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Wednesday, 19 September 2018

सूर्यसिद्धान्त में युग- विषयक अवधारणा


        ज्योतिषशास्त्र के सिद्धान्त स्कन्ध की रचनाआें में सूर्य-सिद्धान्त का स्थान अन्यतम माना जाता है। ज्योतिष वेदाङ्ग के पञ्चस्कन्धों में सिद्धान्त स्कन्ध के वर्ण्यविषय के सन्दर्भ में कहा गया है कि 'त्रुटि से लेकर कल्पकाल तक की कालगणना, सौर चान्द्र-सावन- नाक्षत्र-पैत्र्य-बार्हस्पत्य वर्ष, विभिन्न प्रकार के मास, ग्रह-गतियों का निरूपण, व्यक्त-अव्यक्त गणित का प्रयोजन, विविध प्रश्नोत्तर विधि, ग्रहों व नक्षत्रों की स्थिति, नाना प्रकार के तुरीय-नालिकादि यन्त्रों की निर्माण विधि, देश व काल ज्ञान के अनन्यतम उपयोगी अंग-अंगक्षेत्र सम्बन्धी अक्षज्या, लम्बज्या, द्युज्या, कुज्या, समशंकु इत्यादि का आनयन रहता है।
     सूर्यसिद्धान्त के दो संस्करण उपलब्ध होते हैं- (1) आर्ष सूर्य सिद्धान्त (2) पञ्चसिद्धान्तिका प्रोक्त सूर्यसिद्धान्त। वराहमिहिर की पञ्चसिद्धान्तिका में जिन सौरादि पाँच सिद्धान्तों का वर्णन है, वे सम्प्रति उपलब्ध नहीं हैं। ये पाँच सिद्धान्त ग्रन्थ 'प्राचीन सिद्धान्तपञ्चक' कहे जाते हैं। प्राचीन सिद्धान्तपञ्चक के अन्तर्गत पितामह सिद्धान्त, वशिष्ठ सिद्धान्त, रोमक सिद्धान्त, पुलिश सिद्धान्त तथा सूर्य सिद्धान्त आते हैं। इनका काल शकपूर्व पाँचवीं शताब्दी माना गया है। जबकि वर्त्तमान सिद्धान्तपञ्चक के अन्तर्गत सूर्य सिद्धान्त (आधुनिक), सोम सिद्धान्त, वशिष्ठ सिद्धान्त, रोमश सिद्धान्त तथा शाकल्योक्त ब्रह्मसिद्धान्त आते हैं। सिद्धान्त ग्रन्थों की इस समृद्ध परम्परा में सूर्य सिद्धान्त को सर्वाधिक शुद्ध सिद्धान्त ग्रन्थ के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त है, जिसके समर्थन में कहा गया है-           'स्पष्टा ब्राह्मस्तु सिद्धान्तस्तस्यासनस्तु रोमशः।
सौरः स्पष्टतरोऽस्पष्टौ वसिष्ठः पौलिशश्चतौ।।'
    अर्थात् ब्राह्मसिद्धान्त सूक्ष्म है, रोमशसिद्धान्त भी ब्राह्मसिद्धान्त जैसा ही है, सूर्यसिद्धान्त सबसे अधिक सूक्ष्म अर्थात् स्पष्टतर है जबकि वशिष्ठसिद्धान्त तथा पौलिशसिद्धान्त अस्पष्ट हैं। सूर्य सिद्धान्त में वर्णित युग विषयक सिद्धान्त तथा वेदाङ्ग ज्योतिष में वर्णित युग विषयक परिकल्पना में पर्याप्त मतभेद है। जहाँ वेदाङ्ग ज्योतिष में ‘पञ्चसम्वत्सरात्मकं युगम्’ अर्थात् पाँच सम्वत्सर वाले युग की बात कही गई है, वहीं ‘सूर्यसिद्धान्त’ वर्णित युग विषयक परिचर्चा अपेक्षाकृत अधिक विस्तृत है। ‘सूर्यसिद्धान्त’ ग्रन्थ के आरम्भ में ही ‘कृत’ शब्द द्वारा सर्वप्रथम युग विषयक संकेत उपलब्ध होता है। ‘युग’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग मध्यमाधिकार के श्लोक संख्या आठ में हुआ है- 'युगे युगे महर्षीणां' तथा इसके ठीक बाद श्लोक संख्या नौ में भी यह शब्द प्रयुक्त हुआ है- 'युगानां परिवर्त्तेन---।' सूर्यांश पुरुष द्वारा मयासुर को ज्योतिषशास्त्रविषयक परम पुण्यप्रद तथा गोपनीय ज्ञान देने के प्रसङ्ग में काल का द्विविध विभाजन किया गया-
(1) लोकानामन्तकृत काल तथा
(2) कलनात्मक काल।
     कलनात्मक काल की विशद् चर्चा के प्रसङ्ग में ही आगे चलकर युग व महायुग विषयक परिकल्पना का अत्यन्त विस्तृत व गूढ़ वर्णन प्राप्त होता है। सूर्य-मयासुर संवाद प्रसङ्ग  में कलनात्मक काल विषयक अवधारणा को स्पष्ट किया गया है और कहा गया है कि छः प्राण के तुल्य एक विनाडी होती है तथा साठ विनाडी की एक नाडी होती है। इन्हीं साठ नाडियों के काल परिमाण तुल्य एक नाक्षत्र अहोरात्र होता है। काल के इस वर्गीकरण में सर्वप्रथम ‘प्राण’ शब्द प्रयुक्त हुआ है तथा ‘प्राण’ कालमान के विषय में कहा गया है कि दस दीर्घाक्षर उच्चारण काल के तुल्य इस ‘प्राण’ संज्ञक कालखण्ड का मान होता है। नाक्षत्र अहोरात्र को स्पष्ट करने के उपरान्त अहोरात्र के तीन अन्य प्रकारों अर्थात् सावन, सौर तथा चान्द्र तिथियों के सन्दर्भ में भी सूर्यांश पुरुष ने मयासुर को उपदेश दिया है। एक नक्षत्रोदय से दूसरे नक्षत्रोदय के मध्य का काल नाक्षत्र अहोरात्र, एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय के मध्य का काल सावन दिन, चन्द्रमा की एक कला तुल्य तिथि तथा सूर्य द्वारा एक अंश के भोगकाल को एक सौर अहोरात्र कहते हैं। उपरोक्त चतुर्विध अहोरात्रें के समान ही