Sunday, 16 September 2018

रत्नधारण विषयक शास्त्रीय दृष्टि



              भारतीय ज्योतिषशास्त्र कालविधान शास्त्र है। व्यक्ति या राष्ट्र के लिए भावी कालखण्ड का शुभाशुभत्व विषयक विमर्श ही इस शास्त्र का प्रमुख प्रतिपाद्य विषय माना गया है। विभिन्न ग्रह-नक्षत्रों का मानव जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन करना तथा इन आकाशीय पिण्डों के सकारात्मक अथवा नकारात्मक प्रभावों को नियन्त्रित करने के विभिन्न साधनों को जनसामान्य के लिए प्रस्तुत करना इस शास्त्र तथा प्राचीन ऋषियों का प्रमुख उद्देश्य रहा है। जातक के जन्मकालीन ग्रह-नक्षत्रों की शुभाशुभ स्थितियों से मनुष्य के जीवन पर सकारात्मक या नकारात्मक प्रभाव उत्पन्न होता है। ग्रहजन्य इन परिस्थितियों को नियन्त्रित करने के साधनों के रूप में प्राचीन ऋषियों द्वारा मन्त्र, मणि व औषधियों को प्रमुखता दी गई है। इन प्राचीन ग्रन्थों तथा महर्षियों के सिद्धान्तों को आधार मानकर वर्तमान सन्दर्भ में दैवज्ञों द्वारा जनकल्याण के लिए कई विधियाँ प्रयोग में लाई जाती हैं। यजमानों को ग्रहशान्ति व ग्रह पुष्टिकरण के लिए यज्ञ, हवन, पूजन, मन्त्र जाप, स्तुति, स्तवन, उपाय, टोटके आदि बताए जाते हैं। समस्याओं व उपायों की अतिशयता के कारण यजमान व ज्योतिषशास्त्र के जिज्ञासु प्रायः असमंजस की स्थिति में आ जाते हैं और उचित उपायों के चयन में स्वयं को असहाय महसूस करते हैं। साथ ही साथ उनके सामने कई प्रकार की जिज्ञासाएँ तथा प्रश्न उपस्थित हो जाते हैं जिनका समाधान करना आवश्यक होता है। इन प्रश्नों की श्रृंखला में सर्वप्रथम प्रश्न  यह है किक्या

 ज्योतिषशास्त्रोक्त उपायों से इष्ट प्राप्ति हो सकती है? अवश्य! यह सत्य है कि ज्योतिषशास्त्र के ग्रन्थों में ऐसे कई ग्रह- योगों की चर्चा की गई है जो जातक के लिए अनिष्ट फल उत्पन्न करते हैं। कई ग्रह  प्राकृतिक रूप से क्रूर अथवा पापी हैं, जबकि कुछ ग्रह विभिन्न पाप भावों के अधिपति होने के कारण पाप फलदायक हो जाते हैं। इन सभी परिस्थितियों में जातक को अशुभ फल की प्राप्ति होती है तथा इन प्राचीन ग्रन्थों में इन के परिहार हेतु अनेक उपाय भी बताए गए हैं। अनिष्टों के परिहार तथा इष्ट की प्राप्ति हेतु उपायों का वर्णन वैदिक काल से ही होता रहा है। ऋग्वेद में भी इस प्रकार के कई उद्धरण उपलब्ध होते हैं जहाँ इष्ट प्राप्ति हेतु अनेक उपाय बताए गए हैं यथा- “ज्योतिष्टोमेन यजेत् स्वर्गकामः” अर्थात् स्वर्ग की कामना करने वाला ज्योतिष्टोम याग करे। इसी प्रकार अनिष्ट के परिहार के लिए यह वाक्य उपलब्ध होता है- “अग्निर्विश्वान्यप दुष्कृतान्यजुष्टान्यारे अस्मद्दधातु ” ये दोनों उद्धरण सिद्ध करते हैं कि व्यक्ति अपने कर्मों या शास्त्रोक्त उपायों के द्वारा अपने भावी जीवन में होने वाली घटनाओं को नियन्त्रित कर सकता है। ज्योतिषशास्त्र स्वयं एक वेदाङ्ग है और वेद का अङ्ग होने के कारण परम्परा से यह शब्द प्रमाण को स्वीकार करता है। अतः सिद्ध है कि ज्योतिषशास्त्र के ग्रन्थों में कहे गए उपायों द्वारा अनिष्ट का परिहार और इष्ट की प्राप्ति संभव है तथा ज्योतिषशास्त्रोक्त उपाय वेदसम्मत हैं।

रत्नोत्पत्तिविषयक सिद्धान्त
- रत्नों की उत्पत्ति के सन्दर्भ में अनेक सिद्धान्त प्रचलित हैं। आधुनिक भूगर्भशास्त्र के अनुसार विभिन्न रत्नों की उत्पत्ति खनिजों से होती है। भूगर्भीय ताप तथा काल के प्रवाह में ये खनिज अपना स्वरूप परिवर्त्तित कर लेते हैं तथा क्रिस्टल या रवों के रूप में परिवर्तित होकर ‘रत्न’ कहलाते हैं। ज्योतिषशास्त्रीय तथा रत्नशास्त्रीय ग्रन्थों के अनुसार दैत्यराज बलि तथा वज्रासुर असुर के शरीर से विभिन्न रत्नों की उत्पत्ति बताई गई है। इसके अतिरिक्त कुछ विद्वान् महर्षि दधीचि की अस्थियों से रत्नोत्पत्ति को स्वीकार करते हैं। सर्वप्रमुख व सर्वमान्य सिद्धान्त दैत्यराज बलि विषयक ही माना जाता है। इसके अनुसार इन्द्र द्वारा दैत्यराज बलि के शरीर पर वज्राघात से बलि का शरीर विशुद्ध जाति व सुकर्मों के प्रभाव से रत्नों में परिवर्त्तित हो गया। राजा बलि की हड्डियों से हीरे, दाँतों से मोती, रक्त से माणिक्य, पित्त से पन्ना, आँखों से नीलम, हृत्रस से वैदूर्य, मेद से स्फ़टिक, माँस से पारस मूँगा, चमड़े से पुखराज तथा वीर्य से भीष्म उत्पन्न हुए। इन रत्नों में से सूर्य ने माणिक्य, चन्द्रमा ने मोती, मंगल ने मूँगा, बुध ने पन्ना, बृहस्पति ने पुखराज, शुक्र ने हीरा, शनि ने नीलम, राहु ने गोमेद और केतु ने वैदूर्य ग्रहण कर लिया, इसीलिए इन रत्नों को धाारण करने वाले उपर्युक्त ग्रहों के प्रकोप से पीडि़त नहीं हो पाते हैं।
अशुभ ग्रहों की शान्ति व पुष्टिकरण के लिए ज्योतिषशास्त्र में कौन से उपाय बताए गए हैं?           ज्योतिषशास्त्र के ग्रन्थों में अलग-अलग समस्याओं के लिए अलग-अलग उपाय बताए गए हैं। दुष्ट ग्रहों, क्रूर ग्रहों, अशुभ ग्रहयोगों के दुष्प्रभावों से निवारण के लिए यज्ञ, हवन, दान, स्नान, जप, तीर्थगमन, कथा श्रवण, स्तुति, व्रत, अनुष्ठान, रत्न धारण आदि उपाय बताए गए हैं। प्राचीन ऋषियों ने ग्रह शान्ति व पुष्टिकरण हेतु विहित उपायों के सन्दर्भ में अपनी रचनाओं में अत्यन्त विस्तार से चर्चा की है। इन उपायों में से कुछ अल्प श्रमसाध्य हैं जबकि कुछ उपाय कष्टसाधय हैं।
ज्योतिषशास्त्रीय उपायों में रत्नधारण को ही क्यों प्रमुखता दें?
ग्रह शान्ति व ग्रह पुष्टिकरण हेतु जो उपाय इन प्राचीन ज्योतिषशास्त्रीय ग्रन्थों में उपलब्ध होते हैं, उनकी एक लम्बी श्रृंखला है तथा इसमें धन का भी बहुत अधिक व्यय होता है। मन्त्रों के जप, अनुष्ठान, यज्ञ-हवनादि में मन, वचन और कर्म की शुद्धता अनिवार्य होती है। चाहे उच्चारण विषयक अशुद्धि हो अथवा आचार-विचार विषयक अशुद्धि हो, इनकी उपस्थिति निश्चय ही यजमान के इष्ट की पूर्त्ति में असमर्थ रहती है और साथ ही साथ यजमान के अनिष्ट का भी भय बना रहता है। यज्ञ, हवन, अनुष्ठान, जपादि में मन्त्रों के अशुद्ध उच्चारण के कारण अनिष्ट फल की प्राप्ति का उदाहरण वैदिक काल से ही उपलब्ध होता है जहाँ मन्त्र के एक अंश “इन्द्रशत्रु” शब्द में स्वरभेद के कारण यजमान का विनाश हो गया था साथ ही साथ इन अनुष्ठान-यज्ञादि के आयोजन हेतु विद्वान व योग्य आचार्यों की उपलब्धता भी अत्यन्त कष्टसाध्य हो जाती है। उपायों की इन श्रृंखला में रत्नधारण एक ऐसा विकल्प है जहाँ उपरोक्त अनिष्ट की संभावना का सबसे कम भय होता है। अल्प श्रमसाध्यता तथा रत्नों की सहजतापूर्वक उपलब्धि के कारण ज्योतिषशास्त्रोक्त उपायों में यह सर्वाधिक लोकप्रिय है। अतः इष्ट प्राप्ति हेतु तथा अनिष्टों से दूर रहने की इच्छा वालों को रत्नधारण के प्रति ही प्रयासरत होना श्रेष्ठ सिद्ध होता है।
सूर्यादि ग्रहों के लिए शास्त्रोक्त रत्न कौन-कौन हैं?
“माणिक्यं दिननायकस्य विमलं मुक्ताफलं शीतगोः, माहेयस्य च विद्रुमं मरकतं सौम्यस्य गारुत्मकम्। देवेज्यस्य च पुष्परागमसुराचार्यस्य वज्रं शनेः नीलं निर्मलमन्ययोश्च गदिते गोमेदवैदूर्यके।।” अर्थात् माणिक्य सूर्य का, मोती चन्द्रमा का, मूँगा मंगल का, पन्ना बुध का, पुखराज बृहस्पति ग्रह का, व्रज या हीरा शुक्र का, नीलम शनि का, गोमेद राहु का तथा लहसुनिया केतु ग्रह का रत्न कहा गया है।
रत्न धारण करने की प्रवृत्ति अर्वाचीन है या प्राचीन?
रत्न धारण करने सम्बन्धी साक्ष्यों की बात करें तो विश्व की सर्वाधिक प्राचीनतम रचना ऋग्वेद में भी रत्न धारण से सम्बन्धित प्रसङ्ग उपलब्ध होते हैं। ऋग्वेद के प्रथम मन्त्र में ही ‘रत्न’ शब्द का प्रयोग हुआ है- “होतारम् रत्नधातमम्”। इसके अतिरिक्त भी ऋग्वेद में विभिन्न देवताओं के स्वरूप वर्णन प्रसङ्ग में भी विभिन्न रत्नजटित गृह, वस्त्र, अस्त्र, आभूषणादि का वर्णन मिलता है। अथर्ववेद में रोगनाशक मणि आदि की भी विशद् चर्चा प्राप्त होती है। ज्योतिषशास्त्रीय प्राचीन ग्रन्थों यथा वृहत्पराशरहोराशास्त्रम् में भी रत्नादि के प्रयोग विषयक प्रसङ्ग मिलते हैं। वराहमिहिर ने अपनी प्रसिद्ध रचना ‘वृहत्संहिता’ के रत्न परीक्षाध्याय में कहा है कि शुभरत्न धारण करने से राजाओं का शुभ तथा अशुभ रत्नों को धारण करने से राजा का अशुभ होता है। अतः रत्नज्ञों द्वारा रत्नगत दैव की परीक्षा करके ही रत्न धारण करना चाहिए “रत्नेन शुभेन शुभं भवति नृपाणामनिष्टमशुभेन। यस्मादतः परीक्ष्यं दैवं रत्नाश्रितं तज्ज्ञैः।।” रामायण, महाभारत सदृश प्राचीन ऐतिहासिक ग्रन्थों व कालिदासादि प्रभृत् विद्वानों ने अपनी कालजयी रचनाओं में रत्न व इसके विविध स्वरूपों पर प्रकाश डाला है।
रत्नों का प्रयोग किस उद्देश्य से किया जा सकता है?
ज्योतिषशास्त्र में रत्नों के प्रयोग के विषय में दो प्रमुख सिद्धान्त उपलब्ध होते हैं-
(१) अशुभ, पाप व क्रूर ग्रहशान्ति हेतु
(२) शुभ फलप्रद व योगकारक ग्रह पुष्टिकरण हेतु।       अभिप्राय यह है कि यदि किसी जातक के जन्माङ्ग में कोई ग्रह अशुभ प्रभाव उत्पन्न कर रहा हो तो रत्नों का प्रयोग किया जाता है तथा यदि किसी शुभ ग्रह के शुभत्व को बढ़ाना है तो भी रत्नों का प्रयोग कर सकते हैं। ज्योतिषशास्त्रीय उपयोग के अतिरिक्त आयुर्वेद के औषधियों के रूप में भी रत्नों का प्रयोग होता है।
ग्रहशान्ति तथा ग्रह पुष्टिकरण के लिए रत्नों की प्रयोगविधि क्या एक ही है ?
नहीं! ग्रहशान्ति तथा ग्रह पुष्टिकरण हेतु रत्नों की प्रयोगविधि नितान्त ही भिन्न है। अनिष्टकारक ग्रहों की शान्ति के प्रसङ्ग में रत्नों को दान में देने का प्रावधान किया गया है। इन ग्रन्थों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जो ग्रह जन्माङ्ग, दशा, गोचर अथवा अष्टकवर्गादि में अशुभ हों उनसे सम्बन्धित रत्नों का दान करना चाहिए। इस दान से वे अशुभ ग्रह प्रसन्न होकर शुभ फल प्रदान करते हैं- “ ये खेचरा गोचरतोऽष्टवर्गाद्दशा- क्रमाद्वाप्यशुभा भवन्ति। दानादिना ते सुतरां प्रसन्तास्तेऽधुना। ” परन्तु जब ग्रहों को बलवान् करने की बात हो तो उन-उन ग्रहों से सम्बन्धित रत्नों को मुद्रिका, मणि अथवा किसी भी आभूषण के रूप में शरीर पर धारण करने का प्रावधान किया गया है- “किरीटे कटिसूत्रे च कुण्डले कण्ठभूषणे। कीर्तिवक्त्रे मुद्रिकायां कङ्कणे बाहुभूषणे।।” स्पष्ट है कि जातक के जन्माङ्ग में उपस्थित जो ग्रह शुभ फल देने वाले हों उनको और अधिक बल प्रदान करने तथा उनके प्रसन्नार्थ के लिए रत्नों को धारण करना चाहिए। “धार्यं तुष्ट्यै भौम भान्वोः प्रवालं रौप्यं शुक्रेन्द्रोश्च हेमेन्दुजस्य। सूरेर्मुक्ता लोहमर्कात्मजस्य लाजावर्तः कीर्तितो राहुकेत्वाः।।”
रत्नों के चयन के लिए किसे आधार मानें दशा को या जनमाङ्गानुसार शुभाशुभ ग्रहाें को?
सामान्यतया लोकव्यवहार में यह दृष्टिगत होता है कि जातक के जन्माङ्गानुसार जिस ग्रह की दशान्तर्दशा या प्रत्यन्तर्दशा चल रही होती है उसी ग्रह से सम्बन्धित रत्न को धारण करने की सलाह जातक को दे दी जाती है। ज्योतिषशास्त्रीय ग्रन्थों में स्पष्ट रूप से उन सिद्धान्तों को प्रस्तुत किया गया है, जिसके द्वारा जातक के लिए योगकारक ग्रहों की पहचान हो सके। इस सन्दर्भ में महर्षि पराशर प्रोक्त “वृहत्पराशरहोराशास्त्रम्” ग्रन्थ द्रष्टव्य है। इसके अनुसार लग्नेश, पंचमेश, नवमेश अर्थात् त्रिकोणाधिपति अत्यन्त शुभ फल प्रदान करने वाले तथा योगकारक होते हैं। केन्द्रेशों के शुभाशुभत्व के सन्दर्भ में अत्यन्त सावधानीपूर्वक विचार करने की आवश्यकता होती है और तदुपरान्त ही उनसे सम्बन्धित रत्नों को पहनने की सलाह दी जा सकती है। जबकि दूसरी तरफ मात्र महादशेश या अन्तर्दशेश को आधार मान लेना और उनके शुभाशुभत्व का विचार किए बिना ही यजमान को रत्नधारण की सलाह दें तो यह उचित या शास्त्रीय विधि नहीं कही जा सकती है। अतः आवश्यक है कि पाराशरी सिद्धान्तों के आधार पर सर्वप्रथम जातक के लिए शुभ तथा अशुभ ग्रहों का निर्धारण कर लें तदुपरान्त ही किसी रत्न को धारण करने अथवा उसका दान करने के विषय में सलाह देना शास्त्रसम्मत होगा। कई बार ऐसा देखा जाता है कि जिस ग्रह की दशा चल रही हो उससे सम्बन्धित रत्न ही जातक को पहना दिया जाता है और सामान्यतया इस उपाय से जातक को कोई लाभ नही मिलता, अपितु कई बार उनका अनिष्ट भी हो जाता है। महर्षि पराशर ने स्पष्टतया कहा है कि कोई भी ग्रह अपनी दशा में स्वयं से सम्बन्धित शुभ या अशुभ फल नहीं देता है अपितु ग्रह अपने सहधर्मी ग्रहों की दशान्तर्दशा में शुभाशुभ फल जातक को प्रदान करते हैं? दशान्तर्दशेशों से सम्बन्धित रत्न धारण करने का सिद्धान्त अत्यधिक गहन चिन्तन व मनन के बाद ही उपयोग में लाना संभव हो सकता है।
रत्नों के भार निर्धारण में किस सिद्धान्त का आश्रय लें?
जातक के लिए उचित रत्न के चयन के बाद दूसरी प्रमुख समस्या रत्नों के वजन को लेकर होती है। ज्योतिषियों का एक वर्ग जातक के शरीर के वजन के आधार पर रत्नाें के भार का निर्धारण करता है जबकि दूसरा वर्ग सम्बन्धित ग्रह के अंशात्मक मान तथा ग्रहों के बल को आधार मानकर रत्न के वजन का निर्धारण करते हैं। ज्योतिषशास्त्र के ग्रन्थों में ऐसी कई विधियों का वर्णन किया गया है, जिससे ग्रहों के बली या उसकी निर्बलता का मूल्याङ्कन कर सकते हैं। ग्रहों के अंशात्मक मान तथा उसके द्वारा अधिष्ठित राशि के आधार पर ग्रहों की अवस्था का निर्धारण करने के बाद रत्नों के भार के सन्दर्भ में उचित निर्णय ले सकते हैं। निम्नलिखित तालिका ग्रहों की अवस्था तथा रत्नों का भार निर्धाारण करने में सहायक सिद्ध हो सकती है।
विषम राशियों में ग्रह स्थित हों तो वे 0°-6° तक (बाल),6°-12°(कुमार),12°-18°(युवा),18°-24°(वृद्ध),24°-30°(मृत) अवस्था के माने जाते हैं।
जबकि सम राशियों में ग्रह स्थित हों तो ग्रह 24°-30°(बाल),18°-24°(कुमार),12°-18°(युवा),6°-12°(वृद्ध),0°-6°(मृत) अवस्था में होते हैं।
यदि ग्रह बाल या मृतावस्था में हो तो अधिक वजन के रत्नों की आवश्यकता होगी जबकि वृद्धावस्था, कुमार व युवावस्था में क्रमशः कम वजन के रत्नों की आवश्यकता होती है। ग्रहों के षड्बल के आधार पर ग्रहों की सबलता अथवा निर्बलता का निर्धारण करने के बाद रत्नों के भार का निर्धारण करना ही शास्त्र-सम्मत विधि है।
रत्नक्रय कब करें? और रत्न कैसा हो?
ग्रहों से सम्बन्धित रत्नों का क्रय उन ग्रहों से सम्बन्धित वार को करना चाहिए। अर्थात् माणिक्य रविवार को, मोती सोमवार को, मूँगा मंगलवार को खरीदना शास्त्र-सम्मत है। राहु-केतु के सन्दर्भ में कहा गया है “कुजवत केतु शनिवत राहु” अतः लहसुनिया के क्रय के लिए मंगलवार तथा गोमेद खरीदने के लिए शनिवार का दिन प्रशस्त माना गया है। रत्न खरीदते समय यह ध्यान रखें की रत्न सर्वथा शुद्धऔर दोषरहित हों- “रत्नानि धारयेत्कोशे शुद्धानि गुणवन्ति च।” शुद्ध रत्न जहाँ जातक को शुभ फल प्रदान करते हैं, वहीं अशुद्ध तथा दोषयुक्त रत्न को धारण करने से अनिष्ट की आशङ्का सदैव बनी रहती है।
रत्नधाारण अथवा उसके दान हेतु कौन सा वार व समय उचित है?
रत्न धारण अथवा उसके दान हेतु ग्रह से सम्बन्धित वार ही शास्त्रों में प्रशस्त कहे गए हैं। अर्थात् माणिक्य रविवार को, मोती सोमवार को, मूँगा मंगलवार को, पन्ना बुधवार को, पुखराज गुरुवार को, हीरा शुक्रवार को, नीलम शनिवार को, लहसुनिया बुधवार को तथा गोमेद रविवार को धारण करना चाहिए। “कुर्यात् सूर्यादिखेटानां जपदानधारणादिकम्। तेषां वारे च काले च तेनतुष्टा भवन्ति ते।।” जहाँ तक समय की बात है तो माणिक्य, मूँगा, पन्ना, पुखराज, नीलम व लहसुनिया रत्न को सूर्योदय के उपरान्त अगले एक घण्टे के अन्दर धारण कर लेना चाहिए। जबकि मोती, हीरा व गोमेद को सूर्यास्त के अगले एक घण्टे तक पहन लेना चाहिए।
रत्न धारण से पूर्व क्या उसकी प्राण प्रतिष्ठा अनिवार्य है अथवा इस विधि का त्याग किया जा सकता है?
रत्न धारण के सन्दर्भ में यह अनिवार्य है कि रत्नों को उनसे सम्बन्धित देवताओं के वैदिक, तान्त्रिक या पौराणिक मन्त्रों के द्वारा विधिपूर्वक प्राण प्रतिष्ठा कर लें तभी उसको ज्योतिषशास्त्रीय उपाय के रूप में धारण करें। कहा भी गया है कि- “पूजा विना प्रतिष्ठां नास्ति न मन्त्रं विना प्रतिष्ठा च। तदुभय विप्रतिपन्नः पश्यतु गीर्वाण पाषाणम्।” अर्थात् प्राण-प्रतिष्ठा के बिना रत्न पाषाण मात्र हैं, तथा प्राण प्रतिष्ठित होने के बाद रत्न जीवन्त हो जाते हैं तथा जातक को शुभाशुभ फल देने में समर्थ हो जाते हैं। रत्नों के प्राण-प्रतिष्ठा की प्रक्रिया में नवग्रह पूजन तथा हवन करना उचित होता है तथा रत्न विशेष के ग्रहों का षोडशोपचार पूजा, नियत संख्या में जप व हवन अत्यन्त अनिवार्य है।
रत्न धारण हेतु उचित धातु और हाथ की कौन सी अंगुली श्रेयस्कर है?
माणिक्य हेतु स्वर्ण धातु, मोती के लिए चाँदी, मूँगा के लिए ताँबा, पन्ना के लिए स्वर्ण, पुखराज के लिए स्वर्ण, हीरा के लिए स्वर्ण, नीलम के लिए लौह, गोमेद के लिए अष्टधातु व लहसुनिया के लिए भी स्वर्ण या अष्टधातु प्रशस्त माना गया है। माणिक्य को हाथ की अनामिका अंगुली में, मोती को कनिष्ठिका, मूँगा को अनामिका, पन्ना को कनिष्ठिका, पुखराज को तर्जनी, हीरा को अनामिका, गोमेद को मध्यमा या अनामिका जबकि लहसुनिया को अनामिका अंगुली में धारण करना चाहिए। सामुद्रिकशास्त्रम्, करलक्षण, हस्तसंजीवनम् ग्रन्थों के अनुशीलन से ग्रहों से सम्बन्धित अंगुलियों का ज्ञान अत्यन्त विस्तारपूर्वक प्राप्त हो सकता है, जिसका अनुप्रयोग रत्न धारण विषयक सिद्धान्तों में सहजतापूर्वक किया जा सकता है।            

