपतियों का बलाबल निर्णय

 मेषादि द्वादश लग्नों में से प्रत्येक में तीन-तीन की संख्या में त्रिकोणेश होते हैं- लग्नेश, पञ्चमेश और नवमेश। जातकशास्त्र के जिज्ञासुओं के मन में एक शंका उत्पन्न होती है कि इन तीनों त्रिकोणेशों में से कौन सर्वाधिक बली है और कौन कम बली है। यह तो स्पष्ट है कि तीनों ही त्रिकोणेश शुभ फल देने वाले होते हैं। परन्तु सर्वाधिक शुभ फल कौन त्रिकोणेश देगा और अपेक्षाकृत कम शुभ फल किस त्रिकोणेश से प्राप्त होगा, इसका निर्धारण भी आवश्यक है। इस समस्या का समाधान करते हुए महर्षि पराशर की उक्ति है - ' प्रबलाश्चोत्तरोत्तरम् '
अभिप्राय है कि प्रथम त्रिकोण अर्थात् लग्न भाव का अधिपति सबसे कम बलवान होता है, उससे अधिक बलवान पञ्चम भाव का अधिपति होता है जबकि सर्वाधिक बली त्रिकोणेश नवम भाव का अधिपति होगा।

१२. त्रिकोणेशों के शुभत्व की अतिशयता
लघुपाराशरी ग्रंथ में त्रिकोणेशों के शुभत्व की अतिशयता का दिग्दर्शन अष्टमेश के फलादेश के संदर्भ में उपलब्ध होता है। महर्षि पराशर के मतानुसार भाग्य स्थान से व्यय स्थान का अधिपति होने के कारण रन्ध्रेश अर्थात् अष्टमेश शुभ फल देने वाला नहीं होता-
       ' भाग्यव्ययाधिपत्येन रन्ध्रेशो न शुभप्रद: '
परन्तु वही अष्टमेश जब लग्नेश हो जाता है, अर्थात् अष्टमेश लग्नरूपी त्रिकोणेश भी हो जाता है तो उसके पाप फल देने की प्रवृत्ति पूर्णतया परिवर्तित हो जाती है और वही अष्टमेश जातक को शुभ फल देने वाला हो जाता है।
' स एव शुभसंधाता लग्नाधीशोऽपि चेत् स्वयम् '

Saturday, 15 September 2018

विंशोत्तरी दशा-साधन प्रविधि

       प्रत्यक्ष, अनुमान या अन्य किसी भी उपाय से जब अदृष्ट का ज्ञान न हो पाए तो वेद का आश्रय लेने का विधान किया गया है। मनुष्य का भाग्य या भविष्य भी एक ऐसा ही विषय है। इस पर भी यदि शुभाशुभत्व का विचार करना हो तो इस विषय की दुरूहता और भी बढ़ जाती है। इसी शुभाशुभत्वमूलक काल-सापेक्ष ज्ञान हेतु ज्योतिषरूपी वेदांग अस्तित्व में आया। महर्षि लगध भी इसका समर्थन करते हुए वेदांग ज्योतिष में कहते हैं -
वेदा हि यज्ञार्थमभिप्रवृत्ताः कालानुपूर्व्या विहिताश्च यज्ञाः।
तस्मादिदं कालविधानशास्त्रं यो ज्योतिषं वेद स वेद यज्ञान्।।
कालान्तर में यह ज्योतिषशास्त्र काफी विस्तार को प्राप्त हुआ तथा इसकी पाँच शाखाएँ विकसित हुई - सिद्धान्त, संहिता, होरा, प्रश्न तथा शकुन। इस पंचस्कन्धात्मक ज्योतिषशास्त्र का होरास्कन्ध मनुष्य के भविष्य से जुड़ा होने के कारण अत्यन्त महत्त्व का है। अपनी लोकप्रियता के कारण यह शास्त्र भारत के बाहर अन्य देशों में भी फैला। नवग्रहों की विभिन्न राशियों में स्थिति के आधार पर मनुष्य को शुभ-अशुभ अथवा मिश्रित फल प्राप्त होते हैं। जातक को इन शुभाशुभ फलों की प्राप्ति एक ही बार नहीं होती। इन फलों की प्राप्ति के काल निर्धारण हेतु दशाओं की कल्पना की गई है।  भारतीय फलित ज्योतिष में विशोत्तरी, अष्टोत्तरी, योगिनी आदि दशाओं का उल्लेख है  जबकि ताजिक शास्त्र में मुद्दा दशा, पात्यायनी आदि दशाओं का वर्णन प्राप्त होता है।  पाराशरी ज्योतिष का मूल आधार विंशोत्तरी दशा है।
* विंशोत्तरी दशा - यह दशा नक्षत्रदशा नाम से भी प्रसिद्ध है। इस दशा में मानव की आयु 120 (एक सौ बीस) वर्ष की मानी गई है। इसी काल विस्तार में विभिन्न ग्रहों की दशाओं की कल्पना की गई है। समस्त नवग्रहों की 120 वर्ष की कालावधि में से प्रत्येक ग्रह को कुछ विशेष वर्ष का काल प्रदान किया गया है। इस दशा में महादशा, अन्तर्दशा, प्रत्यन्तर्दशा आदि शब्दों का प्रयोग किया जाता है।
* विंशोत्तरी दशा में ग्रहों का वर्षमान - विशोत्तरी दशा में विभिन्न ग्रहों को दशाधिपति के रूप में विशेष काल का निर्धारण करते हुए महर्षि पराशर कहते हैं -
   "दशासमा: क्रमादेषां षड् दशाऽश्वा गजेन्दवः।