चतुर्विध मास तथा चतुर्विध वर्ष भी कहे गए हैं। तीस नाक्षत्र अहोरात्रों का एक नाक्षत्र मास, तीस चान्द्र तिथियों का एक चान्द्रमास, तीन सावन दिनों का एक सावन मास तथा तीस सौर अहोरात्रों  या सूर्य द्वारा एक राशि का भोग करने में लगने वाले समय को एक सौर मास कहते हैं। इन चार प्रकार के मास के समान ही चतुर्विध वर्ष भी कहे गए हैं- नाक्षत्र वर्ष, सौर वर्ष, सावन वर्ष तथा चान्द्र वर्ष। बारह नाक्षत्र मासों का एक नाक्षत्र वर्ष, बारह चान्द्र मासों का एक चान्द्र वर्ष, बारह सौर मासों का एक सौर वर्ष तथा बारह सावन मासों का एक सावन वर्ष कहा गया है। स्पष्ट है- 'मासै र्द्वादशभिर्वर्षं' अर्थात् बारह मासों का एक वर्ष कहा गया है। युग विषयक काल-गणना के सन्दर्भ में सौर कालमान ही ग्राह्य है। सौर वर्ष की गणना के क्रम में कहा गया है कि सूर्य छः मास उत्तरायण तथा छः मास दक्षिणायन रहते हैं। एक सौर वर्ष का मान एक दिव्य अहोरात्र के तुल्य कहा गया है।अभिप्राय यह है कि दिव्यकालमान के अनुसार छः मास का दिन तथा छः मास की रात्रि होती है। दिव्यकालमान के प्रसङ्ग में यह ध्यातव्य है कि यह कालमान देवताओं तथा असुरों के सन्दर्भ में ही ग्राह्य है। पृथिवी के उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुवाें पर क्रमशः देवताओं तथा असुरों का निवास स्थान माना गया है। ‘सूर्यसिद्धान्त’ के अनुसार 360 सौर वर्षों या 360 दिव्य अहोरात्रों के तुल्य एक दिव्य वर्ष होता है अर्थात् 360 सौर वर्ष = 1 दिव्य वर्ष। एक चतुर्युग अर्थात् सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग तथा कलियुग का मान बताते हुए कहा गया है कि देवताओं तथा असुरों के वर्ष प्रमाण तुल्य अर्थात् दिव्य वर्ष के प्रमाण से बारह हजार दिव्य वर्षों का एक चतुर्युग या महायुग होता है, अर्थात् 12,000 दिव्य वर्ष = 1 महायुग (सतयुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग)। महायुग अर्थात् चतुर्युग के कालमान को यदि सौर वर्ष में परिवर्त्तित किया जाय तो इस विषय में सूर्य सिद्धान्त की उक्ति है- 'सूर्याब्दसंख्यया द्वित्रिसागरैरयुताहतैः' अर्थात् 43,20,000 सौर वर्षों के तुल्य एक महायुग होता है। दिव्य वर्षों को सौर वर्षों में परिवर्त्तित करने के लिए यहाँ एक सामान्य गणितीय संक्रिया गुणन का आश्रय लिया गया है। सूर्य सिद्धान्त के मतानुसार एक दिव्य वर्ष 360 सौर वर्षों के तुल्य माना गया है, अतः दिव्य वर्ष को सौर वर्षों में परिवर्त्तित करने के लिए दिव्य वर्ष के मान में 360 से गुणन द्वारा इसे सौर वर्ष में परिणत किया जा सकता है- 12000 दिव्य वर्ष × 360 = 4320000 सौर वर्ष।
   इस प्रसङ्ग में कुछ गणितीय सूत्र भी उपलब्ध हो जाते हैं- (1) दिव्य वर्ष × 360 = सौर वर्ष तथा (2) सौर वर्ष ÷ 360 = दिव्य वर्ष। ‘सूर्यसिद्धान्त’ में बारह हजार दिव्य वर्षों के तुल्य एक चतुर्युग का मान बताया गया है, परन्तु यहाँ यह ध्यातव्य है कि एक महायुग के अन्तर्गत जो चार युग हैं, उनका कालमान समान नहीं होता है। इसे स्पष्ट करते हुए सूर्य सिद्धान्त में कहा गया है कि कृतयुगादि प्रत्येक युगों के सन्ध्या तथा संध्यांशों से युक्त कालमान का आधार धर्मपाद व्यवस्था है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग तथा कलियुग में धर्म की अवस्था अलग-अलग होती है, अभिप्राय यह है कि सतयुग में धर्म अपने चारों चरणों से स्थित रहता है, त्रेता युग में धर्म के तीन चरण स्थित होते हैं, द्वापर में धर्म अपने दो चरणों से उपस्थित रहता है जबकि कलियुग में धर्म अपने एकमात्र चरण द्वारा स्थित रहता है। स्पष्ट है कि सतयुग में धर्म के चार चरण, त्रेता में धर्म के तीन चरण, द्वापर में दो चरण तथा कलियुग में धर्म का एक चरण स्थित होता है। इसी धर्मपाद व्यवस्था के अनुसार ही चतुर्युग में भी चारों युगों का अलग-अलग कालमान होता है। इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि सूर्य सिद्धान्त के अनुसार चतुर्युगों की कुल वर्षात्मक संख्या के चार पाद तुल्य सतयुग, तीन पाद तुल्य त्रेतायुग, दो पाद तुल्य द्वापर युग तथा एक पाद तुल्य कलियुग का मान होता है। इसे और अधिक स्पष्ट करना चाहें तो हम कह सकते हैं कि चतुर्युगों की कुल पाद संख्या को यदि हम क्रमशः जोड़ें तो कुल पादों की संख्या 4(सतयुग) + 3(त्रेतायुग) + 2(द्वापरयुग) + 1(कलियुग) = 10 होती है, अर्थात् चतुर्युगों के सम्पूर्ण काल का दशमांश ही एक पाद के तुल्य होता है। इसी तथ्य को ‘सूर्यसिद्धान्त’ के मध्यमाधिकार के श्लोक संख्या 17 में स्पष्ट रूप से कहा गया है-