Saturday, 15 September 2018

स्वप्नविज्ञान : एक शास्त्रीय समीक्षा


        भारतीय मनीषियों ने विश्व में उपलब्ध समस्त विषयों का दार्शनिक पृष्ठभूमि में विश्लेषण करने की परम्परा का सूत्रपात अत्यन्त प्राचीन काल से ही कर दिया था। भौतिक पदार्थों से लेकर, मोक्षादि दृष्टातीत व अलौकिक विषय भी इससे अछूते नहीं रहे थे। ‘स्वप्न’ तथा इससे जुड़े समस्त विषयों का विस्तृत विवेचन प्राचीन संस्कृत साहित्य में प्राप्त होता है। ज्ञान विज्ञान की प्रत्येक शाखा अपने मूल रूप में वेदों में प्राप्त होती है। उपनिषदों, पुराणों तथा अन्य साहित्यिक ग्रंथों में इस विषय पर बारम्बार चर्चा की गई है।
स्वप्न - प्रत्येक चलायमान वस्तु को विश्राम की आवश्यकता होती है। मनुष्य पूरे दिन की भागदौड़ के बाद जब मानसिक तथा शारीरिक विश्राम पाने के लिए निंद्रा का आश्रय लेता है, तभी से ‘स्वप्न’ की एक आकर्षक, गूढ़, गम्भीर तथा आध्यात्मिक सृष्टि का प्रारंभ हो जाता है। स्वप्न निन्द्रामग्न जीव के मस्तिष्क का जीवन है - ऐसा जीवन, जिसमें हमारे जाग्रत जीवन का भी अंश होता है तथा इसके अतिरिक्त कुछ अन्य अनबूझे तथा गूढ विषय भी सम्मिलित होते हैं। भारतीय ऋषियों ने इस सृष्टि में ‘आत्मा’ तथा ‘परमात्मा’ इन दोनों तत्त्वों के अस्तित्व को स्वीकार किया है। जीव की मुख्यतया तीन अवस्थाएँ होती हैं -
(१)जाग्रतावस्था - इस अवस्था में मनुष्य अपनी सम्पूर्ण चेतना पाँच ज्ञानेन्द्रियों, पाँच कर्मेन्द्रियों, पाँच प्राण तथा चारों अंतःकरण से युक्त होकर इस लोक के समस्त विषयों का साक्षात्कार व उपभोग करता है।
(२)स्वप्नावस्था - इस लोक में अपनी दिनचर्या से थका मनुष्य विश्राम करने के लिए निंद्रा का आश्रय लेता है। निंद्रा प्रारंभ होेते ही ‘स्वप्न’ की संभावना प्रारंभ हो जाती है। इस अवस्था में मनुष्य अपने अवचेतन मन के सहयोग से स्वप्न की एक नई सृष्टि का सृजन कर लेता है।
(३)सुषुप्ति - यह निंद्रा की गहरी अवस्था है। स्वप्नावस्था के बाद की अवस्था। इस अवस्था में मनुष्य ‘स्वप्नादि’ का अनुभव नहीं करता है - "यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति तत्सुषुप्तम्।"

इन तीनों अवस्थाओं के अतिरिक्त एक ‘तुरीयावस्था’ का भी अस्तित्व है, परन्तु इस अवस्था से सामान्य मानवों का साक्षात्कार नहीं हो पाता है। तुरीयावस्था में योगीजन ही जा पाते हैं जाग्रतावस्था में मानव अपने समस्त ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेन्द्रियों तथा मन की सहायता से इस संसार में उपलब्ध समस्य विषयों का साक्षात्कार एवं भोग करता रहता है। लौकिक कार्यों को सम्पादित करने से थका-हरा मनुष्य स्वयं को मानसिक तथा शारीरिक आराम देने के लिए निंद्रा का आश्रय लेता है। निंद्रा अवस्था में जाते ही ‘स्वप्न दर्शन’ की संभावना का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। ‘स्वप्न’ की इस अवस्था में समस्त कर्मेन्द्रियाँ तथा ज्ञानेन्द्रियाँ मन में विलीन हो जाती हैं, केवल मन क्रियाशील रहता है। मन की इसी अवस्था में मनुष्य अपनी अतृप्त इच्छाओं, पूर्व जन्म के संस्कारों तथा दैवीय प्रेरणा से प्रेरित होकर स्वप्नों का दर्शन करता है। निंद्रा के अत्यधिक गहन हो जाने के बाद मन हृदय में प्रविष्ट होता है, जहाँ परमात्मा अंगुष्ठमात्र परिमाण से उपस्थित रहते हैं। मन के हृदय में पहुँचते ही स्वप्नावस्था का अंत हो जाता है तथा ‘सुुषुप्ति’ की अवस्था प्रारंभ हो जाती है। ‘सुषुप्ति’ की अवस्था में स्वप्न नहीं आते हैं।

 ‘स्वप्न’ की उत्पत्ति (भारतीय मत) - ऋग्वेद के ‘दुःस्वप्ननाशन’ सूक्त तथा यजुर्वेद के ‘शिवसंकल्प सूक्तः में ‘स्वप्न’ की उत्पत्ति के मौलिक सिद्धान्त प्राप्त होते हैं। यजुर्वेद के शिवसंकल्प सूक्त में मन की चेतन तथा अवचेतन दोनों ही अवस्थाओं के साथ-साथ स्वप्न का भी वर्णन किया गया है - " यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवेति।" इसी प्रकार ऋग्वेद का ‘दुःस्वप्ननाशन सूक्त’ स्वप्नों के शुभाशुभत्व का निर्देश करता है। परन्तु उपनिषदों में, विशेषकर ‘प्रश्नोपनिषद्’ तथा ‘माण्डूक्योपनिषद’ में स्वप्न के क्रिया विज्ञान पर विशेष प्रकाश डाला गया है। इसके अनुसार जिस प्रकार सूर्य के अस्त होने के समय उसकी किरणें समस्त संसार से सिमटकर सूर्य में समा जाती है, ठीक उसी तरह गहरी निंद्रा के समय समस्त इन्द्रियाँ मन में विलीन हो जाती हैं। उस समय इन्द्रियों के समस्त कार्य समाप्त हो जाते हैं। मनुष्य के जागने पर पुनः ये समस्त इन्द्रियाँ मन से पृथक् होकर पुनः अपने-अपने कार्य में ठीक उसी प्रकार लग जाती हैं, जिस प्रकार सूर्योदय होते ही सूर्य की किरणें पुनः चारों ओर फैल जाती है। मानव शरीर में व्याप्त पञ्चवायु में से उदानवायु, मन को निंद्रा के समय हृदय में उपस्थित परमात्मा के पास ले जाती है, जहाँ मन के द्वारा मनुष्य निंद्रा से उत्पन्न विश्राम रूपी सुख का अनुभव करता है। ‘स्वप्न’ की उत्पत्ति का सिद्धान्त ‘प्रश्नोपनिषद्’ के इस मंत्र में सन्निहित है -
"अत्रैष देवः स्वप्ने महिमामनुभवति। यद् दृष्टं दृष्टमनुपश्यति श्रुतं श्रुतमेवार्थमनु शृणोति। देशदिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति दृष्टं चादृष्टं च श्रुतं चाश्रुतं चानुभूतं चाननुभूतं च सच्चाचच्च सर्वं पश्यति सर्वः पश्यति।"
     अर्थात् मानव शरीर में स्थित जीवात्मा ही मन और सूक्ष्म इन्द्रियों के द्वारा स्वप्न का अनुभव करता है। जीवात्मा स्वयं द्वारा पूर्व में देखे गए, सुने गए, अनुभव किए गए और संपादित किए गए घटनाओं का उसी प्रकार स्वप्न में भी अनुभव करता है। परन्तु यह आवश्यक नहीं कि सिर्फ निंद्रा से पूर्व की जाग्रतावस्था में घटित विभिन्न घटनाएँ ही ‘स्वप्न’ के विषय होते हैं। जाग्रतावस्था में घटित अलग-अलग घटनाओं के विभिन्न अंश आपस में मिलकर एक नए स्वप्न की पटकथा तैयार करते हैं। इसके अतिरिक्त पूर्वजन्म के संस्कार, दबी हुई आकांक्षाएँ तथा परमपिता की प्रेरणा, ‘स्वप्नों’ की उत्पत्ति के कारण होते हैं। भारतीय ऋषियों ने स्वप्न को भविष्य में होने वाली घटनाओं का शुभाशुभ सूचक माना है। विभिन्न पुराणों तथा धर्म ग्रन्थों में उपलब्ध अख्यान भी इस तथ्य का समर्थन करते हैं।