    नृपालाः नवचन्द्राश्च नगचन्द्रा नगा नखाः।। "
           अर्थात् सूर्य 6 वर्ष, चंद्रमा 10 वर्ष, मंगल 7 वर्ष, राहु 18 वर्ष, बृहस्पति 16 वर्ष, शनि 19 वर्ष, बुध 17 वर्ष, केतु 7 वर्ष, तथा शुक्र के 20 वर्षों की कालावधि विंशोत्तरी दशा में प्राप्त होती है।
* विंशोत्तरी दशा का निर्धारण - जन्म नक्षत्रनुसार ग्रहों की दशा होती है। कृत्तिका, उत्तराफाल्गुनी और उत्तराषाढा में जन्म होने से सूर्य की, रोहिणी, हस्त और श्रवण नक्षत्रें में जन्म होने से चन्द्रमा की, मृगशिरा, चित्र और धनिष्ठा नक्षत्रों में जन्म होने से मंगल की, आर्द्रा, स्वाती और शतभिषा में जन्म होने से राहु की, पुनवर्सु, विशाखा और पूर्वाभाद्रपद में जन्म होने से बृहस्पति की, पुष्य, अनुराधा और उत्तराभाद्रपद में जन्म होने से शनि की, आश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती में जन्म लेने से बुध की, मघा, मूल और अश्विनी में जन्म होने से केतु की एवं भरणी, पूर्वाफाल्गुनी और पूर्वाषाढा में जन्म होने से शुक्र की दशा होती है।
* दशा साधन विधि - भयात और भभोग को पलात्मक बनाकर जन्म नक्षत्र के अनुसार जिस ग्रह की दशा हो, उसके वर्षों से पलात्मक भयात को गुणा कर पलात्मक भभोग का भाग देने से जो लब्ध आये वह वर्ष और शेष को 12 से गुणा कर पलात्मक भभोग का भाग देने से जो लब्ध आए वह मास होता है। ठीक इसी तरह शेष को पुनः 30 से गुणा कर पलात्मक भभोग का भाग देने से जो लब्ध आए वह दिन, शेष को पुनः 60 से गुणा कर पलात्मक भभोग का भाग देने से जो लब्ध आए वह घटी एवं शेष को पुनः 60 से गुणा कर पलात्मक भभोग का भाग देने से जो लब्ध फल आता है वह पल का मान होता है।
* अन्तर्दशा निकालने की विधि - विंशोत्तरी दशा क्रम में महादशाओं के अनन्तर अन्तर्दशाओं पर भी विचार किया जाता है। प्रत्येक ग्रह की महादशा में समस्त नवग्रहों की दशाएँ आती है। किन्तु इसका एक विशिष्ट क्रम है। जैसे यदि चन्द्रमा की महादशा हो तो उस महादशा में पहली अन्तर्दशा चन्द्रमा की, दूसरी मंगल की, तीसरी राहु की, चौथी बृहस्पति की, पांचवी शनि की, छठी अन्तर्दशा बुध की, सातवीं केतु की, आठवीं शुक्र की तथा नवीं और अन्तिम अन्तर्दशा सूर्य की होगी।
     अन्तर्दशा निकालने का सरल नियम यह है कि महादशेश के वर्षमान को उतने ही वर्षमान से गुणा कर 10 का भाग देने से लब्ध मास और शेष को तीन से गुणा करने से दिन की संख्या स्पष्ट हो जाती है। यथा - मंगल की महादशा में मंगल की अन्तर्दशा निकालनी हो तो मंगल के दशा वर्ष 7 को 7 से गुणा किया तो 7×7 = 49 ,49÷ 10 = 4 मास, शेष 9 है अतः दिन निकालने हेतु शेष 9 को उसे गुणा किया तो 27 दिन आता है। ठीक इसी प्रकार अन्य ग्रहों की महादशा में अन्तर्दशाएँ निकाली जा सकती है।
* प्रत्यन्तर दशाएँ - जिस प्रकार ग्रहों की महादशा काल में नवग्रहों की अन्तर्दशाएँ आती हैं, ठीक इसी प्रकार प्रत्येक ग्रह की अन्तर्दशा में नवग्रहों की प्रत्यन्तर दशाएँ भी आती हैं। प्रत्यन्तर दशा साधन का नियम यह है कि महादशेश के वर्षमान से अन्तर्दशेश और प्रत्यन्तर दशा के स्वामी के वर्षमान को परस्पर गुणा कर पुनः 40 का भाग देने से लब्धि दिन होते हैं। यथा चन्द्रमा की महादशा में चन्द्रमा की अन्तर्दशा में मंगल का प्रत्यन्तर निकालना हो तो चन्द्रमा के वर्षमान 10 वर्ष को पुनः चन्द्रमा के वर्षमान 10 से गुणा किया - 10×10 = 100 इसमें पुनः मंगल के वर्षमान 7 से गुणा किया तो 100×7 = 700 आया। 700 में 40 से भाग देने पर 700 ÷ 40 = 17 दिन आया। इसी प्रकार अन्य ग्रहों की भी प्रत्यन्तर दशाएँ साधित की जाती हैं।
विशोत्तरी दशा फल