'युगस्य दशमो भागश्चतुस्त्रिद्वेकसंगुणः।'
     चतुर्युग के कालमान संख्या के इसी दशमांश में क्रमशः चार, तीन, दो तथा एक से गुणा करने पर सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग तथा कलियुग का वर्षात्मक मान उसके सन्ध्या तथा सन्ध्यांशों सहित ज्ञात होता है। उपरोक्त सिद्धान्त के आधार पर यदि कृतादि युगों का मान सन्ध्या तथा सन्ध्यांशों के साथ स्पष्ट करें तो सर्वप्रथम चतुर्युग अर्थात् महायुग के कालमान का दशमांश ज्ञात करना होता है- 12000 दिव्य वर्ष ÷10 = 1200 दिव्य वर्ष। अर्थात् चतुर्युग के दशमांश का मान 1200 दिव्य वर्ष के तुल्य होता है। अब धर्मपाद व्यवस्था के अनुसार इस दशमांश में क्रमशः चार, तीन, दो तथा एक से गुणा करने पर   सतयुग = 1200 × 4 = 4800 दिव्य वर्ष,
त्रेतायुग = 1200 × 3 = 3600 दिव्य वर्ष,
द्वापरयुग = 1200 × 2 = 2400 दिव्य वर्ष तथा कलियुग = 1200 × 1 = 1200 दिव्य वर्ष प्रमाण का कालमान प्राप्त होता है। यहाँ ध्यातव्य है कि कृतादि चारों युगों के ये दिव्य वर्षात्मक मान सन्ध्या तथा सन्ध्यांशों से युक्त हैं। इसी कालमान को यदि सौरवर्ष में ज्ञात करना हो तो सूर्य सिद्धान्त के मतानुसार सतयुग = 4800 दिव्य वर्ष × 360 = 1728000 सौर वर्ष, त्रेतायुग = 3600 दिव्य वर्ष × 360 = 1296000 सौर वर्ष, द्वापरयुग = 2400 दिव्य वर्ष × 360 = 864000 सौर वर्ष तथा कलियुग = 1200 दिव्य वर्ष × 360 = 432000 सौर वर्ष मान सिद्ध होता है। इन चारों युगों के सौर वर्षात्मक मान का यदि योग किया जाय तो 1728000+1296000+864000+432000 = 4320000 सौर वर्ष प्राप्त होता है जो सूर्य सिद्धान्त प्रोक्त महायुग के सौरमान के तुल्य है। सूर्य सिद्धान्त में युग विषयक सिद्धान्तों के प्रतिपादन के प्रसङ्ग में बारम्बार ‘सन्ध्या’ तथा ‘सन्ध्यांश’ शब्द का प्रयोग किया गया है। उपरोक्त कृतादि युगों के कालमान भी सन्ध्या तथा सन्ध्यांशों से युक्त ही हैं। प्रत्येक युग के आरम्भ तथा समाप्ति के बाद सन्धि काल होता है। कृतादि चारों युगों के आरम्भ व समाप्ति के उपरान्त यह सन्धिकाल आता है तथा इन चारों युगों के सन्धिकाल का मान भी समान न होकर परस्पर भिन्न होता है। ‘सूर्यसिद्धान्त’ इस सन्दर्भ में अत्यन्त स्पष्ट रूप से कहता है-
'क्रमात् कृतयुगादीनां षष्ठांशः सन्ध्ययोः स्वकः'
     अर्थात् कृतादि चारों युगों का अपने-अपने युगमान के षष्ठांश तुल्य दोनों सन्धियों का मान होता है। इस सिद्धान्त के अनुसार कृतादि चारों युगों की सन्धियों का पृथक्-पृथक् मान स्पष्ट किया जा सकता है। अतः कृतयुग सन्धि = 4800 ÷ 6 = 800 दिव्य वर्ष, त्रेतायुग सन्धि = 3600 ÷ 6 = 600 दिव्य वर्ष, द्वापरयुग सन्धि = 2400 ÷ 6 = 400 दिव्य वर्ष तथा कलियुग सन्धि = 1200 ÷ 6 = 200 दिव्य वर्ष के तुल्य होता है। प्रत्येक युग के सन्ध्या तथा सन्ध्यांशों का यह सम्मिलित मान है। प्रत्येक युग के आरम्भ तथा समाप्ति पर होने वाले सन्ध्या तथा सन्ध्यांशों का मान क्रमशः इस प्रकार होता है- सतयुग - 800 ÷ 2 = 400 दिव्य वर्ष,
त्रेतायुग - 600 ÷ 2 = 300 दिव्य वर्ष,
द्वापरयुग - 400 ÷ 2 = 200 दिव्य वर्ष तथा कलियुग - 200 दिव्य वर्ष ÷ 2 = 100 दिव्य वर्ष। इन सन्ध्या तथा सन्ध्यांशों के पृथक्-पृथक् मान को यदि सौर वर्षों में परिवर्त्तित किया जाए तो ये क्रमशः सतयुग = 400 दिव्य वर्ष × 360 = 144000 सौर वर्ष, त्रेतायुग = 300 दिव्य वर्ष × 360 = 108000 सौर वर्ष, द्वापरयुग = 200 दिव्य वर्ष × 360 = 72000 सौर वर्ष तथा कलियुग = 100 दिव्य वर्ष × 360 = 36000 सौर वर्ष के तुल्य होता है। इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि सतयुग के आरंभ तथा समाप्ति पर 400-400 दिव्य वर्षों का सन्धिकाल, त्रेतायुग के आरम्भ तथा समाप्ति पर 300-300 दिव्य वर्षों का सन्धिकाल, द्वापर युग के आदि तथा समाप्ति पर 200-200 दिव्य वर्षों का सन्धिकाल तथा कलियुग के आरम्भ तथा समाप्ति पर 100-100 दिव्य वर्षों के तुल्य सन्धि काल होता है।
    सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग तथा कलियुग के सन्धि तथा सन्ध्यंशों के कालमान स्पष्ट हो जाने के बाद सन्धि रहित सतयुगादि चारों युगों का कालमान भी स्पष्ट किया जा सकता है।