स्वप्नों की उत्पत्ति के पाश्चात्य सिद्धान्त - पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों ने भी ‘स्वप्न’, इसके कारणों तथा इसकी उत्पत्ति विज्ञान पर विशेष रूप से विचार किया है। इन विचारकों में सिगमण्ड फ्रायड, युंग, अर्नेस्ट हार्मेन आदि प्रमुख हैं। फ्रायड के मतानुसार हमारे सारे स्वप्न, ‘काम-प्रवृत्ति’ से सम्बन्धित इच्छाओं की पूर्त्ति के साधन होते हैं। केवल कुछ ही स्वप्न है जो हमारी शारीरिक इच्छाओं जैसे भूख, प्यास आदि से नियंत्रित होती है। जैसे उपवास के साथ भोजन का स्वप्न, प्यास के समय किसी नदी, झरने या पानी पीने का स्वप्न। इन विचारकों का मत है कि मनुष्य की दमित तथा अपूर्ण इच्छाओं, कामवासनाओं तथा तात्कालिक परिस्थितियों के कारण मनुष्य को स्वप्न आते हैं। स्वप्न में दिखनेवाले विषय ठीक वर्त्तमान परिस्थिति के समान हो सकते हैं अथवा ये स्वप्न सांकेतिक रूप में भी हो सकते हैं। इन मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि स्वप्न किसी इच्छा के कारण पैदा होते हैं और स्वप्न की वस्तु उस इच्छा को प्रकट करती है। जैसे परीक्षा के समय विद्यार्थी को आनेवाले स्वप्न, किसी आत्मीय संबंधी के बीमार होने पर आनेवाले स्वप्न, अपूर्ण यौन इच्छाओं से संबंधित स्वप्न, घर में विवाहादि उत्सवों से संबंधित स्वप्न आदि उपरोक्त सिद्धान्तों को प्रथमदृष्ट्या सत्य मानने पर बाध्य करते हैं। परंतु उपरोक्त सिद्धान्त स्वप्नों के स्वरूप का एकांगी स्वरूप ही दिखाते हैं, क्योंकि कभी-कभी ऐसे स्वप्न भी आते हैं जिनका मनुष्य के भूत, भविष्य या वर्त्तमान से कोई संबंध नहीं होता है। सी.जी. युंग का विचार इससे कुछ विपरीत है। उनके मतानुसार स्वप्न अप्रमाणित सत्य की आध्यात्मिक घोषणाओं की, भ्रम की, परिकल्पना की, स्मृतियों की, योजनाओं की, पुर्वानुमानों की, अतार्किक अनुभवों की यहाँ तक की पराचित्त ज्ञान की अभिव्यक्ति हो सकते हैं। भौतिकतावादी होने के कारण अधिकतर पाश्चात्य मनोवैज्ञानिक स्वप्न की आध्यात्मिक उत्पत्ति विधि तथा इसकी महत्ता को समझ नहीं सके हैं। फिर भी युंग, अल्फ्रेड एडलर सदृश पाश्चात्य मनोवैज्ञानिक स्वप्न की आध्यात्मिक को समझने के करीब पहुँच चुके थे।
स्वप्न के प्रकार - स्वप्नों के दो प्रकार माने गए हैं - (१) दिवास्वप्न तथा (२) निशास्वप्न। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि दिवास्वप्न दिन में देखे जाने वाले स्वप्न हैं जबकि निशास्वप्न रात्रिकालीन स्वप्न हैं। इन दोनों स्वप्नों में कुछ मौलिक अंतर भी हैं -
(१)दिवास्वप्नों में व्यक्ति अपनी इच्छा से ही अपनी अतृप्त इच्छाओं की कल्पना में पूर्त्ति कर लेता है। परन्तु निशास्वप्नों में अचेतन मन की अतृप्त इच्छाएँ व्यक्ति की इच्छा न होने पर भी प्रकट होती हैं।
(२)दिवास्वप्नों में व्यक्ति अपनी अतृप्त इच्छाओं को उसी ढंग से तृप्त करने की चेष्टा करता है, जिस ढंग से होनी चाहिए निशास्वप्नों में इन इच्छाओं की तृप्ति का ढंग सांकेतिक होता है। जिसका विश्लेषण करने पर इन अतृप्त इच्छाओं का स्वरूप समझा जा सकता है।
(३)दिवास्वप्न सदा अतृप्त इच्छाओं से प्रेरित होते हैं, परन्तु सभी निशास्वप्नों पर यह बात लागू नहीं होती। कुछ निशास्वप्नों में भविष्य से संबंधित सूचनाएँ भी छिपी होती हैं।
स्वप्न घटनाओं के सूचक या एक सामान्य मनोवैज्ञानिक घटना
    भारतीय विचारधारा तथा पाश्चात्य विचारधारा के सम्यक् अवलोकन करने पर स्पष्ट हो जाता है कि न तो समस्त स्वप्न एक मनोवैज्ञानिक घटना मात्र हैं और न ही भविष्य में घटने वाली शुभाशुभ घटनाओं के सूचक। किसी भी स्वप्न का विश्लेषण करने से पूर्व यदि स्वप्न द्रष्टा मनुष्य की पृष्ठभूमि का गहन अध्ययन किया जाए तो स्वप्न की प्रकृति को स्पष्टतया समझा जा सकता है। किसी सांसारिक घटना से प्रभावित स्वप्न निष्फल होते हैं। जैसे यदि किसी मनुष्य के घर में शादी की बात चल रही हो और उसने शादी का सपना देखा तो यह स्वप्न व्यर्थ होगा। इसी प्रकार यदि व्यक्ति वैष्णो देवी माता का दर्शन करने का कार्यक्रम बना रहा हो और उसने माता का अथवा पहाड़ पर चढ़ने का सपना देखा तो यह स्वप्न भी निष्फल ही होगा। परंतु जब हम शुभाशुभ फल अथवा भविष्य में घटनेवाली किसी घटना की सूचना देने में समर्थ स्वप्न की प्रकृति पर विचार करते हैं, तो यह अनिवार्य है कि यह स्वप्न किसी भी रूप से उस मनुष्य की मानसिक, वैचारिक अथवा कार्यशैली से प्रभावित न हों। संस्कृति साहित्य के विभिन्न ग्रंथों तथा पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों की रचनाओं में ऐसे सहस्रों उदाहरण भरे पड़े हैं जिससे स्वप्नों को भविष्य में घटनेवाली शुभाशुभ सूचनाओं का सूचक होने के सिद्धान्त की पुष्टि होती है। हम दैनिक जीवन में भी स्वप्नों के इस सामर्थ्य का अनुभव करते रहते हैं। अतः आवश्यक है कि स्वप्नों से संबंधित फलादेश करने में पर्याप्त सर्तकता बरती जाए।
विभिन्न सम्प्रदायों में स्वप्न - विश्व में प्रचलित सभी मुख्य सम्प्रदायों ने स्वप्न को मान्यता दी है। हिन्दू धर्म में ‘स्वप्न’ को विशेष मान्यता दी गई है। भारतीय दर्शन में इसका आश्रय लेकर ब्रह्मतत्व को समझाने का प्रयास किया जाता रहा है। ऋग्वेद, यजुर्वेद, महाभारत, रामायण इन समस्त ग्रंथों में यत्र-तत्र स्वप्न से संबंधित आख्यान प्राप्त होते हैं। कुरान की कई आयतें हजरत पैगम्बर मुहम्मद साहब के स्वप्न में भी अवतरित हुई थीं। बौद्ध धर्म के संस्थापक भगवान बुद्ध के जन्म से पूर्व उनकी माता को स्वप्न में सफेद हाथी के दर्शन हुए। महावीर स्वामी के जन्म से पूर्व उनकी माता महारानी त्रिशला ने भी 14 अत्यन्त शुभ स्वप्न देखे थे।
स्वप्न का शुभाशुभत्व - भारतीय परम्परा ‘स्वप्न’ की आध्यात्मिकता के साथ-साथ इसके शुभाशुभ को भी समान रूप से स्वीकार करती है। विभिन्न पुराणों में स्वप्नों के शुभाशुभ फलों पर विशेष रूप से चर्चा की गई है। ब्रह्मवैवर्त्त पुराण तथा अग्निपुराण में इस विषय पर विशेष रूप से चर्चा की गई है।
स्वप्नफलदायक कब? - समस्त स्वप्न शुभ अथवा अशुभ फल बताने में समक्ष नहीं होते हैं। किसी घटना के कारण आनेवाले स्वप्न निष्फल होते हैं। दिन में सोते समय दिखने वाले स्वप्न भी अपना फल नहीं देते हैं। शुभ स्वप्न देखने के बाद जागरण तथा हरिनाम का जप करते हुए रात्रि व्यतीत करने पर ही शुभ फलों की प्राप्ति होती है। पुनः सो जाने पर स्वप्न का शुभ अथवा अशुभ फल नष्ट हो जाता है। बिना किसी पूर्व घटना अथवा तनाव से प्रभावित होकर आनेवाले स्वप्न ही शुभाशुभ फलप्रद होते हैं। चिन्तायुक्त, जड़तुल्य, मल-मूत्र के वेग से पीडि़त, भय से व्याकुल, नग्न और उन्मुक्त केश व्यक्ति को अपने देखे हुए स्वप्न का कोई फल प्राप्त नहीं होता है।
‘स्वप्न’ फल की प्राप्ति की अवधि - भारतीय ऋषियों ने स्वप्नजन्य शुभाशुभ फलों की प्राप्ति में लगनेवाले समय का भी निर्धारण किया है। सम्पूर्ण रात्रि को चार प्रहरों में विभक्त किया गया है। रात्रि के प्रथम प्रहर में देखे गए स्वप्न का शुभाशुभ फल एक वर्ष में प्राप्त होता है। द्वितीय प्रहर के स्वप्न का फल आठ मास में मिलता है। यदि स्वप्न रात्रि के तृतीय प्रहर में आए तो व्यक्ति को इस स्वप्न का फल तीन महीने में प्राप्त है। रात्रि का चतुर्थ प्रहर अत्यन्त शुभ माना जाता है। समस्त सात्त्विक शक्तियाँ इस काल में सक्रिय रहती हैं। यह समय ‘ब्रह्ममुहूर्त्त’ के नाम से प्रसिद्ध है। ब्रह्ममुहूर्त्त में देखे गए स्वप्न का फल एक पक्ष अर्थात् 15 दिन के अन्दर प्राप्त हो जाता है। सूर्योदय के समय का स्वप्न 10 दिन की कालावधि के मध्य ही अपना शुभाशुभ फल प्रदान कर देता है। यदि व्यक्ति ने प्रातःकाल स्वप्न देखा हो तथा स्वप्न दर्शन के पश्चात् ही उसकी नींद खुल गई हो तो यह स्वप्न तत्काल फलदायी होता है। 