* सूर्य - सूर्य यदि बली हो तो इसकी दशा में धन लाभ, अधिक सुख, राज-सम्मानादि, पुत्रलाभ, हाथी आदि धनों का लाभ, वाहन का लाभ, राजा की अनुकम्पा प्राप्त होती है। जबकि निर्बल सूर्य की दशा में जातक महान कष्ट, धन-धान्य का विनाश, राजक्रोध, प्रवास, राजदण्ड, धनक्षय, ज्वरपीड़ा, अपयश, स्वबन्धुओं से वैमनस्यता, पितृकष्ट, भय आदि अशुभ फलों को प्राप्त करता है। 
* चन्द्र - बली चन्द्रमा की दशा में जातक को धन-धान्य सौभाग्यादि की वृद्धि, घर में मांगलिक कार्य, वाहन सुख, राजदर्शन, यत्न से कार्य-सिद्धि, घर में धनागम, राज्यलाभ, सुख, वाहन प्राप्ति एवं धन एवं वस्त्रदि का लाभ होता है। निर्बल चन्द्रमा अपनी दशा में जातक को धन हानि, जड़ता, मानसिक रोग, नौकरों से पीड़ा, मातृकष्ट आदि अशुभ फल प्रदान करता है।
* मंगल - बली मंगल अपनी दशा में जातक को राज्यलाभ, भूमिप्राप्ति, धन-धान्यादि का लाभ, राजसम्मान, वाहन, वस्त्र आदि का लाभ करता है। जबकि मंगल के निर्बल होने से यही मंगल अपनी दशा में धन-धान्य का विनाश कष्ट आदि अशुभ फल प्रदान करता है।
* राहु - इस छाया ग्रह के बली होने पर जातक को राहु की दशा में धन-धान्यादि संपत्ति का अभ्युदय, मित्र एवं मान्य जनों की सहानुभूति से कार्यसिद्धि, वाहन, पुत्र-लाभ आदि शुभ फल प्राप्त होते हैं। यही ग्रह यदि पाप प्रभाव में हो तो जातक को स्थान भ्रष्ट, मानसिक रोग, पुत्र-स्त्री का विनाश एवं कुभोजन प्रदान करता है।
* गुरू - बली गुरु अपनी दशा में राज्य की प्राप्ति, महासुख, राजा से सम्मान, यश, घोड़े-हाथी आदि की प्राप्ति, देव-ब्राह्मण में निष्ठा, वेद-वेदान्तादि का श्रवण, पालकी आदि की प्राप्ति, कल्याण, पुत्र कलत्रदि का लाभ प्रदान करता है। हीनबली गुरू की दशा में जातक को स्थाननाश, चिन्ता व पुत्रकष्ट, महाभय, पशु-चौपायों की हानि, आदि अशुभ फल प्राप्त होते हैं।
* शनि - बली शनि की दशा में जातक राजसम्मान, सुन्दर यश, धनलाभ, विद्याध्ययन से स्वान्त सुख, हाथी, वाहन, आभूषण आदि का सुख, घर में लक्ष्मी की कृपा आदि शुभ फल प्राप्त करता है। यही शनि यदि हीनबली हो तो शस्त्र से पीड़ा, स्थान का विनाश, महाभय, माता-पिता से वियोग, पुत्र कलत्रदि को पीड़ा, बन्धन आदि पीड़ा प्राप्त होते हैं।
* बुध - बुध अपनी दशा में जातक को सुख, धन-धान्य का लाभ, सुकीर्त्ति, ज्ञानवृद्धि, राजा की सहानुभूति, शुभ कार्य की वृद्धि, रोगहीनता, व्यापार से धनलाभ आदि शुभ पुल प्रदान करता है। बलविहीन बुध राजद्वेष, मानसिक रोग, विदेश भ्रमण, दूसरे की नौकरी, कलह तथा मूत्रकृच्छ रोगादि प्रदान करता है।
* केतु - केतु के शुभ होने अर्थात् बलयुक्त होने पर राजा से प्रेम, मनोनुकूल वातावरण देश या ग्राम का अधिकारी, वाहनसुख, सन्तानोत्पत्ति, विदेशभ्रमण, तथा पशु आदि का लाभ प्रदान करता है। बलविहीन केतु की दशा में दूरगमन, शारीरिक कष्ट, पराश्रित, बन्धुनाश, स्थान विनाश, मानसिक रोग, अधम व्यक्ति का संग और रोगरूपी अशुभ फलों की प्राप्ति होती है।
* शुक्र - बलवान शुक्र अपनी दशा में जातक को राज्याभिषेक की प्राप्ति, वाहन, वस्त्र, आभूषण, हाथी, घोड़े पशु आदि का लाभ, सुस्वादु भोजन, पुत्र-पौत्रदि का जन्म आदि शुभ फलों की प्राप्ति होती है। बलविहीन शुक्र अपनी दशा में जातक को स्वबन्धु-बान्धवों में वैमनस्यता, पत्नी की पीड़ा, व्यवसाय में हानि, गाय भैंस आदि पशुओं की हानि, स्त्री पुत्रदि या अपने बन्धु-बान्धवों का विछोह देता है।

Thursday, 13 September 2018

सूर्य सिद्धान्त में वर्णित नवविध कालमान