सतयुग का सन्धि रहित कालमान = 4800 दिव्य वर्ष - 800 दिव्य वर्ष = 4000 दिव्य वर्ष,
त्रेतायुग का सन्धि रहित कालमान = 3600 दिव्य वर्ष - 600 दिव्य वर्ष = 3000 दिव्य वर्ष,
द्वापर युग का सन्धि रहित कालमान = 2400 दिव्य वर्ष - 400 दिव्य वर्ष = 2000 दिव्य वर्ष तथा कलियुग का सन्धि रहित कालमान = 1200 दिव्य वर्ष -200 दिव्य वर्ष = 1000 दिव्य वर्ष।
   सन्ध्या तथा सन्ध्यांश से रहित युगमानों को यदि सौर वर्ष में परिवर्त्तित किया जाय तो कृतयुग का सन्ध्या तथा सन्ध्यांश रहित कालमान = 4000 दिव्य वर्ष × 360 = 1440000 सौर वर्ष, त्रेतायुग का सन्ध्या तथा सन्ध्यांश रहित कालमान = 3000 दिव्य वर्ष × 360 = 1080000 सौर वर्ष, द्वापर युग का सन्ध्या तथा सन्ध्यांश रहित कालमान = 2000 दिव्य वर्ष × 360 = 720000 सौर वर्ष तथा कलियुग का सन्ध्या व सन्ध्यांशरहित कालमान = 1000 दिव्य वर्ष × 360 = 360000 सौर वर्ष सिद्ध होता है।
     सूर्य सिद्धान्त में वर्णित उपरोक्त युग विषयक परिकल्पना अत्यन्त ही स्पष्ट तथा सूक्ष्म सिद्ध होता है। चतुर्विध अहोरात्र मान से लेकर सौर काल मान को आधार मानते हुए मास, अयन, वर्ष व महायुग विषयक सिद्धान्तों को अत्यन्त सरल व सुबोध शैली में प्रस्तुत करना इस ग्रन्थ के वैशिष्ट्य को प्रमाणित करता है। सूर्य सिद्धान्त प्रोक्त इस युग विषयक सिद्धान्त व कालगणना को परवर्ती दैवज्ञों तथा गणितशास्त्र के विद्वानों ने अत्यन्त श्रद्धापूर्वक स्वीकार किया है। सूर्यसिद्धान्त की प्राचीनता सिद्ध है तथा इतने प्राचीन ग्रन्थ में कालविषयक गणना, कैलेण्डर पद्धति, गणितीय संक्रियाओं का शुद्ध व सूक्ष्म प्रयोग तत्कालीन समाज में गणितशास्त्र व खगोलशास्त्र के ज्ञान व अध्ययन परम्परा की समृद्धता को प्रस्तुत करता है। 

वैदिक गणित और भारतीय गणितशास्त्रीय परम्परा

              वेद शब्द की व्युत्पत्ति ‘विद्’ धातु से हुई है जिसका अर्थ होता है ‘ज्ञान’ (विद्-ज्ञानेन), जिससे वेद का अर्थ ‘ज्ञान संग्रह’ स्पष्ट होता है। पाश्चात्य विद्वान भी इस शब्द का प्रयोग इसी सन्दर्भ में करते हैं और दोनों ही परम्पराओं के सामञ्जस्य से वेद की परिभाषा 'साक्षात्कार किए हुए ज्ञान का संग्रह' सिद्ध होता है। वैदिक संहिताओं को न केवल आर्य जाति का प्रमाणस्वरूप माना जाता है, अपितु यह समस्त विश्व संस्कृति के आधार स्तम्भ के रूप में भी समादृत हैं। वेदों में ज्ञान और विज्ञान का अनन्त भण्डार उपलब्ध होता है। प्राचीन ऋषि-महर्षियों ने गहन चिन्तन व मनन द्वारा विज्ञान के समस्त विषयों का वर्णन इस ज्ञान सरिता में किया है। वेदों के इसी सार्वभौमिकता और सर्वज्ञान युक्त होने का समर्थन मनुस्मृति में भी किया गया है- 'सर्वज्ञानमयो हि सः'
गणितशास्त्र
       विज्ञान व ज्ञान की अन्य शाखाओं के समान ही गणितशास्त्र भी अपने बीज रूप अथवा मूलरूप में वैदिक संहिताओं में उपलब्ध होता है। विभिन्न प्रकार की छोटी-बड़ी संख्याओं तथा ज्यामितीय संरचनाओं से संबंधित विपुल वर्णन का इन ग्रन्थों में उपलब्ध होना तत्कालीन समाज में गणितशास्त्र की उपस्थिति को सहज ही सिद्ध कर देता है। परन्तु यह तथ्य भी उतना ही सत्य है कि आधुनिक काल में उपलब्ध गणित का स्वरूप प्राचीनकाल में पूर्णतया उपलब्ध नहीं था और वैदिक काल के गणित को आधुनिक काल तक के विकासक्रम में सहस्रों वर्षों के कालक्रम से गुजरना पड़ा है।  
गणित शब्द की व्युत्पत्ति तथा अर्थ
           गणित शब्द ‘गण्’ धातु में क्त प्रत्यय के योग से निष्पन्न होता है तथा ‘गण’ धातु का सामान्य अर्थ होता है गिनना। अर्थात् कहा जा सकता है कि जिस शास्त्र में ‘गणना’ ही मूल कर्म है ‘गणितशास्त्र’ है। भारत में गिनती के लिए ‘गणन’ शब्द का प्रयोग होता है और इसी शब्द से ‘गणित’ की उत्पत्ति हुई है। इससे स्पष्ट है कि गणित विषय का विकास व उत्पत्ति गिनती से ही आरम्भ हुआ है। संस्कृत व्याकरण में सामान्य रूप से ‘क्त’ प्रत्यय भूतकाल के अर्थ में प्रयुक्त होता है, अतः इस प्रकार ‘गणित’ शब्द गिने हुए अर्थ का बोधक है। गणितशास्त्र के महत्त्व को महर्षि लगध ने अपनी रचना वेदाङ्ग ज्योतिष में भी स्वीकार किया है और कहा है-
' यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा।
तद्वद् वेदाङ्गशास्त्रणां गणितं मूर्धनिस्थितम्।।'