       जहाँ तक रात्रि के विभिन्न प्रहरों में आए स्वप्नों से संबंधित फलों की प्राप्ति में लगने वाले समय का प्रश्न है, यह एक अत्यन्त ही जटिल विषय है। तथापि इस विषय को निम्नलिखित प्रकार से समझा जा सकता है। सूर्य सिद्धान्त के अनुसार मनुष्यों का एक वर्ष देवताओं के एक अहोरात्र के बराबर होता है। भारतीय दार्शनिक चिंतन की विचारधारा मनुष्य के भीतर स्थित जीवात्मा तथा परमात्मा में अभेद मानती है। निंद्रा की अवस्था में जीवात्मा का ‘मन’ मनुष्य की हृदयगुहा में स्थित परमात्मा से मिलता है, अतः इस जीवात्मा तथा परमात्मा में ऐक्य हो जाता है। इस सम्पूर्ण निंद्रा काल को उस देव वर्ष या दिव्य वर्ष के रूप में स्वीकार किया जा सकता है जो मनुष्य के 360 दिन के सौर वर्ष के बराबर होता है। इसी निंद्रा काल की अलग-अलग कालाविध अथवा प्रहरों में आनेवाले विभिन्न स्वप्नों को ट्टषियों ने अपने अंतर्ज्ञान, सूक्ष्मदृष्टि तथा पर्यवेक्षण के आधार पर उपरोक्त समय-सीमा में निबद्ध किया है।
विभिन्न स्वप्न फल
1-शुभ स्वप्न एक दृष्टि मेंः
ब्रह्मवैवर्त पुराण में वर्णित कंस वध के बाद विरहाकुल यशोदा से मिलने दुखी नन्द मथुरा गए तब भगवान श्री कृष्ण ने तत्वज्ञान समझा कर सांत्वना दी। तब नन्द ने लोक कल्याण की भावना से कई प्रश्न श्री कृष्ण से पूछे। उन्होंने श्रीकृष्ण से पूछा - हे प्रभो किस स्वप्न के कारण सुख प्राप्ति के संकेत प्राप्त होते हैं और कौन-कौन से स्वप्न शुभ रहते हैं? श्री कृष्ण द्वारा नन्द को बताए शुभ स्वप्न इस प्रकार हैं -
* धनदायक स्वप्न -
        स्वप्न में गाय, हाथी, घोड़ा, महल, पर्वत, पेड़ पर चढ़ना, भोजन करना, रोना, शस्त्र से जख्मी हो जाएँ, जख्म में कींडे़ पड़े, शरीर में रक्त एवं विष्ठा लगी हो इत्यादि।
* धन प्राप्ति के स्वप्न -
पेशाब से गीला होना, वीर्यपान करना, नर्क जाना, लाल नगरी जाना, लाल समुद्र में प्रवेश करना, अमृतपान करना, हाथी, राजा, सोना, बैल, गायक, दीपक, अन्न, फल, फूल, कन्या, सूत्र, ध्वज, रथ, पानी के महाकुम्भ, पान, सफेद धान, नट, नर्तकी, पादुका देखना, धनुष खींचना, घास का मैदान देखना, दीवार में कील ठोकना, धारदार शस्त्र प्राप्त हो, फूलों से लदा वृक्ष, सर्प , मांस, मछली, मोती, शंख, चन्दन, हीरा, आम, मद्य, आँवला, कमल, घर में वेश्या का प्रवेश होना, ब्राह्मण दम्पति, अनाज, मोतियों का हार, पुष्पांजली, गोरोचन, पताका, हल्दी, गन्ना मिलना, सरोवर, नदी, सफेद सांप, सफेद पर्वत, अग्नि उठाना।
* विश्वविख्यात कवि, विद्वान बनने का स्वप्न-
         स्वप्न में ब्राह्मण- ब्राह्मणी द्वारा महामंत्र दिया जाना, ब्राह्मण द्वारा पढ़ाया जाना, पुस्तक भेंट होना, अलँकारों से सजी कन्या द्वारा ग्रंथ भेंट होना, माँ की तरह पढ़ाया जाना, चश्मा लगाना, सुगन्ध लगाना।
* राजा समान ऊँचा पद पाना -
     ब्राह्मण दम्पति द्वारा मस्तक पर छत्र पकड़ना, सफेद अनाज बिखेरना, अमृत, दही, अच्छा पात्र देना, सफेद फूलमाला पहनकर रथ में बैठकर दही या खीर खाए, हाथी अपनी सूंड से उठाकर अपने मस्तक पर बिठाए, ब्राह्मण जिसे अपनी कन्या दे, स्वप्न में दिव्यनारी आकर कहे 'आप मेरे स्वामी हैं ' और स्वप्न दृष्ट एक दम उठ जाए। गाय का दूध, घी, कमल के पत्ते पर खीर, दही, दूध, घी, शहद एवं मिष्ठान खाए, तैरना, सिंह एवं बड़े जबड़े वाले पशु, सुअर, एवं बन्दरों के कारण पीड़ा, सीढ़ी देखना, टोपी देखना, मकान बनाना, मुरदे से बात करना, बाजार देखना, बड़ी दीवार देखना, धूप देखना।
नोट - स्वप्न में भस्म, कपास, हड्डियाँ इनको छोड़ कर अन्य सभी सफेद वस्तु दिखना शुभ होता है। हाथी घोड़ा ब्राह्मण को छोड़कर अन्य सभी काली वस्तुओं को देखना अशुभ है।
मरा हुआ दीखे =चिरंजीव होवें,
सुखी देखना=दुखी होने का संकेत है।
रोगी हुआ देखना=निरोगता प्राप्त हो
रवि चन्द्र के दर्शन होना।
* धन, विजय, प्रतिष्ठा, सुख, सम्पत्ति, पुत्र प्राप्ति -
          भरा हुआ कलश मिले, सन्तुष्ट ब्राह्मण अपने हृदय से लगाए, हाथ में फूल दे, काली माता के दर्शन, स्फटिक माला तथा इन्द्रधनुष प्राप्त हो, ब्राह्मण आशीर्वाद दे, सन्तुष्ट ब्राह्मण घर पर पधारे, ब्राह्मण दम्पती हँसते हुए फल प्रदान करें, आभूषणों से विभूषित दिव्य ब्राह्मण स्त्री मुस्कराते हुए मकान में प्रवेश करें, पैरों में बेड़ी पड़े, जल, बिच्छु या साँप देखे, सफेद वस्तुओं से अलंकृत स्त्री पुरुष को आलिंगन दें। खेती देखना, नारी देखना, खाई देखना, सफेद फूल देखना, तलवार देखना।
* पत्नी लाभ के स्वप्न -
          घोड़ी, मुर्गा, क्रौंच, पत्ती देखना, अचानक गाय मिलना।
नोट - स्वप्न में जिस घर में सपत्नी ब्राह्मण पधारेगा उस मकान में पार्वती के साथ शिव शंकर एवं लक्ष्मी के साथ नारायण का शुभागमन होता है।
* धन प्राप्ति के अन्य स्वप्न -
      दाँए हाथ का स्पर्श हो, लिंग छेद दर्शन, जी मिचलाना, सूर्य या चन्द्र को गटक जाना, नर मांस भक्षण करना, ऊँचे स्थान पर चढ़कर मिठाई खाए, गहरे पानी में गिरे पड़े, विष्ठा या वमन से बाहर पड़ी चीज खाए, रक्त या मूत्र पीए, शरसंधान करना, धान्य राशि, फल युक्त पेड़ पर चढ़ना, पर्वत शिखर पर चढ़ना, गाय का दुहना, हीरे-मोती, धान्य, चावल की बालियाँ, मूँग के दाने, शस्त्र देखना, झाग के साथ दूध पीना, अगूँठी पहनना, ऊँट देखना, सर के बाल कटे देखना, बालू देखना।
नोट - स्वप्न में सभी सफेद वस्तु देखना शुभ है केवल पकाए हुए चावल खाना अशुभ है। सफेद घोड़ा, सफेद हाथी, पँछी पर सवार होना द्रव्य हानि का संकेत हैं।
* जमीन जायदाद, बड़ा पद, सुख वैभव, भाग्योदय -
       पूर्ण जलाशय के दर्शन, परमात्मा को फल खाते देखना, चतुर्भुज भगवान, लक्ष्मी, सरस्वती, काली माता या शंकर जी के दर्शन, शहर का घेरा डालना, बैल, मनुष्य, पक्षी, हाथी, पर्वत पर चढ़कर पेयपान करना। रोटी खाना, लाल फल देखना, बादल आकाश में देखना।
* अन्य शुभ स्वप्न-
       स्वप्न में मस्तक काटा जाना या कटने का दृश्य देखना, शत्रु पर विजय प्राप्त करना, चाँदी सोने के बर्तन में खीर खाना, सिर पर फल गिरना, मच्छर-खटमल- मक्खी का काटना, रंगीन वस्त्र पहने स्त्री को आलिंगन देना, रोना, पछतावा करना, रत्न जटित पलँग पर सोना या आसनस्थ होना, वीणावादन या गायन करना, गीले कपड़े पहनना, अग्नि दाह के कारण परेशान, बारिश या अग्निकाण्ड की सूचना मिलना, पशु पक्षियों के कारण निद्रा भंग होना, जलता मकान देखना, पितरों के दर्शन होना, जल क्रीड़ा या स्नान करना, माता-पिता के दर्शन होना, तत्काल नींद आना या खुलना, शिवालय, इन्द्र धनुष, मुकुट, किले का तट, बन्दरगाह, छत्रचामर का दर्शन होना, उल्कापात, नक्षत्र, बिजली, मेघ का स्पर्श, नदी, समुद्र पार करना, फूल खाना या देखना, मिट्टी के बर्तन देखना, कस्तूरी, कपूर, चन्दन देखना, या उनका उपयोग करना, सजी स्त्रियाँ व मित्र बन्धुजन के दर्शन, नीलकण्ठ, सारस दीखना, हाथ में पताका, लता, बेली, हरे वृक्ष की टहनी पकड़ना, धूम्रपान करना, धूम्र रहित, ज्वाला रहित अग्नि का भक्षण करना, पानी सहित मछली हाथ में लेना, शंख के दर्शन, सेना या मृत्यु को निकट आते देखना, कर्णाभूषण, मोती, कौड़ी, बैल प्राप्त होना, बाजूबन्द, हार, मुकुट, पुल बान्धना, मिट्टी खाना, सौभाग्यद्रव्य -हल्दी-कुमकुम देखना या प्राप्त करना, नदी का भँवर, दुर्गा के दर्शन, तलवार, धनुष, छुरा, चक्र, गदा आदि देखना, वेदघोष, हाथी का चीखना, घोड़े का हिनहिनाना, नागकेसर, मालती, चमेली, तिल, लवण, लवंग, केला, अनार, नींबू, नारियल, सुपारी, चम्पा, इलायची, रेत, पान, गन्ना, शीशा, पीतल आदि देखना, फल फूल युक्त आम, नीम, मदार आदि काटना, सफेद सांप का काटना, नीम देना या उस पर चढ़ना, साँड, मोर, तोता, हंस, चील देखना, सिर का छेदन, अपना मरण देखना, प्रकाश देखना, कुत्ता देखना, कमल देखना, लोहा देखना, दातुन करना, धरती पर बिस्तर लगाना, नदी का पानी पीना, पत्थर देखना, जंगल देखना, दिया जलते देखना, पत्र पढ़ना, अनार पाना, आकाश देखना, कुएं में पानी देखना, पूरे नगर में वर्षा देखना, ज्योतिषी, सुहागिन स्त्री, गुरु, पुष्प लिए व्यक्ति, विवाह, स्त्री से प्रेम व्यक्त करना, धन प्राप्ति, समुद्र स्नान, तैरना, बालक, बालिकाएँ, दुष्ट को दण्ड देना, शत्रुदमन, परी, अप्सरा, गन्धर्व, संगति, मंडली, शर्बत पीना, तोरण, तीर्थ यात्रा, गंगा स्नान, बन्धन मुक्ति, शरीर का बढ़ना, देवार्चन व्रत, पहाड़ उड़ते देखना, कुटुम्बी की मृत्यु, विशाल भीड़, किला, विजय, ग्रन्थ रचना आदि।
*अग्नि पुराण के अनुसार कुछ अन्य शुभ स्वप्न -
       अपनी नाभि में तृण या पेड़ उगाना, अपनी भुजा या मस्तक का दर्शन होना, सिर के बाल सफेद होना, चन्द्र, रवि तथा तारे पकड़ना, इन्द्र की ध्वजा को आलिंगन देना, पृथ्वी पर पड़ी जल धारा को अपने शरीर पर लेना, शत्रु की परेशानियाँ देखना, रक्त से नहाना, अपने मुँह से गाय-भैंस, सिंहनी, हथिनी या घोड़ी को दुहना, गाय के सींग से या चन्द्र से बरसी जलधारा से स्वयं को अभिषेक होना, महँगी मोटर या जहाज में बैठना, अपरिचित स्त्री से संभोग करते हुए देखना आदि।
अशुभ स्वप्न एक दृष्टि मेंः
*संकट सूचक स्वप्न -
       जोर से हँसना, खुद का विवाह, नाच गाना देखना, कान में उगे अशोक कदली के फूल देखना, तेल या नमक दिखाई दें, नग्न, नाक कटी हुई काली, शूद्र, विधवा, जटा, ताड़ी के फल देखना, चिढा हुआ ब्राह्मण या चिढी हुई ब्राह्मणी देखना, जंगली फूल, लाल फल, कपास, टांक, सफेद फूल देखना, हिरण का मरा हुआ बच्चा, मनुष्य का मस्तक, रूँडमाला दीखे, अपने टूटे हुए नाखून, बुझी आग, पूर्ण रूप से जली हुई चिता, शमशान, सूखी घास, लोहा, काली स्याही एवं काले घोड़े, टूटे-फूटे बरतन, जख्म, कुष्ठ-रोगी, लाल वस्त्र, जटाधारी, सूअर, भैंसा, काला अंधेरा, मरा हुआ प्राणी, योनी दर्शन, ब्राह्मण-ब्राह्मणी, छोटा बालक, कन्या, क्रोध में विलाप करना, लाल वस्त्र, वाद्य, नाचना, गाना, गायक, मृदंग बजाने वाला दीखें, सींग वाले प्राणी पर बच्चे या बड़े टूट पड़े, कटा हुआ नीचे गिरता हुआ पेड़, छुरी, धदकते अँगारे, पत्थरों की बारिश, रथ, मकान, पर्वत, पेड़, गाय, हाथी, घोड़ा, आकाश से पृथ्वी पर गिरते दीखे, ऊपर से गिर रहे ग्रह, पर्वत, धूमकेतु, टूटा हुआ मनुष्य दिखे, भयभीत गाय अपने बछड़े के साथ भाग जाए (धन नाश), मस्तक पर आच्छादित छत्र कोई छीने तो (पिता, गुरू का नाश), दाँत टूटते देखना, दरवाजा बन्द देखना, दलदल देखना, धुँआ देखना, रस्सी देखना, भूकम्प देखना, कैंची देखना, कोयला देखना, कीचड़ में फँसना, लोमड़ी देखना, मुर्दे को पुकारना, बाजार देखना, बिल्ली देखना, बिल्ली या बन्दर काटे, पत्थर देखना, चादर देखना, रत्न या नगीना देखना, आग जला कर पकड़ना, आँधी और बिजली गिरना, सूखा अन्न खाना, वर्षा अपने घर पर देखना, सूख बाग देखना।
*रोग ग्रस्त सूचक स्वप्न -
         दाँतों का गिरना, हविष्य के पदार्थ दूध, दही, छाछ एवं गुड़ शरीर को लगा दीखे, लाल फूलों की माला पहनी हुई, लाल रंग के वस्त्र पहने हुए स्त्री आलिंगन दे, पादुका, कपाल की हड्डी, लाल फूलों की माला, उड़द, मसूर, मूँग दिखे (फोड़े, जख्म), सेना, गिरगिट, कौआ, सियार, बन्दर, बिगड़ा हुआ भालू, सुअर, भैंसा, ऊँट, गधा हमला करें।
* मृत्यु के संकेतक स्वप्न -
         मुर्दा देखे, जख्मी, बिना सिर का धड़, मुँडन किए प्राणी नाचते देखना, मरा हुआ मनुष्य या काले रंग की मलेच्छ स्त्री आलिंगन दे, शत्रु, कौआ, मुर्गा, भालू आक्रमण करें, अभ्यंग स्नान करके गधा-ऊँट- भैंसा किसी पर सवार होकर दक्षिण में प्रस्थान करें, हँसने वाली, गाने वाली, काले वस्त्र परिधार किए काले रंग की विधवा दिखे, काले वस्त्र पहने काले रंग के फूलों की माला गले में डाले स्त्री आलिंगन दे, गधा या ऊँट के रथ में बैठे नींद खुल जाए, गन्दे कपड़े पहने, पाश एवं अस्त्र धारण किया हुआ यमदूत, काले फूल, काले फूलों की मालाएँ, शस्त्र धारी सेना, विकृतकायाधारी म्लेच्छ स्त्री आदि।
* अन्य अशुभ स्वप्न -
      अत्यन्त वृद्ध काले शरीर वाली नंगी स्त्री का नाचना, खुले केश वाली विधवा, सिर पर ताड़ के या कोई भी काले रंग के फलों का गिरना, मैला कुचैला, विकृत आकार, रुखे केश वाले मलेच्छ या गलित कुष्ठ से युक्त नंगा शूद्र देखना, सधवा, पुत्रवती, सती स्त्री या शिखा खोले ब्राह्मण को, रोष कुपित गुरु, सन्यासी या वैष्णव को देखना, घड़े का फोडा़ जाना, अँगार, भस्म या रक्त की वर्षा, सूर्य या चन्द्र को निस्तेज या ग्रहण लगा हुआ देखना, हाथ से दर्पण, दण्डादि गिरकर टूटना, गले का हार, माला आदि टूटना, काली प्रतिमा देखना, भस्मपुँज, हड्डियों का ढेर, ताड़ का फल, केश, नाखून, कौडि़याँ, कोयला देखना मरघट या चिता पर रखा मुर्दा, कुम्हार का चाक, तेली का कोल्हू, आधे जले या सूखे काठ, कुश, तृण, चलता हुआ घोड़ा, मुर्दे का चिल्लाता हुआ मस्तक, आग से जला हुआ स्थान देखना, भस्मयुक्त सूखा तालाब, जली मछली, लोहा, जला हुआ वन देखना, तिरस्कृत या अपमानित होना, फाँसी लगना, घबराना, पसीने-पसीने होना, घी लेना, मीठी चीज खाना, दुर्घटना होना, खाली बर्तन लेकर भटकना, लाल या काले वस्त्र पहनना, परदेशी की मृत्यु की सूचना, सांपों से क्रीड़ा, सांप का पेट में घुसना, हवा में उड़ना, दक्षिण की यात्रा, चोरी करना, चोरी होना आदि।
अशुभ फल सूचक स्वप्नों की शान्ति के उपाय -
*अशुभ स्वप्न देखने पर स्वप्न को तुरंत ही यह स्वप्न किसी को सुना दें और पुनः सो जाएँ। स्वप्न के अशुभ फल प्राप्त नहीं होंगे।
*1000 गायत्री मंत्रों से हवन करें।
* ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’, मंत्र का 10,000 जप करें।
*‘ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं दुर्गतिनाशिन्यै महामायायै स्वाहा’ का 10 बार जप करें।     
* महामृत्युञ्जय मंत्र का जप करें।
* ऋग्वेदोक्त ‘दुःस्वप्ननाशन सूक्त’ का पाठ 11 बार करें।
स्वप्न एक गूढ विद्या - स्वप्न की महत्ता तथा आध्यात्मिकता को स्वीकार करते हुए भारतीय तंत्रशास्त्र में भी इस विषय पर विशेष चर्चा की गई है। भारतीय ऋषियों ने कई मंत्रों का उल्लेख किया है, जिसके द्वारा मंत्र की अधिष्ठात्री शक्ति की कृपा से व्यक्ति अपना शुभाशुभ फल जान सकता है। इन साधनाओं में स्वप्नेश्वरी देवी, स्वप्नदेवी, स्वप्नचक्रेश्वरी तथा स्वप्न सिद्धि प्रमुख हैं।
* स्वप्न सिद्धि मंत्र - ‘ॐ ह्रीं नमो वाराहि अघोरे स्वप्नं दर्शय ठःठः स्वाहा’
  इस मंत्र को सोते समय ग्यारह सौ मंत्र का जप करने से ग्यारह दिन के भीतर ही प्रश्न का उत्तर स्वप्न में निश्चित रूप से मिल जाता है।
*स्वप्नदेवी मंत्र - ‘ॐ ह्रीं मानसे स्वप्नेश्वरि विचाय विद्ये वद वद स्वाहा’
एक लाख जप करने से प्रश्न का उत्तर स्वप्न में मिल जाता है।
*दुर्गासप्तशती प्रयोग -
" दुर्गे देवि नमस्तुभ्यं सर्वकामार्थसाधिके।
मम सिद्धिमसिद्धिं वा स्वप्ने सर्वं प्रदर्शय।।"
      इस मंत्र का सोते समय 108 बार नित्य पाठ करने से शीघ्र ही प्रश्न का उत्तर स्वप्न के माध्यम से प्राप्त हो जाता है।