                  त्रिस्कन्धात्मक ज्योतिषशास्त्र के सर्वप्रमुख स्कन्ध के रूप में सिद्धान्त ज्योतिष को स्वीकार किया गया है। यद्यपि सिद्धान्त संहिता और होरा इन तीनों की गणना स्कन्धत्रय के अन्तर्गत की जाती है1, तथापि सिद्धान्त ज्योतिष के ज्ञान के बिना ज्योतिषशास्त्र रूपी गहन समुद्र में गति प्राप्त करना सम्भव नहीं है। सिद्धान्त ज्योतिष की महत्ता को स्थापित करते हुए वराहमिहिराचार्य ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ “वृहत्संहिता” में कहा है कि ज्योतिषी को ग्रह गणित के प्रसङ्ग में “पौलिश, रोमक, वासिष्ठ, सौर और पैतामह” इन पाँच सिद्धान्तों में प्रतिपादित युग, वर्ष, अयन, ऋतु, मास, पक्ष, अहोरात्र, प्रहर, मुहूर्त, घटी, पल, प्राण, त्रुटि, त्रुटि के अवयव आदि कालों का तथा भगण, राशि, अंश, कला, विकला आदि क्षेत्रों का ज्ञाता अवश्य होना चाहिए।2 सिद्धान्त ज्योतिष के विषयों के अध्ययन की परम्परा में सूर्य-मयासुर संवाद स्वरूप ‘सूर्य-सिद्धान्त’ ग्रन्थ की महती प्रतिष्ठा है। इस ग्रन्थ की प्राचीनता का समर्थन ग्रन्थ की विषयवस्तु से स्वयमेव हो जाता है। ग्रन्थारम्भ में ही इस ग्रन्थ का रचनाकाल कृत (सतयुग) माना गया है।3 इस ग्रन्थ में सिद्धान्त ज्योतिष के विषयों यथा- त्रुटि से लेकर कल्पकाल तक की कालगणना, सौर-चान्द्र मासों का प्रतिपादन, ग्रहगतियों का निरूपण, व्यक्त-अव्यक्त गणित का प्रयोजन, विविध प्रश्नोत्तर विधि, ग्रह-नक्षत्र की स्थिति, नाना प्रकार के तुरीय-नलिका आदि यन्त्रों की निर्माण विधि, दिक्, देश, कालज्ञान के अनन्यतम उपयोगी अंग, अक्ष क्षेत्र सम्बन्धी सिद्धान्त, अक्षज्या, लम्बज्या, द्युज्या, कुज्या, तद्धृति, समशंकु का आनयन, ग्रह गति, ग्रह कारण, भगण, चन्द्र-ग्रहण, सूर्यग्रहण, ग्रह उदयास्त, ग्रह युति, ग्रह युद्ध, अहोरात्र व्यवस्था, भुवन संस्था, क्रान्तिवृत, ऋतु, अयन, संक्रान्ति, नवविधकालमान आदि में से अधिकांश विषय पर अत्यन्त विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है।
          काल विषयक परिचर्चा के सन्दर्भ में सर्वप्रथम काल के दो भेद किए गए- लोकसंहारक काल तथा गणनात्मक काल- “लोकानामन्तकृत् कालः कालोऽन्यः कलनात्मकः।”4 काल के इस द्विविधि भेद के बाद गणनात्मक काल को इस ग्रन्थ में प्रमुखता दी गई है। इस गणनात्मक काल को भी स्थूल व सूक्ष्म अथवा मूर्त व अमूर्त दो भेदों में विभक्त किया गया।5 पुनः त्रुट्यादि अमूर्त या सूक्ष्म कालमान पर विशेष चर्चा न करते हुए प्राणादि मूर्त अथवा स्थूल कालमानों पर अत्यन्त गहन व विस्तृत चर्चा की गई है। सूर्य व मयासुर के मध्य संवादरूप इस ग्रन्थ में व्यक्त काल को ‘नवविध’ माना गया और कहा गया- “ब्राह्मं दिव्यं तथा पित्र्यं प्राजापत्यं च गौरवम्। सौरञ्च सावनं चान्द्रमार्क्षंषं मानानि वै नव।”6 अर्थात्- ब्राह्म, दिव्य, पित्र्य, प्राजापत्य, गौरव या बार्हस्पत्य, सौर, सावन, चान्द्र तथा नाक्षत्र ये नवविध कालमान स्वीकार किए गए हैं। कालमान के इस नवधा विभाजन को अन्य ऋषियों तथा अपेक्षाकृत अर्वाचीन दैवज्ञों ने भी स्वीकार किया है। पौलस्त्य के अनुसार- “ब्राह्मं दैवं मनोर्मानं पैत्र्यं सौरं च सावनम्। नाक्षत्रम् च तथा चान्द्रं जैवं मानानि वै नव।।” इसी प्रकार भास्कराचार्य व आचार्य कालिदास ने अपने ग्रन्थों क्रमशः “सिद्धान्तशिरोमणि”7 तथा “ज्योतिर्विदाभरणम्”8 में इन्हीं नवधा कालमानों को स्वीकृति प्रदान की है। व्यवहारप्रदीप में भी कहा गया है- “सौरमैन्दवमार्क्षंषं च दैवं जैवं च सावनम्। पैत्र्यं च मानुषं ब्राह्ममिति मानानि वै नव।।”9 अभिप्राय यह है कि सूर्य-सिद्धान्त प्रोक्त नवधा कालमान को परवर्त्ती आचार्यों तथा ग्रन्थकारों ने एकमत से स्वीकृति प्रदान की है। इन नवधा कालमानों को अध्ययन की दृष्टि से सावन, नाक्षत्र, चान्द्र, पित्र्य, सौर, दैव, गौरव या बार्हस्पत्य, प्राजापत्य तथा ब्राह्म क्रम से प्रस्तुत करना उचित प्रतीत होता है। (1) सावन मान- “सावनोऽर्कोदयैः।” अर्थात् सावन मान सूर्योदय पर आधारित होता है। दो सूर्योदयों के मध्य का काल स्पष्ट सावन दिन होता है।10 इसी सावन मान के सम्बन्ध में सूर्यसिद्धान्त स्पष्टतया कहता है- “उदयादुदयं मानोः सावनं तत् प्रकीर्तितम्।”