         न केवल वैदिक संहिताओं में अपितु जैन गणितज्ञ महावीराचार्य ने भी अपनी रचना ‘गणितसार संग्रह’ में गणित के महत्त्व को स्वीकार किया है और कहा है कि इस चराचर जगत् में ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जिसके मूल में गणित न हो।
भारतीय गणितशास्त्र का विकास क्रम
        भारतीय संस्कृति के दृष्टिकोण से देखा जाय तो वैदिक काल से लेकर आधुनिक काल तक गणितशास्त्र के विकास की सतत् प्रक्रिया चल रही है। परन्तु इस विकास यात्रा को काल के बंधन में बांधना अनिवार्य हो जाता है। इस प्रकार हम देखें तो गणितशास्त्र की परम्परा को आदिकाल, शैशवकाल अथवा अंधकार युग, मध्यकाल अथवा स्वर्णयुग, उत्तरकाल तथा वर्त्तमान काल में विभक्त किया जा सकता है। ऋग्वेद का यह मंत्र
'द्वादशारं हि तज्जराय वर्वति चक्रं परिधामृतस्य '          वैदिक काल में विभिन्न संख्याओं के प्रयोग को दर्शाता है। इसी प्रकार 'भिनद् वलस्य परिधीन इव त्रितः' मन्त्र परिधि, व्यास आदि ज्यामितीय शब्दावली के वैदिक प्रयोग को पुष्ट करता है।
'चतुर्भिः साकंनवतिं च नामभिः चक्रं न वृत्तं व्यतींरवीविपत्।' मन्त्र भी वैदिक ऋषियों के ज्यामितीय ज्ञान को प्रदर्शित करता है। कहा जाता है कि प्राचीन भारतवर्ष में किसी विज्ञान ने न तो स्वाधीन अस्तित्व ही प्राप्त किया और न ही उसका स्वतन्त्र रूप से विकास ही हुआ। वैदिक कालीन भारत में जिस किसी भी विज्ञान का जो विकास हुआ है उसकी उत्पत्ति और विकास किसी न किसी वेदाङ्ग के अन्तर्गत हुआ है। गणितशास्त्र भी इसका अपवाद नहीं है और वेदपुरुष के नेत्रस्थानीय वेदाङ्ग ‘ज्योतिष’ के द्वारा इस गणितशास्त्र का अभूतपूर्व विकास संभव हो पाया। जहाँ ऋग्वेद के कई सूक्त और मन्त्र गणितशास्त्र के प्रमुख अङ्ग संख्या आदि का वर्णन करते हैं वहीं यजुर्वेद में स्पष्टतया ‘गणक’ शब्द का प्रयोग हुआ है। इसी तरह शुल्ब काल में रेखागणित का विशेष विस्तार हुआ। इन ग्रन्थों में विभिन्न प्रकार के यज्ञवेदियों के निर्माण प्रसङ्ग में ज्यामितीय विषयों का विशेष विकास हुआ। बौधायन शुल्बसूत्र (लगभग 1000 ई.पू.) में स्पष्टतया कहा गया कि- 'दीर्घचतुरश्रस्याक्ष्ण्यारज्जुः पार्श्वमानी तिर्यघ्मानी च यत्पृथग्भूतेकुरुतस्तदुभयं करोति।' पाइथागोरस का प्रमेय इसी ज्यामितीय सिद्धान्त पर आधारित है। इसी ग्रन्थ में π (पाई) का मान  बताया गया है और कहा है- 'यूपावटाः पदविष्कम्भाः त्रिपदरिणाहानि यूपोपराणीति।' गणितशास्त्र में मूलरूपेण आठ परिकर्म माने गए हैं- संकलन, व्यकलन, गुणन, भागहार, वर्ग, वर्गमूल, घन तथा घनमूल। 
 

   जैन गणितज्ञ इससे कुछ अलग विषयों की गणना करते हैं- परिकर्म, व्यवहार, रज्जु (रस्सी अर्थात् क्षेत्र गणित), राशि (त्रैराशिक), कला सवर्णन (भिन्नसम्बन्धी परिकर्म), यावत्तावत् (जितना उतना अर्थात् अज्ञात राशि का प्रयोग, वर्ग, घन, वर्गावर्ग (चतुर्घात) तथा विकल्प (क्रमचय और संचय) जैन गणितज्ञों ने गणितशास्त्र को अतिसूक्ष्म सिद्ध किया है और इसकी तुलना वज्र से की है- 'गणितं सूक्ष्मं गणितं संकलानादि तदेव सूक्ष्मं, सूक्ष्मबुद्धिगम्यत्वात्, श्रूयते च वज्रान्तं गणितममिति।' वक्षाली पाण्डुलिपि, गणित तिलक, गणितसार संग्रह, पाटी गणित, गणित कौमुदी आदि ग्रन्थों में गणितशास्त्र विषयक सिद्धान्तों पर पर्याप्त चर्चा उपलब्ध होती है। ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त में स्पष्टतया गणित की 20 क्रियाओं तथा 8 व्यवहारों को स्वीकार किया गया- 'परिकर्मविंशतिं यः संकलिताद्यां पृथग्विजानाति। अष्टौ च व्यवहारान् छायान्तान् भवति गणकः सः।'
        इस प्रकार ज्योतिषशास्त्रीय ग्रन्थों तथा दैवज्ञों, गणकों के अथक परिश्रम से गणित स्वतंत्र शास्त्र बनकर नित्य ही उन्नति की ओर अग्रसर हुआ और बीजगणित, रेखागणित, क्षेत्रगणित, त्रिकोणमिति, गतिविज्ञान, स्थिति विज्ञान, सांख्यिकी आदि अनेक शाखाओं के रूप में विस्तार को प्राप्त हुआ। विस्तार को प्राप्त होने के कारण गणितशास्त्र के विषय भी विस्तृत हुए और गणित के परिकर्मों तथा व्यवहारों में काफी जटिलताएँ भी उत्पन्न हुई। इन्हीं जटिलताओं का प्रभाव आज भी प्रारम्भिक, माध्यमिक अथवा उच्च कक्षाओं के छात्रों पर दृष्टिगोचर होता है। गणितीय परिकर्मों की  के सरलीकरण की दिशा में 'जगद्गुरु स्वामी श्री भारतीय कृष्णतीर्थ ' द्वारा दृष्ट वैदिक गणित के सूत्रों का महत्त्व अद्वितीय है।
वैदिक गणित व इसके द्रष्टा ऋषि 