विंशोत्तरी दशा-साधन प्रविधि

       प्रत्यक्ष, अनुमान या अन्य किसी भी उपाय से जब अदृष्ट का ज्ञान न हो पाए तो वेद का आश्रय लेने का विधान किया गया है। मनुष्य का भाग्य या भविष्य भी एक ऐसा ही विषय है। इस पर भी यदि शुभाशुभत्व का विचार करना हो तो इस विषय की दुरूहता और भी बढ़ जाती है। इसी शुभाशुभत्वमूलक काल-सापेक्ष ज्ञान हेतु ज्योतिषरूपी वेदांग अस्तित्व में आया। महर्षि लगध भी इसका समर्थन करते हुए वेदांग ज्योतिष में कहते हैं -
वेदा हि यज्ञार्थमभिप्रवृत्ताः कालानुपूर्व्या विहिताश्च यज्ञाः।
तस्मादिदं कालविधानशास्त्रं यो ज्योतिषं वेद स वेद यज्ञान्।।
कालान्तर में यह ज्योतिषशास्त्र काफी विस्तार को प्राप्त हुआ तथा इसकी पाँच शाखाएँ विकसित हुई - सिद्धान्त, संहिता, होरा, प्रश्न तथा शकुन। इस पंचस्कन्धात्मक ज्योतिषशास्त्र का होरास्कन्ध मनुष्य के भविष्य से जुड़ा होने के कारण अत्यन्त महत्त्व का है। अपनी लोकप्रियता के कारण यह शास्त्र भारत के बाहर अन्य देशों में भी फैला। नवग्रहों की विभिन्न राशियों में स्थिति के आधार पर मनुष्य को शुभ-अशुभ अथवा मिश्रित फल प्राप्त होते हैं। जातक को इन शुभाशुभ फलों की प्राप्ति एक ही बार नहीं होती। इन फलों की प्राप्ति के काल निर्धारण हेतु दशाओं की कल्पना की गई है।  भारतीय फलित ज्योतिष में विशोत्तरी, अष्टोत्तरी, योगिनी आदि दशाओं का उल्लेख है  जबकि ताजिक शास्त्र में मुद्दा दशा, पात्यायनी आदि दशाओं का वर्णन प्राप्त होता है।  पाराशरी ज्योतिष का मूल आधार विंशोत्तरी दशा है।
* विंशोत्तरी दशा - यह दशा नक्षत्रदशा नाम से भी प्रसिद्ध है। इस दशा में मानव की आयु 120 (एक सौ बीस) वर्ष की मानी गई है। इसी काल विस्तार में विभिन्न ग्रहों की दशाओं की कल्पना की गई है। समस्त नवग्रहों की 120 वर्ष की कालावधि में से प्रत्येक ग्रह को कुछ विशेष वर्ष का काल प्रदान किया गया है। इस दशा में महादशा, अन्तर्दशा, प्रत्यन्तर्दशा आदि शब्दों का प्रयोग किया जाता है।
* विंशोत्तरी दशा में ग्रहों का वर्षमान - विशोत्तरी दशा में विभिन्न ग्रहों को दशाधिपति के रूप में विशेष काल का निर्धारण करते हुए महर्षि पराशर कहते हैं -
   "दशासमा: क्रमादेषां षड् दशाऽश्वा गजेन्दवः।
    नृपालाः नवचन्द्राश्च नगचन्द्रा नगा नखाः।। "
           अर्थात् सूर्य 6 वर्ष, चंद्रमा 10 वर्ष, मंगल 7 वर्ष, राहु 18 वर्ष, बृहस्पति 16 वर्ष, शनि 19 वर्ष, बुध 17 वर्ष, केतु 7 वर्ष, तथा शुक्र के 20 वर्षों की कालावधि विंशोत्तरी दशा में प्राप्त होती है।
* विंशोत्तरी दशा का निर्धारण - जन्म नक्षत्रनुसार ग्रहों की दशा होती है। कृत्तिका, उत्तराफाल्गुनी और उत्तराषाढा में जन्म होने से सूर्य की, रोहिणी, हस्त और श्रवण नक्षत्रें में जन्म होने से चन्द्रमा की, मृगशिरा, चित्र और धनिष्ठा नक्षत्रों में जन्म होने से मंगल की, आर्द्रा, स्वाती और शतभिषा में जन्म होने से राहु की, पुनवर्सु, विशाखा और पूर्वाभाद्रपद में जन्म होने से बृहस्पति की, पुष्य, अनुराधा और उत्तराभाद्रपद में जन्म होने से शनि की, आश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती में जन्म लेने से बुध की, मघा, मूल और अश्विनी में जन्म होने से केतु की एवं भरणी, पूर्वाफाल्गुनी और पूर्वाषाढा में जन्म होने से शुक्र की दशा होती है।
* दशा साधन विधि - भयात और भभोग को पलात्मक बनाकर जन्म नक्षत्र के अनुसार जिस ग्रह की दशा हो, उसके वर्षों से पलात्मक भयात को गुणा कर पलात्मक भभोग का भाग देने से जो लब्ध आये वह वर्ष और शेष को 12 से गुणा कर पलात्मक भभोग का भाग देने से जो लब्ध आए वह मास होता है। ठीक इसी तरह शेष को पुनः 30 से गुणा कर पलात्मक भभोग का भाग देने से जो लब्ध आए वह दिन, शेष को पुनः 60 से गुणा कर पलात्मक भभोग का भाग देने से जो लब्ध आए वह घटी एवं शेष को पुनः 60 से गुणा कर पलात्मक भभोग का भाग देने से जो लब्ध फल आता है वह पल का मान होता है।
* अन्तर्दशा निकालने की विधि - विंशोत्तरी दशा क्रम में महादशाओं के अनन्तर अन्तर्दशाओं पर भी विचार किया जाता है। प्रत्येक ग्रह की महादशा में समस्त नवग्रहों की दशाएँ आती है। किन्तु इसका एक विशिष्ट क्रम है। जैसे यदि चन्द्रमा की महादशा हो तो उस महादशा में पहली अन्तर्दशा चन्द्रमा की, दूसरी मंगल की, तीसरी राहु की, चौथी बृहस्पति की, पांचवी शनि की, छठी अन्तर्दशा बुध की, सातवीं केतु की, आठवीं शुक्र की तथा नवीं और अन्तिम अन्तर्दशा सूर्य की होगी।
     अन्तर्दशा निकालने का सरल नियम यह है कि महादशेश के वर्षमान को उतने ही वर्षमान से गुणा कर 10 का भाग देने से लब्ध मास और शेष को तीन से गुणा करने से दिन की संख्या स्पष्ट हो जाती है। यथा - मंगल की महादशा में मंगल की अन्तर्दशा निकालनी हो तो मंगल के दशा वर्ष 7 को 7 से गुणा किया तो 7×7 = 49 ,49÷ 10 = 4 मास, शेष 9 है अतः दिन निकालने हेतु शेष 9 को उसे गुणा किया तो 27 दिन आता है। ठीक इसी प्रकार अन्य ग्रहों की महादशा में अन्तर्दशाएँ निकाली जा सकती है।
* प्रत्यन्तर दशाएँ - जिस प्रकार ग्रहों की महादशा काल में नवग्रहों की अन्तर्दशाएँ आती हैं, ठीक इसी प्रकार प्रत्येक ग्रह की अन्तर्दशा में नवग्रहों की प्रत्यन्तर दशाएँ भी आती हैं। प्रत्यन्तर दशा साधन का नियम यह है कि महादशेश के वर्षमान से अन्तर्दशेश और प्रत्यन्तर दशा के स्वामी के वर्षमान को परस्पर गुणा कर पुनः 40 का भाग देने से लब्धि दिन होते हैं। यथा चन्द्रमा की महादशा में चन्द्रमा की अन्तर्दशा में मंगल का प्रत्यन्तर निकालना हो तो चन्द्रमा के वर्षमान 10 वर्ष को पुनः चन्द्रमा के वर्षमान 10 से गुणा किया - 10×10 = 100 इसमें पुनः मंगल के वर्षमान 7 से गुणा किया तो 100×7 = 700 आया। 700 में 40 से भाग देने पर 700 ÷ 40 = 17 दिन आया। इसी प्रकार अन्य ग्रहों की भी प्रत्यन्तर दशाएँ साधित की जाती हैं।
विशोत्तरी दशा फल
* सूर्य - सूर्य यदि बली हो तो इसकी दशा में धन लाभ, अधिक सुख, राज-सम्मानादि, पुत्रलाभ, हाथी आदि धनों का लाभ, वाहन का लाभ, राजा की अनुकम्पा प्राप्त होती है। जबकि निर्बल सूर्य की दशा में जातक महान कष्ट, धन-धान्य का विनाश, राजक्रोध, प्रवास, राजदण्ड, धनक्षय, ज्वरपीड़ा, अपयश, स्वबन्धुओं से वैमनस्यता, पितृकष्ट, भय आदि अशुभ फलों को प्राप्त करता है। 
* चन्द्र - बली चन्द्रमा की दशा में जातक को धन-धान्य सौभाग्यादि की वृद्धि, घर में मांगलिक कार्य, वाहन सुख, राजदर्शन, यत्न से कार्य-सिद्धि, घर में धनागम, राज्यलाभ, सुख, वाहन प्राप्ति एवं धन एवं वस्त्रदि का लाभ होता है। निर्बल चन्द्रमा अपनी दशा में जातक को धन हानि, जड़ता, मानसिक रोग, नौकरों से पीड़ा, मातृकष्ट आदि अशुभ फल प्रदान करता है।
* मंगल - बली मंगल अपनी दशा में जातक को राज्यलाभ, भूमिप्राप्ति, धन-धान्यादि का लाभ, राजसम्मान, वाहन, वस्त्र आदि का लाभ करता है। जबकि मंगल के निर्बल होने से यही मंगल अपनी दशा में धन-धान्य का विनाश कष्ट आदि अशुभ फल प्रदान करता है।
* राहु - इस छाया ग्रह के बली होने पर जातक को राहु की दशा में धन-धान्यादि संपत्ति का अभ्युदय, मित्र एवं मान्य जनों की सहानुभूति से कार्यसिद्धि, वाहन, पुत्र-लाभ आदि शुभ फल प्राप्त होते हैं। यही ग्रह यदि पाप प्रभाव में हो तो जातक को स्थान भ्रष्ट, मानसिक रोग, पुत्र-स्त्री का विनाश एवं कुभोजन प्रदान करता है।
* गुरू - बली गुरु अपनी दशा में राज्य की प्राप्ति, महासुख, राजा से सम्मान, यश, घोड़े-हाथी आदि की प्राप्ति, देव-ब्राह्मण में निष्ठा, वेद-वेदान्तादि का श्रवण, पालकी आदि की प्राप्ति, कल्याण, पुत्र कलत्रदि का लाभ प्रदान करता है। हीनबली गुरू की दशा में जातक को स्थाननाश, चिन्ता व पुत्रकष्ट, महाभय, पशु-चौपायों की हानि, आदि अशुभ फल प्राप्त होते हैं।
* शनि - बली शनि की दशा में जातक राजसम्मान, सुन्दर यश, धनलाभ, विद्याध्ययन से स्वान्त सुख, हाथी, वाहन, आभूषण आदि का सुख, घर में लक्ष्मी की कृपा आदि शुभ फल प्राप्त करता है। यही शनि यदि हीनबली हो तो शस्त्र से पीड़ा, स्थान का विनाश, महाभय, माता-पिता से वियोग, पुत्र कलत्रदि को पीड़ा, बन्धन आदि पीड़ा प्राप्त होते हैं।
* बुध - बुध अपनी दशा में जातक को सुख, धन-धान्य का लाभ, सुकीर्त्ति, ज्ञानवृद्धि, राजा की सहानुभूति, शुभ कार्य की वृद्धि, रोगहीनता, व्यापार से धनलाभ आदि शुभ पुल प्रदान करता है। बलविहीन बुध राजद्वेष, मानसिक रोग, विदेश भ्रमण, दूसरे की नौकरी, कलह तथा मूत्रकृच्छ रोगादि प्रदान करता है।
* केतु - केतु के शुभ होने अर्थात् बलयुक्त होने पर राजा से प्रेम, मनोनुकूल वातावरण देश या ग्राम का अधिकारी, वाहनसुख, सन्तानोत्पत्ति, विदेशभ्रमण, तथा पशु आदि का लाभ प्रदान करता है। बलविहीन केतु की दशा में दूरगमन, शारीरिक कष्ट, पराश्रित, बन्धुनाश, स्थान विनाश, मानसिक रोग, अधम व्यक्ति का संग और रोगरूपी अशुभ फलों की प्राप्ति होती है।
* शुक्र - बलवान शुक्र अपनी दशा में जातक को राज्याभिषेक की प्राप्ति, वाहन, वस्त्र, आभूषण, हाथी, घोड़े पशु आदि का लाभ, सुस्वादु भोजन, पुत्र-पौत्रदि का जन्म आदि शुभ फलों की प्राप्ति होती है। बलविहीन शुक्र अपनी दशा में जातक को स्वबन्धु-बान्धवों में वैमनस्यता, पत्नी की पीड़ा, व्यवसाय में हानि, गाय भैंस आदि पशुओं की हानि, स्त्री पुत्रदि या अपने बन्धु-बान्धवों का विछोह देता है।

Friday, 14 September 2018

ज्योतिषशास्त्र की दृष्टि में प्रेम विवाह


       ‘प्रेम-विवाह’ एक ऐसा शब्द है जो अपने अंदर कई भावनाओं को समेटे हुए है। जहाँ अभिभावकों के लिए यह चिंता, आशंका, क्रोध, संशय आदि का कारण बनता है, वहीं नवयुवक तथा नवयुवतियों के लिए यह संतोष, आशा एवं सुखद भविष्य की कल्पना को ऊँची उड़ान देता है। भारतीय संस्कृति के प्रारम्भिक काल से ही यह विवाह अस्तित्व में था और यह ‘गान्धर्व विवाह’ के नाम से जाना जाता था। इस प्रकार के विवाह में राग, स्नेह तथा प्रेमाधिक्य के कारण युवक तथा युवतियाँ सामाजिक मान्यताओं तथा आभिभावकों की इच्छा-अनिच्छा की परवाह न करते हुए विवाह बंधन में बंध जाते हैं। महर्षि वेदव्यास ने ऐसे विवाह को श्रेष्ठ कहा है-
‘‘सकामायाः सकामेन निर्मन्त्रः श्रेष्ठ उच्यते’’
जातक द्वारा किए जाने वाले इस प्रकार के विवाह हेतु जन्मकुण्डली में विद्यमान विभिन्न ग्रहयोग ही उत्तरदायी होते हैं। यह प्रेम-विवाह स्वजाति, अन्तर्जातीय या अन्तर्धामिक हो सकता है। जन्मांग में ऐसे कई कारक होते हैं, जो ऐसी परिस्थितियों के उत्पन्न होने में निर्णायक भूमिका का निर्वहन करते हैंं।
कुण्डली के विभिन्न भाव तथा भावेश- प्रेम विवाह के दृष्टिकोण से जन्मांग के पंचम, सप्तम, नवम तथा लग्न भाव के साथ-साथ तृतीय भाव भी अत्याधिक महत्वपूर्ण होता है। जहाँ पंचम भाव व्यक्ति के प्रेम सम्बन्धों, कोमल भावनाओं, मैत्री, संकल्प, साहस, योजना आदि के सामर्थ्य के साथ-साथ विचारों को साकार रूप देने को प्रभावित करता है। वहीं सप्तम भाव जीवन साथी, विवाह, संयोग, यौन-लिप्सा, दाम्पत्य सुख पर आदि नियंत्रण रखता है।
       इस प्रकार के विवाह हेतु व्यक्ति में अत्यधिक उत्साह, पराक्रम तथा साहस की आवश्यकता होती है अतः तृतीय भाव का भी सूक्ष्म विश्लेषण आवश्यक है। प्रेम विवाह की प्रकृति अर्थात् स्वजाति, अन्तर्जातीय, अथवा अन्तधार्मिक विवाह के निर्धारण हेतु नवम भाव पर विचार करना चाहिए। यह भाव जातक का अपने पैतृक वंश के साथ सम्बन्ध का निर्धारण करता है। फलादेश के सन्दर्भ में लग्न भाव सदैव ही निर्णायक भूमिका में रहता है, अतः उपरोक्त भावों के साथ-साथ लग्न भाव ऐसे विवाह की संभावना को क्षीण अथवा प्रबल करने का सामर्थ्य रखता है।
ग्रह- इस सन्दर्भ में शुक्र, मंगल, बृहस्पति तथा चन्द्रमा सर्वाधिक महत्वपूर्ण होते हैंं जबकि शनि तथा राहु प्रेम-विवाह के भविष्य तथा विलम्ब आदि का निर्धारण करते हैं। शुक्र जहाँ व्यक्ति को रोमांटिक स्वभाव वाला बनता है, वहीं सौन्दर्य, कोमल भावनाओं, रतिसुख, विलासिता आदि का भी कारक है। मंगल की स्थिति जातक के साहस तथा धैर्य के बलाबल को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है। बृहस्पति इस विवाह की स्वीकार्यता तथा प्रकृति का निर्धारण करता है। चन्द्रमा मन का कारक है अतः इन ग्रहों के साथ चन्द्र का सम्बन्ध प्रेम-विवाह की सम्भावना को पुष्ट करता है।
प्रेम विवाह के विभिन्न ग्रहयोग
* नवमेश, पंचमेश तथा सप्तमेश जन्मांग में एक साथ स्थित हों।
* सप्तमेश तथा पंचम भाव के अधिपति का लग्नेश के साथ युति संबंध हो।
* जन्मांग में मंगल और शुक्र साथ हों और उस पर पंचेमश तथा चन्द्रमा की दृष्टि हो।
* शुक्र का सम्बन्ध यदि लग्न, पंचम अथवा सप्तम भाव से हो तो भी प्रेम-विवाह होता है।
Zivame [CPS] IN * शुक्र तथा चन्द्रमा लग्न भाव में हों तथा उनसे राहु अथवा केतु किसी भी प्रकार सम्बन्ध बना रहे हों।
* सप्तमेश तथा पंचमेश के मध्य दृष्टि सम्बन्ध हो अथवा दोनों के मध्य राशि परिवर्तन हो।
* अष्टमेश यदि सप्तम भाव में निर्बल चन्द्र के साथ हो तो अभिभावकों की अनिच्छा या गुप्त रूप से विवाह होता है।
* शुक्र चर राशियों (मेष, कर्क, तुला, मकर) में हो तथा पाप ग्रहों से घिरा हो, साथ ही इस पर शनि दृष्टिपात कर रहा हो तो अन्तर्जातीय विवाह के योग बनते हैं।
* चतुर्थेश तथा लग्नभाव के अधिपति एक साथ हों तथा उसे राहु प्रभावित कर रहा हो तो अन्तर्धामिक विवाह होता है।
* बृहस्पति तथा शुक्र सप्तम भाव में स्थित हों तो समान जाति में प्रेम विवाह होता है।
* नीचस्थ सूर्य (तुला का), पाप प्रभाव से युक्त चन्द्रमा, कर्क का शुक्र तथा इन पर राहु का प्रभाव अन्तर्जातीय विवाह दर्शाता है।
* पंचमेश तथा पंचम भाव पाप प्रभाव में हो तथा क्रूर ग्रहों से आक्रान्त हो तो भी अन्तर्जातीय विवाह।
* नवम भाव अथवा नवमेश का शनि, मंगल अथवा राहु-केतु के साथ सम्बन्ध हो तो अन्तर्धामिक विवाह होगा।
* शुक्र तथा चन्द्र की युति पंचम भाव में हो।
* बृहस्पति केतु के साथ पंचम या नवम भाव में हो।
* पंचम भाव का स्वामी मंगल तथा शनि के साथ हो तथा सप्तमेश द्वितीय एकादश भाव में हो।
* राहु तथा शनि शुक्र के साथ हों अथवा दृष्ट हों तो वासनाधिक्य के कारण विवाह होता है।
Clovia [CPS] IN * सप्तम भाव में शुक्र और मंगल की युति हो और इस पर पंचमेश की दृष्टि हो तो अमर्यादित संबंधों के दबाव में विवाह होता है।
* जन्मांग में प्रेम विवाह के योग उपस्थित हों और नवम भाव अथवा नवमेश पाप-पीडि़त हों तो अलग जाति में विवाह होता है।
* क्रूर ग्रहों से युक्त नवम भाव और नवमेश तथा बृहस्पति का पापकर्तरी में होना अन्य धर्म में विवाह कराता है।
* सप्तम भाव, सप्तमेश तथा शुक्र यदि शनि व राहु से पीडि़त हों तो अनेक प्रेम सम्बन्धों के बाद प्रेम विवाह होता है।
* प्रेम-विवाह संबंधी ग्रहयोगों की जन्मांग में उपस्थिति हो और नवम भाव बृहस्पति द्वारा दृष्ट या युत हो तो माता-पिता की सहमति से प्रेम-विवाह होता है।
* नवमेश तथा नवम भाव शनि से आक्रान्त हो या नवम भाव पापकर्त्तरी योग से ग्रस्त हो तो अन्तर्जातीय विवाह।
* नवम भाव पापक्रान्त हो, परन्तु नवमेश या नवम भाव पर गुरू या शुक्र की दृष्टि हो और ये शुभ ग्रह स्वयं पाप प्रभाव में न हाें तो विवाह स्वयं से उच्च जाति में होता है।
* जन्मांग में प्रेम विवाह के योग उपस्थित होें तथा नवम भाव राहु अथवा शनि से युत या दृष्ट हों तो अन्तर्धार्मिक विवाह होगा।
* पुरूष के जन्मांग का शुक्र तथा स्त्री की जन्मकुण्डली में मंगल एक ही राशि में स्थित हों तो प्रेम-विवाह के बाद भी परस्पर अक्षुण्ण प्रेम रहता है।
* प्रेम विवाह के योगों पर चन्द्रमा तथा लग्नेश की दृष्टि प्रेम विवाह की संभावना को अत्यधिक प्रबल बना देती है।
* नवम भाव पर निर्दोष गुरू की दृष्टि हो तो प्रेम-विवाह माता-पिता की अनुमति से धूम-धाम से होता है, बशर्त्ते जन्मांग में प्रेम-विवाह योग उपस्थित हों।
* यदि नवम भाव, नवमेश और बृहस्पति क्रूर ग्रहों शनि, राहु, केतु अथवा सूर्य के पाप प्रभाव में हो तो अपने से निम्न जाति में विवाह होता है।
* प्रेम विवाह के योगों पर द्वितीय भाव तथा द्वितीयेश का सम्बन्ध निकट संबंधियों या पूर्व-परिचित से विवाह का योग बनाता है।
* पंचम अथवा सप्तम भाव में स्थित केतु यदि प्रेम-विवाह के ग्रहयोगों से किसी भी प्रकार का सम्बन्ध रखे तो प्रेम-विवाह गुप्त तरीके से (मंदिर, कोर्ट आदि में) होता है।
* सप्तमेश शनि से युक्त अथवा दृष्ट हो तो प्रेम-विवाह में बाधा तथा विलम्ब का योग बनता है।
* पंचमेश द्वादश भाव में हो तो प्रेम विवाह के योग बनते हैं।