11 इस सन्दर्भ में एक जिज्ञासा सहज ही उत्पन्न होती है कि सूर्योदय किसे मानें? जब सूर्यमण्डल का प्रथम बिन्दु क्षितिज से उदित हो अथवा जब सूर्यमण्डल का केन्द्र क्षितिज से बाहर आ जाए। इस जिज्ञासा का सहज समाधान यह है कि जब सूर्यमण्डल का केन्द्र क्षितिज से बाहर आ जाए तब उसे सूर्योदय माना जाएगा। इसी प्रकार के 30 सावन दिनों का समूह एक सावन मास कहा जाता है तथा 12 सावन मासों का एक सावन वर्ष होता है। सावन दिन का मान सामान्यतया नाक्षत्र अहोरात्र से 4 मिनट बड़ा होता है। परन्तु सावन दिन का मान बदलता रहता हैं इस सावन कालमान का उपयोग यज्ञादि, सूतकों का निर्धारण, दिनेश-मासेश-वर्षेश आदि के निर्णय तथा मध्यम ग्रहगति के निर्णय में किया जाता है।12 (2) नाक्षत्र कालमान- भचक्र अर्थात् नक्षत्रमण्डल का दैनिक भ्रमण कालमान एक नाक्षत्र दिन होता है।13 अभिप्राय यह है कि जितने काल में नक्षत्र मण्डल का एक चक्रभ्रमण पूर्ण होता है, उतना काल नाक्षत्र दिन कहा जाता है। नाक्षत्र दिन का मान ज्ञात करना अत्यन्त ही सहज है। किसी भी नक्षत्र के उदय काल को नोट कर लें, अर्थात् जिस समय कोई नक्षत्र क्षितिज पर उदित हो रहा हो वह समय लेना होता है, अगले दिन वही नक्षत्र जब पुनः उदित हो तो वह समय भी नोट कर लें। पहले दिन के नक्षत्र उदय काल तथा दूसरे दिन के नक्षत्र उदय काल के मध्य के कालमान के तुल्य ही नाक्षत्र अहोरात्र का भी मान होता है। सामान्यतया दोनों उदयों के बीच का समय 23 घंटा, 56 मिनट और 4 सेकेंड के तुल्य होता है। नाक्षत्र अहोरात्र का मान सामान्यता एक सा ही रहता है, इसमें वृद्धि या ह्रास नहीं होता है। हाँ इतना अवश्य है कि यदि तारों की बहुत सूक्ष्म गति पर विचार किया जाय तो इस मान में अत्यल्प भेद आ जाता है। नक्षत्र उदय का काल ज्ञात करना किञ्चित श्रमसाध्य है, क्योंकि ऐसे क्षितिज को ढूँढना जहाँ वृक्ष, पर्वतादि न हो, एकदम समतल मैदान हो मिलना कठिन है अतः अत्यधिक सूक्ष्म गणना के लिए उदयकाल से समय की परीक्षा नहीं की जाती है, अपितु मध्याह्न काल से की जाती है। इस दृष्टिकोण से नाक्षत्र अहोरात्र की परिभाषा इस प्रकार भी दी जाती है- “वसन्त सम्पात बिन्दु जिस क्षण याम्योत्तर वृत्त पर आता है, उस क्षण से लेकर फिर यह बिन्दु जिस क्षण याम्योत्तर वृत्त पर आता है उस क्षण तक के समय को नाक्षत्र दिन कहते हैं।”14 इसी प्रकार 30 नक्षत्र अहोरात्रों का एक नाक्षत्र मास तथा 12 नाक्षत्र मासों का एक नाक्षत्र वर्ष होता है। मासों के नामकरण का आधार भी नक्षत्र ही हैं। पूर्णिमा के अन्त में चन्द्रमा जिस नक्षत्र में होता है, उसी के नाम पर मासों का नामकरण होता है।15 (3) चान्द्रमान- चन्द्रमा की गति को आधार मानकर भी कालगणना की जाती है। अमावस्या को सूर्य और चन्द्रमा एक साथ रहते हैं। सूर्य और चन्द्रमा की इस युति के बाद सूर्य से पृथक् होकर चन्द्रमा पूर्व दिशा की ओर प्रतिदिन जितना जाता है उसे ही चान्द्रमान कहते हैं। अभिप्राय यह है कि जब सूर्य तथा चन्द्रमा के मध्य 12 अंश का अन्तर होता है, तो एक तिथि व्यतीत होती है।16 इसी प्रकार की तीस तिथियों से एक चान्द्रमास बनता है। चन्द्रमा की कलाओं के आधार पर इस चान्द्रमास को दो पक्षों शुक्ल पक्ष तथा कृष्ण पक्ष में विभक्त किया गया है। इस तरह शुक्ल पक्ष तथा कृष्ण पक्ष दोनों में ही 15-15 तिथियाँ होती हैं। शुक्ल पक्ष की पन्द्रहवीं तिथि को पूर्णिमा तथा कृष्ण पक्ष की पन्द्रहवीं तिथि को अमावस्या कहा जाता है। अमावस्या तिथि को आकाश में चन्द्र बिंब दिखाई नहीं देता है, परन्तु अगले ही दिन से चन्द्र बिंब धीरे-धीरे दिखाई देने लगता है। अतः जब आकाश मण्डल में चन्द्र बिंब क्रमशः बढ़ता हुआ दिखाई देता है तो वह पक्ष शुक्ल पक्ष कहा जाता है, जबकि पूर्णिमा के बाद का पक्ष जब चन्द्र बिंब क्रमशः घटता हुआ प्रतीत होता है, कृष्ण पक्ष कहा जाता है। इन्हीं 12 चान्द्र मासों के मिलने से एक चान्द्र वर्ष का निर्माण होता है। चान्द्र मासों का नामकरण नक्षत्रों के आधार पर किया जाता है। पर्वान्त अर्थात् पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा जिस नक्षत्र में होता है, उसी नक्षत्र के आधार पर उस मास का नामकरण होता है।