     वैदिक गणित जैसा कि सुनने से ही प्रतीत होता है कि यह रचना किसी वैदिक संहिता से सम्बद्ध है। परन्तु ऐसा नहीं है, हाँ इतना अवश्य है कि वैदिक गणित के सूत्रों तथा उपसूत्रों के प्राप्ति की विधि अवश्य वैदिक है। ऋषि शब्द की व्युत्पत्ति बताते हुए कहा गया है- 'ऋषयो मन्त्रद्रष्टारः' इसी वैदिक परिभाषा के अनुरूप ही स्वामी जी को इन मन्त्रों का साक्षात्कार हुआ। वैदिक गणित के अन्तर्गत 16 मुख्य सूत्र हैं- एकाधिकेन पूर्वेण, निखिलम् नवतश्चरमं दशतः, उर्ध्वातिर्यगभ्याम्, परावर्त्य योजयेत्, शून्यम् साम्यसमुच्चये, आनुरुप्ये (शून्य मन्यत्), संकलन व्यवकलनाभ्याम्, पूरणापूरणाभ्याम्, चलनकलनाभ्याम्, यावदूनम्, व्यष्टिसमष्टिः, शेषण्यघ्केन चरमेण, सोपान्त्यद्वयमन्त्यम्, एकन्यूनेन पूर्वेण, गुणितसमुच्चयः, गुणकसमुच्चयः। इसी प्रकार 16 उपसूत्र अथवा उपप्रमेय भी हैं- आनुरुप्येण शिष्यते शेषसंज्ञः, आद्यमाद्येनान्त्यमन्त्येन, केवलैः सप्तकं गुण्यात्, वेष्टनम्, यावदूनं तावदूनम्, यावदूनं तावदूनीकृत्य वर्गं चयोजयेत्, अन्त्ययोर्दशकेऽपि, अन्त्ययोरेव, समुच्चयगुणितः, लोपनस्थापनाभ्याम्, विलोकनम्, गुणित समुच्चयः समुच्चयगुणितः।        

 उपरोक्त सूत्रों, उपसूत्रों अथवा उपप्रमेयों द्वारा गणित के क्लिष्ट परिकर्मों को सहज ही संपादित किया जा सकता है। गणितशास्त्र की पारम्परिक विधि द्वारा जिन परिकर्मों को करने में काफी समय लगता है तथा मानसिक ऊहापोह से गुजरना पड़ता है, वहीं वैदिक गणित के सूत्र उन्हीं परिकर्मों को सहज ही संपादित कर देते हैं। एकाधिकेन पूर्वेण सूत्र दी गई संख्या से अगली संख्या प्राप्त करने के लिए प्रयुक्त होता है। निखिलम् नवनश्चरमं दशतः सूत्र क्रियात्मक आधार से पूरक ज्ञात करने के सन्दर्भ में प्रयोग में आता है। इसी तरह उर्ध्वतिर्यगम्याम् गुणन करने में प्रयुक्त होता है। इसी प्रकार अन्य सूत्रों का प्रयोग संख्या की प्रवृत्ति जानने में, क्रियात्मक आधार से पूरक तथा अधिकाय ज्ञात करने हेतु, युग्पत समीकरण में एक चर का मान ज्ञात करने के लिए, गुणनखंड संभव न होने वाले द्विघात के मूलों को जानने हेतु, औसत व महत्तम समापवर्त्तक निकालने के लिए, किसी भिन्न को दशमलव में प्रकट करने आदि के लिए किया जाता है। सामान्य गणितीय परिकर्मों तथा व्यवहारों के अतिरिक्त ये सूत्र बड़ी गिनती तथा अन्य क्लिष्ट गणना के सन्दर्भ में भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। वैदिक गणित के सूत्रों, उपसूत्रों अथवा उपप्रमेयों के अध्ययन से स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय ऋषि, महर्षि, ज्योतिषीयों, गणितज्ञों की ज्ञान परम्परा के अनन्त और अजस्र प्रवाह में यह रचना अतीव महत्त्वपूर्ण है। गणितीय व्यवहारों व परिकर्मों के विशेष सन्दर्भ में ये सूत्र न केवल विद्वानों व वैज्ञानिकों के लिए महत्त्वपूर्ण हैं अपितु सामान्य कक्षा के छात्र भी इस प्रक्रिया का आश्रय लेकर गणितशास्त्र में सहज ही प्रवेश पा सकते हैं। संगणकीय प्रयोग हेतु इन सूत्रों का परीक्षण अभी शेष है तथा इस दृष्टिकोण से भी इन सूत्रों का परीक्षण वैदिक गणित की वैज्ञानिकता को स्थापित करने वाला ही सिद्ध होगा।

Thursday, 13 September 2018

ज्योतिष वेदाङ्ग का गणितशास्त्र के विकास में अवदान

             

   गणितशास्त्र के उद्भव और विकास संबंधी सिद्धान्तों पर यदि दृष्टिपात किया जाए तो कहा जा सकता है कि मानव सभ्यता के आरम्भिक काल में ही गणित अथवा गणन विषयक अवधारणा का आरम्भ हो गया होगा। संक्षेपतः कहा जा सकता है कि मानव सभ्यता के इतिहास के तरह ही गणितशास्त्र भी अत्यन्त प्राचीन है। विश्व की प्राचनीतम रचनाओं अर्थात् वैदिक संहिताओं में गणित के मूलभूत विषय यथा- संख्या, ज्यामितीय आकृति आदि का वर्णन इस सिद्धान्त को पुष्ट करता है। इसके अतिरिक्त हड़प्पाकालीन सभ्यता के अवशेषों में वृत्ताकार व त्रिभुजाकार हवनकुण्डों, विशाल स्नानागार, ईंटों से बने मकान और परिपक्व नगर नियोजन तत्कालीन समाज में गणितशास्त्र के विषयों की उपस्थिति और उसके प्रायोगिक व्यवहार का जीवन्त दिग्दर्शन है। गणितशास्त्र की विकास यात्रा को यदि विशिष्ट स्वरूप दिया जाए और कालक्रम में विभाजित किया जाय तो इसे वैदिक संहिता, ब्राह्मण साहित्य, आरण्यक ग्रन्थ, उपनिषद् साहित्य, पुराण तथा स्वतन्त्र ज्योतिष शास्त्रीय ग्रन्थों में विभाजित किया जा सकता है। अभिप्राय यह है कि वैदिक काल (ईसा पूर्व 6000 वर्ष लगभग), हड़प्पा काल (ईसा पूर्व 3000 वर्ष लगभग), ब्राह्मण काल (3000-1000 ई. पूर्व) तथा इसके बाद के लगभग 2000 वर्ष पर्यन्त भारतवर्ष की पवित्र भूमि न केवल कला, अपितु विज्ञान के विभिन्न शाखाओं के अविच्छिन्न उन्नति तथा महत्त्वपूर्ण कार्यों का क्षेत्र बना रहा। रामायण (1000-600 ई. पू.), अष्टाध्यायी (700 ई.