समाधान-
लग्न, पंचम, सप्तम व नवम भाव के अधिपतियों के साथ-साथ गुरू, शुक्र तथा चन्द्रविषयक यथोचित उपाय इन परिस्थितियों को नियन्त्रित कर सकते हैं। वहीं बृहस्पति को पुष्ट करना इन सम्बन्धों के सुखद भविष्य के लिए सर्वाधिक आवश्यक है। इस सन्दर्भ में योग्य दैवज्ञ से परामर्श अनिवार्य होता है।

राजनीति में सफलता प्राप्ति के स्वर्णिम ग्रहयोग

           
    

               भारतीय ज्योतिषशास्त्र ने मानव जीवन के प्रत्येक अंग को अपने दिव्य प्रकाश के द्वारा आलोकित किया है। मनुष्य के जीवन में घटने वाली प्रत्येक घटना यथा- स्वास्थ्य, विद्या, विवाह, शारीरिक सुख, रोग, दुर्घटना, यशलाभ, आजीविका आदि समस्त विषय से सम्बन्धित पूर्वानुमान ज्योतिषशास्त्र तथा इसके आनुषांगिक शास्त्रों द्वारा सम्भव है। सत्ता सुख, शक्ति-पिपासा, समाज कल्याण तथा आजीविका इन समस्त दृष्टिकोणों से राजनीति का क्षेत्र शताब्दियों से मनुष्य को अपनी ओर आकर्षित करता रहा है। जहाँ कुछ लोग केवल समाज कल्याण की भावना से राजनीति की ओर आकर्षित होते हैं, वहीं कुछ लोगों को राजनीति के अन्य सुख अपनी ओर खींच लेते हैं जबकि कुछ लोग अपनी वंश परम्परा के कारण इस क्षेत्र में आते हैं। यह सत्य है कि इस क्षेत्र में हजारों लोग कई दशकों से सफलता हेतु संघर्षरत रहते हैं वहीं कुछ लोग शीघ्र ही राजनीति की विभिन्न सीढि़यों से चढ़ते हुए सत्ता सुख को प्राप्त कर लेते हैं। इन परिस्थितियों के सामने आने पर इस क्षेत्र में काम करने वाले व्यक्ति निराश हो जाते हैं और अपने प्रारब्ध, भाग्य और ईश्वर के ऊपर इस असफलता का दोषारोपण करते हैं। जीवन के अन्य क्षेत्रों की भाँति ही राजनीति का क्षेत्र भी ग्रह, नक्षत्र, राशियों तथा व्यक्ति के प्रारब्ध पर आधारित है और इस विषय पर प्राचीन ज्योतिषशास्त्रीय ग्रन्थों में पर्याप्त चर्चा की गई है। यह सत्य है कि प्राचीन आर्यावर्त के अधिकांश क्षेत्र में राजशाही थी और राजा के चुनाव में जनता का कोई योगदान नहीं होता था। परन्तु राजशाही में भी कुछ ऐसे पद अवश्य थे जिनका निर्वाचन जनता द्वारा होता था। अतः प्राचीन ज्योतिषशास्त्रीय ग्रन्थों में वर्णित ग्रहयोगों के आधार पर ही राजनीति के क्षेत्र में सफलता प्राप्ति के सूत्रों का अन्वेषण करना उचित होगा।
वर्त्तमान प्रशासनिक व्यवस्था और राजनीति - स्वतन्त्रता प्राप्ति के साथ ही भारतवर्ष में लोकतन्त्र की स्थापना हो गई और जनता के द्वारा चुने गए प्रतिनिधि ही प्रशासन को सम्भालने लगे। स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय से ही निर्वाचन की यह पद्धति चल रही है, पर इतना अवश्य है कि अब राजनीति का उद्देश्य समाज-सेवा मात्र नहीं रह गया है। इस क्षेत्र में कार्य करने वाला व्यक्ति अपने पराक्रम, वाणी, व्यक्तित्व, सामाजिक प्रतिष्ठा व स्वीकार्यता, धनबल, वंशपरम्परा तथा भाग्य की प्रबलता के आधार पर सफलता प्राप्त करता है या उपरोक्त विषयों के अभाव अथवा कमी के कारण असफलता को प्राप्त होकर सत्ता सुख से वंचित रहता है तथा आजीवन संघर्षरत ही रहता है। भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था के दृष्टिकोण से राजनीति कई स्तरों में विभक्त है। ग्राम पंचायत, जिला परिषद्, नगर निगम, विधानसभा, विधान परिषद्, लोकसभा, राज्यसभा, राष्ट्रपति आदि अनेक संस्थाएँ राजनीतिज्ञों को समाजसेवा का अवसर प्रदान करती हैं। राजनीति के क्षेत्र में कार्य करने वाले कार्यकर्त्ता भी प्रधान, अध्यक्ष, पार्षद, विधायक, सांसद, मन्त्री, मुख्यमन्त्री, प्रधानमन्त्री, राष्ट्रपति आदि पदों की प्राप्ति के लिए सतत प्रयासरत रहते हैं। निरन्तर प्रयासरत रहने के बाद भी सफलता न मिलने पर ऐसे व्यक्ति निराशा को प्राप्त होते हैं और अंततः दैवज्ञों के आश्रय में जाते हैं। इस अवसर पर दैवज्ञों का उत्तरदायित्व है कि वे उन्हें शास्त्रीय आधार पर उचित मार्गदर्शन दें। राजनीति और ज्योतिषशास्त्र जनता से व्यक्तिगत सम्बन्ध, सम्पर्क व सम्वाद स्थापित करने के साथ-साथ, पराक्रम, ओजस्वी वाणी, परम्परागत व वंशानुगत राजनैतिक ज्ञान, कूटनीति का ज्ञान, आकर्षक व्यक्तित्व आदि ऐसे अनेक गुण हैं, जिनके सहयोग से व्यक्ति राजनीति के क्षेत्र में सहजतापूर्वक सफल हो सकता है। ये समस्त अवयव सफलता प्राप्ति में सहायक सिद्ध हो सकते हैं परन्तु यह भी परम सत्य है कि बिना प्रबल भाग्य के इस क्षेत्र में सफलता प्राप्त करना असम्भव है। व्यक्ति के जन्मांग में स्थिति विभिन्न ग्रह, भावों का बलाबल और ग्रहयोग इस सन्दर्भ में अत्यन्त निर्णायक सिद्ध होते हैं।
महत्त्वपूर्ण ग्रह- राजनीति में सफलता की दृष्टिकोण से सूर्य, गुरु, बुध, शनि, मंगल व राहु अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। जन्मांग में इन ग्रहों का बलाबल ही व्यक्ति की राजनैतिक जीवन की सफलता या असफलता का निर्धारण करता है। ज्योतिषशास्त्र में राहु को राजनीति का कारक माना जाता है। प्रशासन में उच्च पद की प्राप्ति का विचार हम सूर्य से करते हैं। मंगल पराक्रम जबकि बुध वाणी का कारक है। भारतवर्ष के परिदृश्य में यदि राजनीति पर विचार करना है तो हम शनि की उपेक्षा नहीं कर सकते। भारत में प्रजातन्त्र है, तथा भारत की बहुसंख्यक प्रजा गरीब है। अतः जनता का कारक शनि है। व्यक्ति के जन्मांग में उपस्थित बली सूर्य, गुरु, मंगल, बुध, शनि व राहु उसे राजनीतिज्ञ, पराक्रमी, ओजस्वी वक्ता, जनता का प्रिय और उच्च पद प्रदान करने में सहायक सिद्ध होता है। गुरु की प्रबलता के बिना राजनीति के क्षेत्र में सफलता मिलना अत्यन्त कठिन ही माना जा सकता है।
महत्त्वपूर्ण भाव- लग्न, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, षष्ठ, नवम, दशम तथा एकादश भाव राजनीति में सफलता के दृष्टिकोण से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। इन भावों का बली होना अथवा उपरोक्त सफलताकारक ग्रहों के साथ संबंधित होना राजनीति के क्षेत्र में सफलता की सम्भावना को बढ़ा देता है। ज्योतिषशास्त्र में किसी भी राजयोग पर विचार करने के क्रम में लग्न स्थान को अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना जाता है। बली लग्न भाव तथा लग्नेश जातक को स्वतः राजयोग प्रदान करता है। द्वितीय भाव वाणी व धन का कारक है। बली द्वितीयेश जातक को प्रखर वक्ता तथा धनवान बनाता है। तृतीय स्थान पराक्रम का स्थान है तथा राजनीति के क्षेत्र में पराक्रम का महत्त्व स्वतः सिद्ध है। चतुर्थ स्थान प्रजा का स्थान है प्रजातन्त्र में इस स्थान की अवहेलना नहीं की जा सकती है। चतुर्थ भाव तथा इस भाव के अधिपति का बली होना जनता के साथ सम्बन्धों की प्रगाढ़ता को प्रदर्शित करता है। जन्मांग के षष्ठ भाव से युद्ध का विचार किया जाता है। प्रजातन्त्र में चुनाव युद्ध के समान ही माना जाता है और राजनीति के धुरंधर इस अवसर को युद्ध के रूप में ही लेते हैं। युद्ध में विजय या पराजय का विचार षष्ठ भाव से ही किया जाता है। नवम स्थान भाग्य स्थान है, नवम स्थान तथा नवमेश की प्रबलता ही अंततः व्यक्ति के राजनैतिक जीवन की सफलता का निर्णायक बिन्दु होता है- यादिभाव प्रतिपादित यद्भाग्य भवेत्तत्खलु राजयोगः। । जन्मांग का दशम भाव उच्च राजपद का निर्धारण करता है, जबकि एकादश भाव आय स्थान है। अतः स्पष्ट है कि उपरोक्त भाव तथा इन भावों के अधिपतियों की प्रबलता तथा इनका पारस्परिक सम्बन्ध जातक के राजनैतिक जीवन की सफलता अथवा असफलता की कसौटी कहा जा सकता है।
 कुछ ज्योतिषशास्त्रीय ग्रहयोग-
* चतुर्थ, द्वितीय और तनु भावों के अधिपति अपनी राशियों में हो तथा नवमेश लग्नस्थ हो।
*लग्नेश, चतुर्थेश और नवमेश दशमभाव में युत हों तथा दशमेश स्वगृही हो।
*द्वितीय भाव का अधिपति अपनी उच्च राशि में होकर केन्द्र में स्थित हो।
*लग्न में चन्द्रमा, चतुर्थ भाव में बृहस्पति तथा शनि अपनी-अपनी राशि अथवा उच्च राशियों में स्थित हों।
*दशमेश उच्चराशि का होकर यदि मिश्रग्रह के नवांश में हों।
*दशमेश देवलोकांश में, द्वितीयेश और नवमेश पारावतांश में तथा एकादशेश गोपुरांश में स्थित हों। *तीन ग्रह अपनी-अपनी उच्च राशियों में स्थित हों तो राजकुल में उत्पन्न व्यक्ति राजा बनता है।
*जन्मांग में पाँच ग्रह अपनी उच्च राशियों में स्थित हों तो राजकुल से इतर कुलोत्पन्न जातक भी राजा होता है।
*बृहस्पति की राशि लग्न में हो और तुला में शनि हो तो राजकुलोत्पन्न व्यक्ति राजा और राजकुलेतर व्यक्ति मन्त्री होता है।
*मकर राशि के अतिरिक्त किसी भी राशि का बृहस्पति लग्न में हो तो राजकुलोत्पन्न व्यक्ति राजा होता है।
*लग्नेश यदि केन्द्र में उत्तम बली हो तो मनुष्य राजनीति में सफल होता है भले ही वह ग्वालों के कुल में ही क्यों न पैदा हुआ हो।
*पूर्णबलवान लग्नेश तथा जन्मराशीश केन्द्र में रहकर लग्न को देखें तो सफलता।
*उपरोक्त राज योगों में यदि लग्नेश राशि के पहले द्रेष्काण में हों तो केन्द्रीय मन्त्री या प्रधानमन्त्री मध्य द्रेष्काण में हो तो मुख्यमन्त्री या राज्य सरकार में मन्त्री जबकि तृतीय द्रेष्काण में स्थित लग्नेश स्थानीय स्तर पर राजनैतिक सफलता देता है।
*चतुर्थ भाव में वसिष्ठतारा, सप्तम में शुक्र, लग्न में गुरु तथा दशम भाव में अगस्त्य तारा हो।
*कोई ग्रह नीच राशि में हो तथा उस नीच राशि का स्वामी या उस ग्रह के उच्च राशि का स्वामी केन्द्र में हो।
*यदि दशमेश अष्टम भाव में स्वराशि, मित्रराशि, उच्चराशि या नवांशादि का हो तथा पारावतांश का भी हो।
*दशम भाव में राहु, एकादश में शनि भाग्येश से दृष्ट हो तथा लग्नेश नीच ग्रह से युक्त हो।
*कर्क का गुरु लग्न में, बली शुक्र सप्तम में, पाप ग्रह तीसरे-छठे या ग्यारहवें में और अवशिष्ट ग्रह द्वितीय या द्वादश भाव में हों (नीचवंशोद्भव/नीचकुलोत्पन्न भी राजा)।
*राजनीति में सफलता हेतु राहु का 6-10-11, भाव में होना शुभ संकेत माना जा सकता है।
* सूर्य दशम भाव में उच्च राशि का हो और राहु 6-10-11, भाव में साथ ही द्वितीयेश का दशमेश के साथ सम्बन्ध हो।
*शनि तथा राहु सप्तम भाव में स्थित होकर लग्न अथवा लग्नेश पर दृष्टिपात करें तथा चतुर्थेश व सप्तमेश भी केन्द्र अथवा त्रिकोण भावों में स्थित हों।
            उपरोक्त ग्रहयोगों की परीक्षा सुविख्यात राजनीतिज्ञों की जन्मकुण्डली के साथ भी की जा सकती है। इस सन्दर्भ में पंडित जवाहरलाल नेहरू, श्री लालबहादुरशास्त्री, श्रीमति इंदिरा गाँधी, श्री राजीव गाँधी, श्री वी.पी. सिंह, मुलायम सिंह यादव, सुश्री उमा भारती, श्री नरेन्द्र मोदी आदि की कुण्डलियाँ द्रष्टव्य हैं। प्रसिद्ध राजनेताओं के जन्मांग के अध्ययन से यह स्पष्ट हो जाता है कि इनके जन्मांग के लग्न, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, षष्ठ, नवम, दशम तथा एकादश भाव और इनके अधिपतियों का सूर्य, मंगल, बुध, गुरु, शनि व राहु के साथ विशेष सम्बन्ध अवश्य रहा है। जातक के जन्मांग इन ग्रहयोगों की उपस्थित राजनीति के क्षेत्र में उसकी सफलता को सुनिश्चित करती है। भावों, भावेशों तथा ग्रहों के परस्पर सम्बन्धों का विश्लेषण इस प्रसंग में अत्यन्त अनिवार्य है ही, साथ ही साथ प्राचीन ज्योतिषशास्त्रीय ग्रन्थों में आने के ऐसे विशिष्ट योगों का भी उल्लेख मिलता है। जिनकी जन्मांग में उपस्थिति राजनीति के क्षेत्र में सफलता को सुनिश्चित करती है। इस सन्दर्भ में पंचमहापुरुष योग, गजकेसरी योग, त्रिपुष्कर योग, छत्र योग, चामर योग, राजराजयोग, नृपश्रेष्ठ योग, इन्द्रतुल्य राजयोग, शत्रुहन्तानृपयोग, नगरयोग, कलशयोग, पूर्णकुम्भ योग आदि महत्त्वपूर्ण हैं और सद्ग्रन्थों का आश्रय लेकर जातक के जन्मांग में इन योगों की उपस्थिति का भी परीक्षण करना चाहिए। स्पष्ट है कि उपरोक्त विशिष्ट ग्रहयोगों के बलाबल तथा जातक वंश की पृष्ठभूमि का गहन अवलोकन कर उसकी सफलता अथवा असफलता का निर्धारण किया जा सकता है। दशमस्थ या लग्नस्थ ग्रह अथवा सर्वाधिक बली ग्रह की दशा में ही व्यक्ति को सफलता मिलती है।
हस्तरेखाशास्त्र द्वारा सफलता का ज्ञान-
         हस्तरेखा शास्त्र में यदि ज्योतिषशास्त्र का सावधानीपूर्वक विनियोग किया जाए तो फलादेश की सटीकता और बढ़ जाती है। राजनीति के क्षेत्र में सफलता हेतु ज्योतिषाशास्त्र में ऋषियों द्वारा जिन ग्रहों को प्रधानता दी गई है, उन-उन ग्रहों से सम्बन्धित अंगुलियों व पर्वतों की प्रबलता जातक के सफलता की सम्भवना को और अधिक पुष्ट करती है। अभिप्राय है कि बृहस्पति पर्वत, सूर्य पर्वत तथा शनि पर्वत की सबलता राजनीति में सफलता हेतु अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त हथेली का गुलाबी और नर्म होना भी शुभ संकेत देते हैं। व्यक्ति की हथेली में पुण्य रेखा (मणिबंध से अनामिका अंगुली तक गई रेखा) तथा स्पष्ट और सीधी भाग्य रेखा की उपस्थिति राजनीति में सफलता की सूचक है। इसके अतिरिक्त भी अन्य कई चिह्न व्यक्ति को इस क्षेत्र में सफलता प्राप्ति का संकेत देते हैं।
*अंगुष्ठ मध्य में यव का चिह्न हो।
* हाथ या पैर में हाथी, छत्र, मत्स्य, तालाब, अंकुश, वीणा, दर्पण, माला, खड्ग, पर्वत, चक्र, धनुष, ध्वजा, कमल, चामर, आसन, रथ, पालकी, स्तम्भ, कलश, वृक्ष, घोड़ा, गदा, मृदंग, दण्ड आदि का चिह्न हो।
* मस्तक गोल, विशाल ललाट, कान तक विस्तीर्ण नेत्र, आजानबाहु (घुटने तक हाथ वाला) हो।
*सूर्य रेखा मस्तिष्क रेखा में मिलती हो और यह मस्तिष्क रेखा गहरी होनी चाहिए साथ ही यह आगे बढ़कर बृहस्पति पर्वत पर चतुष्कोण का निर्माण करें तो राजनीति के क्षेत्र में सफलता के प्रबल योग बनते हैं।
*सूर्य और गुरु पर्वत की स्थिति उच्च हो और शनि पर स्पष्ट त्रिशूल का चिह्न हो।
*चन्द्र रेखा का भाग्य रेखा से सम्पर्क हो तथा भाग्य रेखा हथेली के मध्य भाग से उत्पन्न होती हो, यही भाग्य रेखा आगे दो भागों में बँट जाए, एक रेखा, गुरु पर्वत की ओर तथा दूरी सूर्य पर्वत की ओर जाए तो भी सफलता।
*अंगुलियों के पहले तथा दूसरे पोरों की सबलता राजनीति की गहन समझ की ओर संकेत देती है।
* इसके अतिरिक्त सीधी और स्पष्ट सूर्य रेखा के साथ-साथ प्रबल गुरु पर्वत भी व्यक्ति को राजनीति के क्षेत्र में निश्चित सफलता दिलाता है।
* गुलाबी नाखून और नुकीली अंगुलियाँ मजबूत जोड़ भी सफलता के सूचक हैं।    
अंकशास्त्र-
    जातक के नामाक्षरों तथा जन्म तिथि को मूलांक व भाग्यांक में परिवर्त्तित करके भी राजनीति के क्षेत्र में सफलता की सम्भावनाओं का अन्वेषण व मूल्यांकन कर सकते हैं। अंकशास्त्रीय विधि में प्रत्येक अंकों के अधिपति के रूप में अलग-अलग ग्रहों की कल्पना की गई है। अंक-1- सूर्य,           2- चन्द्रमा, 3- गुरु, 4- राहु, 5- बुध, 6- शुक्र, 7- केतु, 8- शनि तथा 9- अंक का अधिपति मंगल होता है। ज्योतिषशास्त्रीय सिद्धान्तों में जिन ग्रहों को राजनीति में सफलता के लिए उत्तरदायी माना गया है, उन्हीं ग्रहों द्वारा अधिष्ठित अंक ही इस क्षेत्र में सफलता की सम्भावनाओं को बढ़ा देते हैं। विशेष रूप से मूलांक 1, 8 और 9 वाले जातक राजनीतिज्ञ बन सकते हैं। हम जानते हैं कि मूलांक 1, 8 तथा 9 के स्वामी क्रमशः सूर्य, शनि तथा मंगल हैं तथा यही ग्रह जातक में शासकोचित गुणों का संधान करते हैं। अंकों की परस्पर मित्रता तथा शत्रुता द्वारा जातक के किसी पार्टी अथवा व्यक्ति विशेष के साथ भविष्यकालीन सम्बन्धों तथा सफलता-असफलता को भी जाना जा सकता है। कई बार हम देखते हैं कि एक ही व्यक्ति के कई नाम होते हैं जैसे राशिनाम, घर का नाम, स्कूल का नाम, दोस्तों अथवा कार्यकर्त्ताओं द्वारा दिया गया नाम। इन नामों में से जो सबसे अधिक व्यवहार में आता है, उसी नाम का परीक्षण अंकशास्त्रीय विधि से करना चाहिए। नामाक्षरों की संख्या को जोड़कर भी जातक की सफलता अथवा असफलता का परीक्षण उपरोक्त सिद्धान्तों के आधार पर किया जा सकता है। नवांकों के लिए शुभ वर्षों, मासों, वारों तथा तिथियों का भी निर्धारण किया गया है और इन्हीं के आधार पर चुनाव लड़ने का उपयुक्त वर्ष, नामांकन आदि की उचित व शुभ तिथि का भी निर्धारण सम्भव है।
       