17 फाल्गुन, भाद्रपद तथा आश्विन मास में तीन नक्षत्रों में से किसी एक का योग बन सकता है, जबकि अन्य मासों में पर्वान्त पर दो में से किसी एक नक्षत्र के योग की संभावना होती है और उसी के आधार पर उस मास की संज्ञा होती है। अधोलिखित सारिणी द्वारा इसे स्पष्टतः समझा जा सकता है-
पर्वात नक्षत्र
कृ रा
मृग. आर्द्रा
पुनर्वसु पुष्य
आश्लेषा मघा
पूफा.          उ. फा. हस्त
चित्रा स्वाती
विशाखा अनुराधा
ज्येष्ठा मूल
पूर्वाषाढा उत्तराषाढा
श्रवण घनिष्ठा
शत.पू.भा. उत्तराभाद्रपद्र
रेवती, अश्वनी
मास
कार्त्तिक
मार्गशीर्ष
पौष
माघ
फाल्गुन
चैत्र
वैशाख
ज्येष्ठ
आषाढ
श्रावण
भाद्रपद
अश्विन
          अभिप्राय यह है कि यदि पूर्णिमा को कृत्तिका नक्षत्र का योग हो रहा हो अथवा रोहिणी नक्षत्र में चन्द्रमा हो वह मास कार्त्तिक मास के नाम से जाना जाएगा। (4) पित्र्य मान- पित्र्य कालमान का सम्बन्ध चान्द्र मास से है। हम जानते हैं कि 30 चान्द्र तिथियों का एक चान्द्रमास होता है, तथा यही चान्द्रमास पितरों का एक अहोरात्र होता है।18 अमावस्या तिथि को इस पित्र्य अहोरात्र की मध्याह्न होती है तथा पूर्णिमा तिथि को पितरों की मध्यरात्रि होती है। कृष्ण पक्ष की साढे सात तिथि से पित्र्य अहोरात्र का दिनारम्भ होता है तथा शुक्ल पक्ष की साढे सात तिथि से पितरों की रात्रि का आरम्भ होता है।19 चान्द्र कालमान का प्रयोग तिथि, करण, विवाह, मुण्डन, व्रत-उपवास, यात्रा विषयक विचार, जातकर्म सदृश अन्य सभी कार्यों में होता है। चन्द्रमा के ऊपरी भाग में पितरों का निवास होता है और वे चन्द्रमा को अपने नीचे मानते हैं। पितरलोक में कृष्ण पक्षार्ध में सूर्य का उदय और शुक्ल पक्षार्ध में सूर्यास्त होना स्वभावतः सिद्ध है। (5) सौरमान- “प्रतिदिनं स्फुटभुक्तिमितिः सदा खरगभस्तिदनं विबुधैः स्मृतम्।”20 अर्थात् स्पष्ट सूर्य की एक दिन सम्बन्धी गति तुल्य काल को एक सौर दिन कहते हैं। एक संक्रान्ति से दूसरी संक्रान्ति पर्यन्त अर्थात् सूर्य जितने समय तक एक राशि पर रहता है, सौर मास कहा जाता है इन्हीं बारह सौरमासों का एक सौर वर्ष होता है।21 दिन-रात्रि मान, षडशीतिमुख संक्रान्तियों  का मान, अयन, विषुव तथा संक्रान्तियों का पुण्यकाल विषयक मान सौर कालमान द्वारा ही ज्ञात किया जाता है। तुलारम्भ से प्रत्येक 86वें दिन एक षडशीतिमुख संक्रान्ति होती है, इसके अतिरिक्त दो विषुव संक्रान्ति, दो अयन संक्रान्ति तथा 4 विष्णुपदी संक्रान्तियाँ भी होती हैं। विषुव संक्रान्ति (मेष, तुला), अयन संक्रान्ति (कर्क, मकर), षडशीतिमुख संक्रान्ति (मिथुन 18 अंश, कन्या 14 अंश, धनु 6 अंश तथा मीन 22 अंश) तथा विष्णुपदी संक्रान्ति (वृष, सिंह, वृश्चिक, कुम्भ) का मान सौर कालमान पर ही आधारित है। इसी प्रकार सूर्य के मकर राशि में संक्रमण काल से छः मास पर्यन्त अर्थात् मिथुनान्त तक सूर्य उत्तरायण होते हैं, जबकि कर्क संक्रान्ति से छः मास पर्यन्त अर्थात् धनुरन्त तक सूर्य दक्षिणायन होते हैं।22 ऋतु निर्णय प्रसङ्ग में स्पष्ट है कि उत्तरायण के आरम्भ से शिशिर, वसन्त व ग्रीष्म ऋतु तथा दक्षिणायन के आरम्भ से वर्षा, शरत् तथा हेमन्त ऋतुएँ क्रम से घटित होती हैं। इसी सन्दर्भ में सूर्य सिद्धान्त का वचन है- “द्विराशिनाथा ऋतवस्ततोऽपि शिशिरादयः”23 अभिप्राय है कि दो-दो राशियों का भोगकाल ऋतु कहा जाता है। (6) दैव कालमान- यह कालगणना सौरमान पर आधारित है। अर्थात् बारह सौर मासों का एक सौर वर्ष होता है तथा यही एक सौर वर्ष देवताओं के एक अहोरात्र के तुल्य होता है।