पू.), सुश्रुत संहिता (600 ई.पू ) तथा बौद्ध व जैन साहित्य (400 ई.पू.) में गणितशास्त्र से संबंधित पर्याप्त सामग्री का उपलब्ध होना गणितशास्त्र की विकास यात्रा के सतत प्रवाह को प्रदर्शित करता है। गणितशास्त्र के प्रति भारतीय ऋषियों के सम्मान को इसी तथ्य से समझा जा सकता है कि ‘संख्यावान्’अर्थात् गणितशास्त्र के ज्ञाता को ही विद्वान् कहा जाता था- ‘विद्वान् विपश्चिद् दोषज्ञः संख्यवान् पण्डितो जनः।' ऋग्वेद के शताधिक मन्त्रों में संख्याओं का परोक्ष अथवा अपरोक्ष प्रयोग प्राप्त होता है। इसी प्रकार यजुर्वेद में एक से लेकर परार्ध अर्थात् दस खरब तक की संख्याओं का वर्णन मिलता है और इस क्रम में दश, शत, सहस्र, अयुत, नियुत, प्रयुत, अर्बुद, न्युर्बुद, मध्य, अंत और परार्ध संज्ञा का प्रयोग किया गया है। 'वाजसनेयी संहिता' स्पष्ट रूप से कहती है कि विशेष ज्ञान के लिए नक्षत्रदर्श अर्थात् गणक के पास जाओ- ‘प्रज्ञानाय नक्षत्रदर्शं यादसे गणकं।’ ‘गणित’शब्द वैदिक काल में अपने इस मूलरूप में प्राप्य नहीं था, परन्तु इसके समानार्थक तथा सव्युत्पत्तिक शब्द गणक, गण और गण्या ऋग्वेद में मिलते हैं। छान्दोग्य उपनिषद् में नारद द्वारा सनत्कुमार को अधीत ज्ञान का परिचय कराने के प्रसङ्ग में ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास, पुराण, व्याकरण, पितृविद्या, राशिविद्या, देवविद्या, निधिविद्या, तर्कशास्त्र, ब्राह्मविद्या, भूतविद्या, छात्रविद्या, नक्षत्रविद्या, सर्पविद्या, देवजन विद्या का नाम तो लेते हैं परंतु इसमें ‘गणितशास्त्र’का नामोल्लेख नहीं है। हाँ यह अवश्य है कि यहाँ राशिविद्या ही गणितशास्त्र अर्थात् डंजीमउंजपबे का परिचायक है। परन्तु जब ‘गणित’शब्द के सर्वप्रथम प्रयोग व इसकी महत्ता के सन्दर्भ में प्रश्न उठता है तो इसका उत्तर हमें महर्षि लगध प्रणीत याजुष् ज्योतिष के इस मन्त्र में उपलब्ध होता है-
 "यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा। तद्वद्वेदाङ्गशास्त्राणां गणितं मूर्धनिस्थितम्।" 
      शिक्षा, कल्प, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष व व्याकरण इन छः वेदाङ्गों में किसी न किसी रूप में गणितशास्त्र के सिद्धान्तों के प्रतिपादन अथवा उसके स्वरूप को स्पष्ट करने के सन्दर्भ में निश्चित ही स्तुत्य प्रयास किए गए है। जहाँ शुल्ब सूत्रों में ज्यामिति, त्रिकोणमिति तथा क्षेत्रमिति का प्रयोग हुआ तथा उसके विकास हेतु प्रयत्न हुए, वहीं ज्योतिष वेदाङ्ग ने गणितशास्त्र के सर्वाङ्गीण विकास में महती योगदान दिया। गणित विद्या के मुख्यतः तीन विभाग माने गए है- अंकगणित, रेखागणित व बीजगणित। इन तीन प्रमुख शाखाओं के आधार पर ही गणितशास्त्र की अन्य शाखाएं यथा स्थितिशास्त्र (Statics), गतिशास्त्र (Dynamics), द्रवस्थितिशास्त्र (Hydrostatics), त्रिकोणमिति (Trigonometry), खगोलीय त्रिकोणमिति (Spherical Trigonometry), चलन कलन (Calculus) आदि विकसित हुई हैं। वेदाङ्ग ज्योतिष के तीनों ही संस्करणों में गणितशास्त्र के कई प्रमुख विषय यथा संख्याओं का उल्लेख, जोड़, घटाव, गुणा, भाग, त्रैराशिक नियमादि का प्रयोग मिलता है। स्पष्ट है कि उस वैदिक काल में गणितशास्त्र नक्षत्रविद्या के अन्तर्गत ही परिगणित होता था। आर्यजाति एक धर्मपरायण जाति थी और उनके दैन्दिन जीवन में यज्ञ अत्यधिक महत्त्वपूर्ण था। इष्ट प्राप्ति तथा अनिष्ट परिहार के लिए ये लोग यज्ञ किया करते थे। 
इन यज्ञादि शुभ कर्मों के लिए उचित काल का निर्धारण आवश्यक था और यही कारण है कि उत्तर वैदिक काल अर्थात् ब्राह्मण व आरण्यक ग्रन्थों में इस गणितशास्त्र का और भी विकास हुआ। 500 ई.पू. से 500 ई. के मध्य जैन ग्रन्थों यथा स्थानांगसूत्र, भगवतीसूत्र  और अनुयोगद्वारसूत्र में गणित के सन्दर्भों का बाहुल्य है और यही वह समय है जब दाशमिक अंकलेखन प्रणाली, शून्य का आविष्कार, बीजगणित का आविष्कार, अंकगणित का विकास, ज्योतिषशास्त्र का विकास आदि महत्त्वपूर्ण घटनाएं हुईं। इस काल के गणितीय विकास को प्रस्तुत करने के लिए स्थानांग सूत्र ग्रन्थ का यह श्लोक अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है-