Thursday, 13 September 2018

वेदांग ज्योतिष का काल निर्णय : एक समालोचना

            ज्योतिषमान आकाशीय पिण्डों का अध्ययन ही ज्योतिषशास्त्र है। अतः सृष्टि के आरम्भ में सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र आदि के सृजन के साथ ही ज्योतिषशास्त्र के विवेच्य विषय अस्तित्व में आ गये। प्रारम्भ में यह शास्त्र वेदों के समान ही श्रुति परम्परा द्वारा संरक्षित रहा तथा कालान्तर में ज्योतिष शास्त्र से सम्बन्धित स्वतंत्र साहित्य की भी रचना हुई। वैदिक संहिताओं में उपलब्ध ज्योतिष शास्त्रीय छिटपुट उल्लेखों से लेकर ज्योतिषशास्त्रीय स्वतंत्र साहित्यों के रचना क्रम के मध्य एक लम्बी कालावधि का अवकाश रहा है। स्पष्ट है कि ज्योतिषशास्त्र की इस समृद्ध परम्परा को निश्चित होने में एक लम्बा समय लगा है। मानव सभ्यता के आरम्भ से लेकर आज तक के इस कालक्रम में ज्योतिषशास्त्र ने विकास की जिस अवस्था को प्राप्त किया है उसमें अनेक ऐसे निर्णायक तथा महत्वपूर्ण बिन्दु हैं, जिन्होंने इस शास्त्र की दिशा और दशा दोनों के ही विकास में विशेष भूमिका का निवर्हण किया। वेदांग ज्योतिष विषयक ग्रन्थ ऐसे ही महत्व के हैं, जिन्होंने वैदिक संहिताओं में उपलब्ध ज्योतिषशास्त्र के स्वरूप को पूर्णता की ओर अग्रसर करने में सहयोग किया है। विश्व की प्राचीनतम रचना के रूप में वेदों को ही स्वीकार किया जाता है।  विषयवस्तु के अत्यन्त दुरूह होने के कारण परवर्ती काल में वेदों के पठन-पाठन में कठिनाईयाँ उत्पन्न होने लगीं। इन समस्याओं के निराकरण हेतु परवर्ती काल में अनेक ट्टषियों के द्वारा वेदांगों की रचना की गई।
वेदांग का अर्थ तथा महत्व -
        ‘वेदांग' शब्द की व्युत्पत्ति ‘वेद’ तथा ‘अंग’ इन दो शब्दों के मिलने से हुई है। ‘अंग’ शब्द का अर्थ है जिनके द्वारा किसी वस्तु के स्वरूप को जानने में सहायता प्राप्त होती हो, उन्हें अंग कहते हैं। स्पष्ट है कि वेद के स्वरूप को समझाने में सहायक ग्रन्थ वेदांग कहे गए। इन वेदांगों की संख्या छः कही गई है  - शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द तथा ज्योतिष।  सर्वप्रथम मुण्डकोपनिषद् में इन छः वेदांगों के नाम का उल्लेख मिलता है।  यद्यपि गोपथ ब्राह्मण में भी इसका संकेत प्राप्त होता है।  इन वेदांगों का मूल उद्देश्य वेदों के सही अर्थबोध, उचित उच्चारण तथा वेदों के याज्ञिक प्रयोग हैं। अर्थबोध के लिए व्याकरण तथा निरुक्त वेदांग अस्तित्व में आए। जबकि सही उच्चारण के लिए शिक्षा तथा छन्द वेदांगों की रचना हुई। जबकि वेदों के याज्ञिक प्रयोग की शुद्धि को सुनिश्चित करने के लिए कल्प तथा ज्योतिष वेदांग का आविर्भाव हुआ। वेदांगों के उद्देश्य का निर्धारण करने के क्रम में आचार्य बलदेव उपाध्याय का विचार अत्यन्त सारगर्भित है। इनके अनुसार- 'मन्त्रों के उचित उच्चारण के लिए शिक्षा का, कर्मकाण्ड और यज्ञीय अनुष्ठान के लिए कल्प का, शब्दों के रूप ज्ञान के लिए व्याकरण का, अर्थज्ञान तथा शब्दों के निर्वचन के निमित्त निरुक्त का, वैदिक छन्दों की जानकारी के लिए छन्द का तथा अनुष्ठानों के उचित काल निर्णय के लिए ज्योतिष का उपयोग है और इनकी उपयोगिता के कारण ये छः वेदांघ माने जाते हैं।'  इन वेदांगों को वेद पुरुष के विभिन्न अवयवों के रूप में स्वीकृति प्रदान की गई इसी सन्दर्भ में पाणिनीय शिक्षा ग्रन्थ वेद पुरुष के पैर के रूप में छन्द, हाथ के रूप में कल्प, तथा कान के रूप में निरुक्त वेदांग की कल्पना करता है। जबकि ज्योतिष, शिक्षा तथा व्याकरण वेदांग को क्रमशः नेत्र, नाक तथा मुख के रूप में स्वीकार किया गया है।
वेदांग ज्योतिष के विभिन्न संस्करण-
      वेदांग ज्योतिष के रचनाकार के रूप में आचार्य लगध का नाम स्मरण किया जाता है।  सामवेद के अतिरिक्त शेष अन्य तीनों वेदों के वेदांग ज्योतिष प्राप्त होते हैं। ऋग्वेद का ‘ऋक्’ या ‘आर्च’ ज्योतिष, यजुर्वेद का ‘याजुष् ज्योतिष’ तथा अथर्ववेद का ‘आथर्वण ज्योतिष’ ग्रन्थ वेदांग के रूप में प्रतिष्ठित है। सामवेद में चूंकि सामों का संकलन है तथा वैदिक कर्मकाण्ड से सम्बन्धित तथ्यों का अभाव है, अतः सामवेद का वेदांग ज्योतिष ग्रन्थ प्राप्त नहीं होता है।
वेदांग ज्योतिष का काल निर्धारण-
         वेदांग होने के कारण निश्चित रूप से वेदांग ज्योतिष के ग्रन्थ काफी प्राचीन प्रतीत होते हैं। इस दिशा में अनेक प्रमाण इनसे सम्बन्धित ग्रन्थों यथा ऋक् ज्योतिष, याजुष् ज्योतिष तथा आथर्वण ज्योतिष में प्राप्त होते हैं। ऋक् ज्योतिष में एक स्थान पर कहा गया है कि युगारम्भ के बाद जब सूर्य व चन्द्रमा एक साथ पुनः श्रविष्ठा अर्थात् धनिष्ठा नक्षत्र के प्रारम्भ में आते हैं उसी क्षण अगले-अगले वर्षों में उत्तरायण होता है जबकि दक्षिणायन का आरम्भ भी इसी तरह श्लेषा के आधे पर आने के समय होता है, जहाँ तक सूर्य के अयनों का सम्बन्ध है, वह सदा माघ व श्रावण मास में ही होता है।  स्पष्ट है कि यहाँ ऋषि धनिष्ठा से उत्तरायणारम्भ कहकर वेदांग ज्योतिष में धनिष्ठा योगतारा की ही बात करते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाय तो जब इस तारे का सायन भोग 9-0°-0' था तब उक्त युगारम्भ हुआ था।  यदि अयन गति को वास्तविक तत्कालीन अयन गति (48") से कुछ अधिक 50" विकला प्रतिवर्ष भी मान लिया जाए तो यह स्थिति कम से कम 1411 ई.पू. तक आता है।  यदि वास्तविक तत्कालीन अयन गति 48" को मानें तो यह समय 1553 ई.पू. आता है।  इसी अयन-चलन को आधार मानकर डॉ. गोरखप्रसाद वेदांग ज्योतिष का काल लगभग 1200 ई.पू. सिद्ध करते हैं।  इस सन्दर्भ में उन्होंने कई पाश्चात्य विद्वानों के भी मतों का उल्लेख किया है और कहा है कि जोन्स और प्रैट ने इसका काल 1181 ई.पू. , डेविस और कोलब्रुक ने 1391 ई.पू. जबकि छोटे लाल बार्हस्पत्य ने इसे 1098 ई.पू. का सिद्ध किया है।  यही कारण है कि विद्वान इस वेदांग ज्योतिष को भारतीय ज्योतिषशास्त्र का सबसे आदिम तथा प्राचीनतम स्वतन्त्र लक्षण ग्रन्थ मानते हैं।  उपरोक्त मत के समर्थक आचार्य बलदेव उपाध्याय ने भी इसका रचनाकाल 1200 ई.पू. ही माना है। शंकर बालकृष्ण दीक्षित महोदय ने भी वेदांग ज्योतिष के काल निर्धारण की दिशा में स्तुत्य प्रयास किया है। उन्होंने पाश्चात्य विद्वान कोलब्रूक महोदय के सिद्धान्तों की आलोचना की है  और इसमें कुछ संशोधन भी प्रस्तुत किए हैं। इनका मत है कि विभागात्मक धनिष्ठा के आरम्भ स्थान से धनिष्ठा की योगतारा 4 अंश 11 कला आगे है और इस मान के सम्पात गति होने में 300 वर्ष लग जाते हैं।  इन्होंने प्रत्यक्ष दिखाई देने वाले धनिष्ठा के चार या पाँच तारों के पास चन्द्र और सूर्य के आने पर ही उत्तरायणारम्भ को स्वीकार किया है।  दीक्षित महोदय ने ईस्वी सन् 1887 में धनिष्ठा के योग तारा एल्फा डेल्फिनी का सूक्ष्म भोग निकाला था जो 10 राशि 15 अंश 48 कला और 29 विकला आया था और 50 विकला की वार्षिक सम्पात गति मानने पर यह वृद्धि कुल 3297 वर्ष में ही संभव होती है। इस तरह उन्होंने ऋक् ज्योतिष का रचनाकाल 3297-1887 = 1410 ई.पू. सिद्ध किया है।  प्रो. ह्विटनी धनिष्ठा के तारों में बीटा डेल्फिनी को योगतारा मानते हैं और उनकी गणना वेदांग ज्योतिष को 72 वर्ष नवीन अर्थात् ई.पू. 1338 की रचना सिद्ध करती है।
कुप्न्ना शास्त्री महोदय  भी याजुष् ज्योतिष के श्लोकों के आधार पर श्रविष्ठा के आरम्भ में दक्षिणायन तथा आश्लेषा के अर्ध या मध्य बिन्दु से उत्तरायण स्वीकार करते हैं। ठीक इसी प्रकार का उल्लेख वराहमिहिर की बृहत्संहिता में भी मिलता है। आचार्य वराह ने अपने समय में उत्तरायण पुनर्वसु के 3/4 तथा दक्षिणायन 1/4 में माना है। इस तरह अयन चलन की सम्पातिक गति 7÷4 या 23°-20’ होती है। आचार्य लगध का समय 72×70÷3 = 1680 वर्ष अर्थात् वराहमिहिर के समय 350 ई. के 1680 वर्ष पूर्व माना जाना चाहिए। इस तरह यह समय 1150 ई.पू.आता है जबकि खण्ड की अपेक्षा तारों का समूह लेने पर यह 3° के भीतर होने के कारण यह समय 1370 ई.पू. हो जाता है। लोकमान्य बालगंगाधर तिलक महोदय वेदांग ज्योतिष को वैदिक कैलेण्डर पद्धति का सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ मानते हैं।  इन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है कि ऋग्वेद में अनेक ऐसे प्रसंग आए हैं जहाँ यज्ञों तथा सम्बन्धित काल विशेष का वर्णन मिलता है और बिना एक मास, पक्ष, ऋतु, वर्ष आदि के ज्ञान के बिना यज्ञ विधि की सम्पूर्णता संभव नहीं है।  इन्होंने वेदांग ज्योतिष का काल 1100 से 1400 ई.पू. स्वीकार किया है।
ऋक् ज्योतिष के श्लोक संख्या 6 के अनुसार माघ मास का प्रारंभ तब होता है जब सूर्य मध्य आश्लेषा में होता है और यह स्थिति वसन्त सम्पात बिन्दु मघा से 1°13' आगे होने पर ही संभव है। 1987 ई. में तत्कालीन वसन्त सम्पात बिन्दु और मघा नक्षत्र के मध्य कोणीय दूरी 60°56' थी और इसमें वेदांग कालीन स्थिति को जोड़ने पर कुल दूरी 60°56'+8°=68°56' होती है। इस तरह वेदांग ज्योतिष का काल 68°56'×72 = 4963 - 1987 = 2976 ई.पू. सिद्ध होता है।  जहाँ तक अन्य शास्त्रकारों द्वारा तुलनात्मक अध्ययन द्वारा इन रचनाओं के काल निर्धारण का प्रश्न है तो आचार्य वराहमिहिर द्वारा अपनी रचना में वेदांग ज्योतिष की अयन सम्बन्धी विचारधारा को प्राचीन शास्त्रों द्वारा उक्त माना है , यह स्थिति वेदांग ज्योतिष को आचार्य वराहमिहिर के काल  अर्थात् शक 427 के पूर्व का सिद्ध करती है। बृहत्संहिता के यशस्वी टीकाकार भट्टोत्पल ने अपनी टीका में ‘पराशर’ के मत का उल्लेख किया है जिसमें वेदांग ज्यातिष प्रोक्त अयन प्रवृत्ति का वर्णन है।  पराशर द्वारा वेदांग ज्योतिष में वर्णित अयन प्रवृत्ति का उल्लेख इस ग्रन्थ को पराशर से पूर्ववर्त्ती सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है। पाणिनि ने अपनी रचना में पराशर का नाम लिया है  और वेदांग ज्योतिष पराशर से पूर्ववर्ती सिद्ध किया जा चुका है अतः ये ग्रन्थ पाणिनि से प्राचीनतर सिद्ध होते हैं। ऋक् ज्योतिष तथा याजुष् ज्योतिष में नक्षत्रों के प्राचीन नामों का ही उल्लेख हुआ है यथा धनिष्ठा के लिए ‘श्रविष्ठा’ , अश्विनी के लिए ‘अश्वयुक्’  तथा शतभिषा के लिए ‘शतभिषक्’ । नक्षत्रों के लिए प्रयुक्त ये संज्ञाएँ भी इन वेदांग ज्योतिष-विषयक ग्रन्थों की प्राचीनता को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है। अपने वर्ण्य-विषय तथा शैली के कारण ‘आथर्वण ज्योतिष’ को ‘ऋक् ज्योतिष’ तथा ‘याजुष्-ज्योतिष’ वेदांगों से अर्वाचीन माना जाता है।  यह अवश्य है कि ‘आथर्वण ज्योतिष’ अन्य वेदांग ज्योतिष ग्रन्थों से नवीन है फिर भी यह पर्याप्त प्राचीन सिद्ध होती है। इसका कारण यह है कि इस ग्रन्थ में मेषादि द्वादश राशियों के नाम उपलब्ध नहीं होते तथा ग्रन्थ का एक श्लोक इसके फलितांश को भृगु के मत से प्रभावित कहता है।  उपरोक्त मतों के आलोक में यह कहा जा सकता है वैज्ञानिक सिद्धान्त अयन-चलन को आधार मानकर सिद्ध किया गया समय ई.पू. 1200 से पूर्व ही वेदांग ज्योतिष विषयक ग्रन्थों का प्रणयन काल मानना उचित होगा।