24 इसी तथ्य को और अधिक स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि सूर्य के बारह राशियों के भोगकाल में देवताओं और दैत्यों का विपर्यय से क्रमशः अहोरात्र की व्यवस्था होती है। अर्थात् जब सायन सूर्य दक्षिणायन अर्थात् कर्कादि छः राशियों में होता है तब देवताओं की रात्रि होती है और ठीक इसी समय असुरों का दिन होता है। इसी प्रकार जब सायन सूर्य उत्तरायण अर्थात् मकरादि छः राशियों में होते हैं तब देवताओं का दिन होता है तथा उसी समय असुरों की रात्रि होती है। पृथिवी के उत्तरी-ध्रुव पर देवताओं का तथा दक्षिणी-ध्रुव पर असुरों का निवास माना गया है। आधुनिक शोध द्वारा यह बात प्रामाणित है कि धु्रवीय प्रदेशों में छः मास का दिन और छः मास की रात्रि होती है। सौर कालमान के अनुसार एक सौर वर्ष का मान एक दिव्य अहोरात्र के तुल्य होता है, अतः 360 सौर वर्षों का एक दिव्य वर्ष होता है। (7) प्राजापत्य मान- मन्वन्तर व्यवस्था के अन्तर्गत एक मनु के तुल्य काल प्राजापत्य मान कहा जाता है और इस प्राजापत्य मान में अहोरात्र का भेद नहीं होता है।25 प्राजापत्य मान को समझने के लिए युग, महायुगादि की परिकल्पना को स्पष्ट करना अनिवार्य है। एक सौर वर्ष के तुल्य एक दिव्य अहोरात्र का मान होता है और 360 सौर वर्षों के तुल्य एक दिव्य वर्ष होता है। बारह हजार दिव्यवर्ष या 4320000 सौर वर्षों (12000×360) के प्रमाण तुल्य एक चतुर्युग या महायुग होता है।26 71 महायुगों (चतुर्युगों) के बराबर 1 मनु कहा गया है।27 अर्थात् यदि एक मनु के अन्तर्गत दिव्य वर्षों की गिनती करें तो इसका मान 71×12000 (एक चतुर्युग मान) = 852000 दिव्य वर्ष होता है और यदि इसे हम सौर वर्षों में परिवर्तित करें तो यह 852000×360 (एक दिव्य वर्ष में सौर वर्षों की संख्या) = 306720000 सौर वर्ष के बराबर होता है। इसके साथ एक ध्यातव्य तथ्य यह है कि प्रत्येक मनु के आरम्भ तथा मनु की समाप्ति पर कृतयुग अर्थात् सतयुग तुल्य (4800 दिव्य वर्ष) की सन्धि होती है तथा इस सन्धि काल में सम्पूर्ण पृथिवी पर जल-प्लावन रहता है।28 एक चतुर्युग का मान 12000 दिव्य वर्ष कहा गया है, इस कालमान में कृत-त्रेता-द्वापर-कलियुग के वर्षमान के साथ-साथ कृतादि युगों के सन्ध्या तथा सन्ध्यांशों का मान भी सम्मिलित है। महायुग में चार लघु युग होते हैं तथा इनका कालमान धर्मपाद व्यवस्था के अनुरूप होता है, अर्थात् महायुग के मान के दशमांश को क्रमशः चार, तीन, दो तथा एक से गुणा करने पर क्रमशः कृत, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग का मान स्पष्ट होता है। प्रत्येक युग के मान के षष्ठांश के तुल्य लघु युगारम्भ तथा लघु युग समाप्ति पर एक-एक संधियाँ भी होती हैं। अर्थात् सन्ध्या तथा सन्ध्यांश से युक्त कृतादि युगों का मान क्रमशः 4800, 3600, 2400 तथा 1200 दिव्य वर्षों के तुल्य होता है। जबकि इन लघुयुगों के सन्धिकाल का मान क्रमशः 800, 600, 400 तथा 200 दिव्य वर्ष होता है। (8) ब्राह्म मान- “ब्राह्मं कल्पः प्रकीर्तितम्” अर्थात् कल्प के तुल्य ही ब्राह्म मान होता है।29 अभिप्राय यह है कि एक कल्प प्रमाण के तुल्य ब्रह्मा का दिन तथा एक कल्प के तुल्य ब्रह्मा की रात्रि का मान होता है। दो कल्पों के कालमान तुल्य ब्रह्मा का एक अहोरात्र होता है। एक कल्प में कुल 14 मनु होते हैं तथा प्रत्येक मनु के आरम्भ तथा समाप्ति पर कृतयुग प्रमाण तुल्य एक संधि भी होती है। इस प्रकार एक कल्प में कुल 14 मनु तथा 15 संधियाँ होती है। यदि एक कल्प के मान को दिव्य वर्षों में स्पष्ट करें तो- एक कल्प = 14 मनु + 15 सन्धि (कृतयुग तुल्य)। (14×852000) + (15×4800) = 11928000 + 72000 = 12000000 दिव्य वर्ष। (9) बर्हिस्पत्य या गौरव वर्ष- जिस मास में गुरु उदय या अस्त होते हैं, उस मास के अमावस्या तिथि को जो नक्षत्र हो, उसी नक्षत्र के नाम से गुरु वर्ष प्रारम्भ होता है।