 ‘परिकम्मं ववहारो रज्जु रासी क्लारावन्ने य। जावन्तावति वग्गो घनो ततह वग्गवग्गो विकप्पोत।'  अर्थात् परिकर्म, व्यवहार गणित, रज्जु या रेखागणित, राशि (त्रैराशिक), कलासवर्ण, यावत्रावत् वर्ग, समीकरण, घन, वर्ग वर्ग, विकल्प अर्थात् क्रमचय तथा संचय से परिचित थे। ज्योतिषशास्त्र के महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ सूर्यसिद्धान्त का गणितशास्त्र के विकास के क्षेत्र में महती योगदान है। इस ग्रन्थ में ज्या (Sine), उत्क्रमज्या (Versine), कोटिज्या (Cosine) त्रिकोणमितीय फलनों का उल्लेख मिलता है। 500 ई. से 1200 ई. के मध्य गणितशास्त्र का विकास अतुलनीय है यही वह समय है जब आर्यभट, भास्कर (द्वितीय) आर्यभट्ट सदृश विद्वानों ने इस शास्त्र की परम्परा को और भी अधिक सुदृढ़ किया।
' वर्गमूल, घनमूल व त्रैराशिक नियम विषय सिद्धान्तों को आर्यभट ने कुशलतापूर्वक स्पष्ट किया है। इसी तरह ब्रह्मगुप्त ने अपनी प्रसिद्ध रचना ब्रह्मस्फुटसिद्धान्त में शून्यपरिकर्म, क्षेत्रमिति के उच्च नियम, बीजगणित तथा अनन्तराशि के नियम बताए हैं। ब्रह्मगुप्त ने ही अनन्त को परिकल्पना की और बताया- ‘खोद्धृतमृणं धनंवा तच्छेदम्’ अर्थात् शून्य से भाग देने पर कोई भी ऋण अथवा धन संख्या अनन्त (तच्छेद) हो जाती है। इस तरह आर्यभट्टकृत आर्यभटीय, ब्रह्मगुप्त कृत ब्रह्मस्फुट सिद्धान्त, भास्कर प्रथम कृत लघुभास्करीय व महाभास्करीय, श्रीपतिकृत सिद्धान्तशेखर, भास्करद्वितीय कृत सिद्धान्तशिरोमणि, आर्यभटद्वितीय कृत महासिद्धान्त तथा मुंजाल कृत लघुमानस आदि अद्वितीय कृतियों ने ज्योतिषशास्त्र के गणित स्कन्ध की शाखा को पुष्पित और पल्लवित करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। गणितीय परिकर्मों अथवा व्यवहारों के सम्पादन के लिए लेखन सामग्री की आवश्यकता होती थी। ये क्रियाएँ या तो पाटी पर खड़ियां से की जाती थीं अथवा पाटी पर धूल बिछाकर किसी नुकीले कलम से की जाती थीं। इसी कारण से गणितशास्त्र के कुछ अंश पाटी गणित अथवा धूलिकर्म संज्ञा से जाने जाते थे। गणित का वह भाग जो अज्ञात राशि से सम्बन्ध रखता था। बीजगणित कहा जाता था गणितशास्त्र की ये समस्त शाखाएँ ज्योतिषशास्त्र के उपकार मात्र के लिए अस्तित्व में आई थी। ज्योतिषशास्त्र की तीन शाखाएँ मानी गई हैं- सिद्धान्त, संहिता और होरा। महर्षि पराशर की विश्वविश्रुत रचना बृहत्पाराशरहोराशास्त्र में गणित के तीन स्कन्धों के विषय में कहा गया है- 
‘त्रिस्कन्ध्ज्योतिषं होरा गणितं संहितेति च।'       गणितस्कन्ध में त्रुटि से लेकर कल्पकाल तक की कालगणना, पर्व आयनयन, अब्द विचार, ग्रहगतिनिरूपण, मास गणना, ग्रहों का उदयास्त, वक्रमार्ग, सूर्य व चन्द्रमा के ग्रहण प्रारम्भ एवं अस्त, ग्रहण की दिशा, ग्रहयुति, ग्रहों की कक्षस्थिति, उनका परिमाण, देश-भेद, देशान्तर, पृथिवी का भ्रमण, पृथिवी की दैनिक व वार्षिक गति, धु्रव प्रदेश, अक्षांश, लम्बांश, गुरुत्वाकर्षण, नक्षत्रासंस्थान, भगण चरखण्ड, द्युज्या, चापांश, लग्न, पृथिवी की छाया, पलभा समस्त विषय परिगणित है। उपरोक्त विषय अत्यन्त सूक्ष्म तथा जटिल हैं। इन विषयों की शुद्ध गणना हेतु ही गणितशास्त्र का विकास भारतीय ज्योतिषशास्त्र के ऋषियों, महर्षियों व मनीषियों द्वारा किया गया हैं। भारतीय दैवज्ञ ऋषियों ने जिस विधा को अपनी संतति के सन्ताप मुक्ति हेतु विकसित किया, पुत्री के कष्ट को न्यून करने के लिए जिस लीलावती सदृश कालजयी रचना को प्रकट किया वह ज्ञान वस्तुतः ज्योतिषशास्त्र के उपकार हेतु तथा इस कालज्ञान के विकास हेतु समर्पित था। पाटी पर खड़िया से लिखकर, धूल पर अंगुली व नुकीली कलम से लिखकर भारतीय ज्योतिषियों ने इस गणितशास्त्र को विकसित किया था। ज्योतिषशास्त्र का यह सहायक शास्त्र सहस्राब्दियों तक काल के अनन्त प्रवाह से गुजरता हुआ आज वर्तमान स्थिति तक पहुँचा है। उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर यह निश्चित होता है कि भारतीय ज्योतिषशास्त्र ने गणितशास्त्र के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। आज जिस गणितशास्त्र को एक स्वतन्त्रशास्त्र के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त है वह वस्तुतः ज्योतिषशास्त्र की एक शाखा मात्र है।