30 कृतिकादि दो-दो नक्षत्रों में बृहस्पति के रहने से कार्त्तिक आदि बारह मास की तरह बारह वर्ष होते हैं, इनमें केवल पञ्चम एकादश और द्वादश वर्ष तीन-तीन नक्षत्र के होते हैं।31 अभिप्राय यह है कि जिस तरह कार्तिक, मार्गशीर्ष पौषादि संज्ञक द्वादश मास होते हैं, ठीक उसी प्रकार बृहस्पति पर आधारित कार्त्तिकादि संज्ञक बारह वर्ष भी होते हैं तथा इन बारह वर्षों से सम्बन्धित विस्तृत फलकथन कई ग्रन्थों में उपलब्ध होता है। यहाँ यह ध्यान देने योग्य बात है, कि बृहस्पति के ये नक्षत्र संज्ञक वर्ष प्रभवादि 60 संवत्सरों से भिन्न होते हैं। ‘लघुवशिष्ठ सिद्धान्त’ में स्पष्टतया कहा गया है कि गुरु की मध्यम गति से तुल्य एक राशि में संचारवश जितना समय व्यतीत होता है, वही गुरु का एक वर्ष माना जाता है। प्रभवादि साठ सम्वत्सरों के आरम्भ के विषय में कहा गया कि “माघ शुक्ल के प्रारम्भ से जब शुक्ल पक्ष में, घनिष्ठा नक्षत्र में सूर्य, चन्द्र, गुरु विद्यमान थे तभी इन 60 प्रभवादि सम्वत्सरों की प्रवृत्ति हुई थी।32 पाँच वर्षों का एक युग माना जाता है, तथा युगों की संख्या बारह होती है, इस प्रकार बारह युगों में कुल 60 वर्षात्मक काल होता है। इन 60 संवतों की संज्ञा क्रमशः इस प्रकार है- प्रभव, विभव, शुक्ल, प्रमोद, प्रजापति, अङ्गिरा, श्रीमुख, भाव, युवा, धाता, ईश्वर, बहुधान्य, प्रमाथी, विक्रम, वृष, चित्रभानु, सुभानु, तारण, पार्थिव, व्यय, सर्वजित्, सर्वधारी, विरोधी, विकृत, खर, नन्दन, विजय, जय, मन्मथ, दुर्मुख, हेमलम्ब, विलम्ब, विकारी, शार्वरी, प्लव, शुभकृत्, शोभन, क्रोधी, विश्वावसु, पराभव, प्लवंग, कीलक, सौम्य, साधारण, विरोधकृत, परिधावी, प्रमाथी, आनन्द, राक्षस, अनल, पिङ्गल, कालयुक्त, सिद्धार्थ, रौद्र, दुर्मति, दुन्दुभी, रुधिरोद्गारी, रक्ताक्ष, क्रोधन और क्षय। इन 60 सम्वत्सरों में कुल 12 युग व्यतीत होते हैं तथा इन बारह युगों के अधिपतियों की भी बात की गई है तथा ये क्रमशः विष्णु, बृहस्पति, इन्द्र, अग्नि, प्रजापति, अहिर्बुधन्य, पितर, विश्वेदेवा, सोम, इन्द्राग्नि, अश्विनी कुमार और सूर्य हैं।        
          यद्यपि सूर्यसिद्धान्त में नवविधकालमानों की चर्चा हुई है, परन्तु इन नवविध कालगणना पद्धति में भी केवल सौर, चान्द्र, नाक्षत्र तथा सावन मान का ही व्यवहार होता है33, बार्हस्पत्य मान की आवश्यकता साठ संवत्सरों के ज्ञान में होती है तथा शेष चार अर्थात् ब्राह्म, पित्र्य, दिव्य व प्राजापत्य मानों की आवश्यकता नित्य व्यवहार में नहीं होती है। सूर्य सिद्धान्त प्रोक्त इन नवविध कालमानों की गणना पद्धति व सिद्धान्त को परवर्त्ती दैवज्ञों ने भी अपनी रचनाओं में प्रमुखता से स्थान दिया है, जो इन सिद्धान्तों की सार्वभौमिकता तथा स्वीकार्यता का परिचायक सिद्ध होता है।
सन्दर्भ
1. बृहस्पतिसंहिता, 1/5, 2. बृहत्संहिता, 2/4, 3. सूर्यसिद्धान्त, 1/2, 4. वही, 1/10, 5. वही,                 6. वही, 14/1, 7. सिद्धान्तशिरोमणि, 8. ज्यातिर्विदाभरणम्, 1/3, 9. बृहद्दैवज्ञरञ्जनम्, 3/64,                              10. ज्योतिर्विदाभरणम्, 1/5, 11. सूर्यसिद्धान्त, 14/18, 12. वही, 13. वही, 14/15, 14. सूर्यसिद्धान्त, विज्ञान भाष्य, पृ. 337, 15. सूर्यसिद्धान्त, 14/15, 16. वही, 14/12, 17. वही, 14/15-16,                        18. वही, 14/14, 19. सिद्धान्तशिरोमणि, 20. ज्योतिर्विदाभरणम्, 1/5, 21. सूर्यसिद्धान्त, 1/13,               22. वही, 14/9-10, 23. वही, 14/10, 24. वही, 1/13, 25. वही, 14/21, 26. वही, 1/15,             27. वही, 1/18, 28. वही, 29. वही, 14/21, 30. वही, 14/17, 31. बृहत्संहिता, 8/2,                          32. वृहदैवज्ञरञजनम्, 4/5, 33. सूर्य सिद्धान्त, 14/2