वैवाहिक समस्याएँ और समाधान(ज्योतिषशास्त्र)

वैवाहिक समस्याओं के लिए मुख्य रूप से विभिन्न ग्रह ही उत्तरदायी हैं। अतः इन ग्रहों के शान्ति हेतु विविध मंत्रों का प्रयोग किया जा सकता है-
 
* सूर्य
तान्त्रिक मन्त्र- 'ऊँ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः'
पौराणिक मन्त्र-'जपाकुसुमसङ्काशं काश्यपेयं महाद्युतिम्।
तमोऽरिं सर्वपापध्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम्।।'
जप संख्या- 7000
रत्न- माणिक्य
* चंद्र
तान्त्रिक मन्त्र- 'ऊँ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः'
पौराणिक मन्त्र- 'दधिशघ्खतुषाराभं क्षीरोदार्णवसम्भवम्।
नमामि शशिनं सोमं शम्भोर्मुकुट भूषणम्।।'
जप संख्या- 11000
रत्न- मोती
* मंगल
तान्त्रिक मन्त्र- 'ऊँ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः'
पौराणिक मन्त्र- 'धरणीगर्भसम्भूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम्।
कुमारं शक्तिहस्तं च मंगलं प्रणमाम्यहम्।।'
जप संख्या- 10,000
रत्न- मूंगा
* बुध
तान्त्रिक मन्त्र- 'ऊँ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः'
पौराणिक मन्त्र- 'प्रियङ्गुकलिकाश्यामं रूपेणाप्रतिमं बुधम्।
सौम्यं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम्।।'
जप संख्या- 9,000
रत्न- पन्ना
* गुरू
तान्त्रिक मन्त्र- 'ऊँ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरूवे नमः'
पौराणिक मन्त्र- 'देवानां च ट्टषीणां च गुरूं कांचनसन्निभम्।
बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम्।।'
जप संख्या- 19,000
रत्न- पुखराज
* शुक्र
तान्त्रिक मन्त्र- 'ऊँ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः'
पौराणिक मन्त्र- 'हिमकुन्द मृणालाभं दैत्यानां परमं गुरूम्।
सर्वशास्त्रप्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम्।।'
जप संख्या- 16,000
रत्न- हीरा
* शनि
तान्त्रिक मन्त्र- 'ऊँ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः'
पौराणिक मन्त्र- 'ऊँ नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।
छाया मार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्।।'
जप संख्या- 23,000
रत्न- नीलम
* राहु
तान्त्रिक मन्त्र- 'ऊँ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः'
पौराणिक मन्त्र- 'ऊँ अर्धकायं महावीर्यं चन्द्रादित्यविमर्दनम्।
सिंहिकागर्भसम्भूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम्।।'
जप संख्या- 18,000
रत्न- गोमेद
* केतु
तान्त्रिक मन्त्र- 'ऊँ प्रां प्रीं प्रौं सः केतवे नमः'
पौराणिक मन्त्र- 'ऊँ पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रहमस्तकम्।
रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम्।।'
जप संख्या-17,000
रत्न- लहसुनिया
वैवाहिक कष्टकारक शनि के उपाय लालकिताब
- सफेदे का पत्ता अपनी जेब में रखें।
- ताँबे, स्टील या लोहे के पात्र में रखा जल पीएँ।
- आटे की गोलियाँ मछलियों को खिलाएँ।
- काले उड़द (400 ग्राम) जल में प्रवाह दें।
- भोजन का पहला ग्रास गाय को दें।
- शनिवार सायंकाल में उड़द दाल की खिचड़ी अवश्य खाएँ।
वैवाहिक विलम्ब व प्रतिबन्ध के उपाय
* अग्नि महापुराण के 18वें अध्याय में वर्णित गौरी प्रतिष्ठा विधि का प्रयोग करें।
* ‘‘ऊँ क्लीं विश्वासुर्नाम गन्धर्वः कन्यानामधिपतिः लभामि देवदत्तां कन्यां सुरूपां सालंकारां तस्मै विश्वावसवे स्वाहा’’।
इस गन्धर्वराज मन्त्र का दस हजार जप करें।
* पुरूषों के शीघ्र विवाह के लिए अधोलिखित मन्त्र का 108 बार जप करे-
‘‘पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्यानुसारिणीम्।
तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्।।
* कनकधारा स्तोत्र का 21 पाठ 90 दिन तक करें।
* श्रीरामदरबार चित्र का पञ्चोपचार पूजन के बाद निम्नलिखित दोहे का 21 बार जप करें-
‘‘तब जनक पाइ वशिष्ठ आयसु ब्याह साज संवारि कै।
मांडवी श्रुतिकीरति उरमिला कुँअरि लई हँकारि कै।।’’
* इस सन्दर्भ में शुक्रवार को किया जानेवाला माँ गौरी का व्रत भी प्रशस्त माना गया है। निराहार व्रत के बाद सायंकाल पंचमुखी दीपक जलाएँ। पुनः अधोलिखित मन्त्र का 108 बार जप करें-
‘‘बालार्कायुतसत्प्रभां करतले लोलाम्बमालाकुलां मालां सन्दधतीं मनोहरतनुं मन्दस्मिताधोमुखीम्।
मन्दं मन्दमुपेयुषीं वरयितुं शम्भुं जगन्मोहिनीं, वन्दे देवमुनीन्द्रवन्दितपदाम् इष्टार्थदां पार्वतीम्।।’’
* वैवाहिक विलम्ब अथवा प्रतिबन्ध योगों में शनि की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अतः ऐसी परिस्थिति में निम्नलिखित मंत्र का प्रयोग शीघ्र ही फल देता है-
‘‘कोणस्थः पिंगलों बभ्रुः कृष्णो रौन्द्रोऽन्तको यमः। सौरिः शनैश्चरो मन्दः पिप्पलाश्रय संस्थितः।।
एतानि शनि-नामानि जपेदश्वत्थसन्निधौ।
शनैश्चरकृता पीड़ा न कदापि भविष्यति।।’’
शनिवार को सायंकाल पीपल वृक्ष के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएँ, और उपरोक्त मन्त्र का 36 बार जप करें।
* योग्य पुरोहित के सन्निध्य में अत्यन्त प्रभावशाली ‘शनि-पाताल क्रिया’ का अनुष्ठान कराएँ।
यदि जन्माङ्ग में मंगल दोष विद्यमान हो और इस कारण से विवाह में विलम्ब हो रहा हो तो अधोलिखित उपाय शीघ्र ही फल प्रदान करते हैं-
मंगल चण्डिका स्तोत्र का 21 पाठ नित्य करें-
‘‘रक्ष रक्ष जगन्मातर्देवि मंगलचण्डिके।
हारिके विपदां राशेः हर्षमंगलकरिके।।
हर्षमंगलदक्षे च हर्षमंगलदायिके।
शुभे मंगलदक्षे च शुभे मंगलचण्डिके।।
मंगले मंगलार्हे च सर्वमंगलमंगले।
सदा मंगलदे देवि सर्वेषां मंगलालये।।’’
- मंगलस्तोत्र का नित्य 21 बार जप करें।
- सौभाग्याष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र का पाठ करें।
- मंगल यन्त्र की विधिपूर्वक स्थापना करें।
- योग्य पुरोहित के द्वारा कन्या का कुंभ अथवा विष्णु विवाह अत्यन्त गोपनीय तरीके से करवाएँ। गोपनीयता ही इस प्रयोग के सफलता की कुञ्जी होती है।
- सौन्दर्य लहरी (श्लोक 1-27) का पाठ करें।
- सावित्री व्रत का सश्रद्धा अनुष्ठान करें।
- सोंठ, सौंफ, मौलसिरी के फूल, सिंगरक, मालकंगनी और लाल चन्दन समभाग लें। इसे जल में मिलाकर मंगलवार को स्नान करें।
- बेल, जटामांसी, लाख के फूल, हिंगलू, बल, चन्दन और मूवला औषधियों को पानी में मिलाकर मंगलवार को स्नान करें।
लाल किताब के उपाय-
* मंगलवार को रेवडि़याँ या बताशे बहते हुए जल में प्रवाहित करें।
* तुलसी के पत्ते व काली मिर्च का सेवन करें।
* मंगलवार को गुड़ व मसूर की दाल अवश्य खाएँ।
* गाय को गुड़ या चीनी मिली रोटियाँ खिलाएँ।
* तन्दूर की मीठी रोटियों का दान करें।
* बन्दरों को जलेबी, शकरपारे आदि खिलाएँ।
वैवाहिक विघटन से बचाव : लाल किताब उपाय
* यदि कन्या के जन्माङ्ग में वैवाहिक विघटन, वैधव्य, पार्थक्य आदि के योग बन रहे हों तो अधोलिखित उपचार करें। विवाहोत्सव में कन्यादान के समय यह प्रयोग करना श्रेयस्कर होता है। जन्माङ्ग में जो ग्रह वैवाहिक कष्ट के लिए उत्तरदायी हो उस ग्रह से संबन्धित रत्न अथवा धातु के बराबर वजन वाले दो टुकड़े लें। कन्यादान का संकल्प लेते समय ये दोनों टुकड़े कन्या के दाहिने हाथ में रखें। कन्यादान तथा विवाह समाप्ति के बाद इनमें से एक टुकड़ा बहते हुए जल में प्रवाहित करें, जबकि दूसरा टुकड़ा अथवा वस्तु कन्या अपने पास आजीवन संभालकर रखे। यह वस्तु जब तक कन्या के पास रहेगी वह तथा उसका वैवाहिक जीवन सुरक्षित रहेगा।
* बुध खाना नं. 12 में हो कर कष्ट उत्पन्न कर रहा हो तो विवाह के समय स्टील के बने बिना जोड़वाले दो छल्ले लें। एक जातक को पहनाएँ तथा दूसरा जल प्रवाह दें।
* शुक्र खाना नं. 4 में रहकर कष्टकारक हो तो स्त्री से चार महीने के अन्दर दुबारा विवाह करें।
* कन्यादान के समय कन्या को चाँदी की ईंट दें।
* बृहस्पति कृत अशुभ से बचाने के लिए कन्या को शुद्ध सोने का सिक्का दें।
* वैवाहिक विघटन से बचने के लिए विवाह के समय ताँबे के बरतन में साबुत हरी मूंग भरें। ढक्कन बंद करें और संकल्पपूर्वक कन्या का भाई अथवा पिता इसे जल प्रवाह दे।
व्रत
* सोलह सोमवार के व्रत निष्ठापूर्वक करें।
* संतोषी माता का व्रत भी इस दृष्टि से आश्चर्यजनक फल देने वाला है।
* वट सावित्री का व्रत करें।
* मंगलागौरी व्रत व पूजन का अनुष्ठान करें।
विशेष उपाय शीघ्र विवाह हेतु (अनुभूत)
काफी उपाय करने के बाद भी यदि कन्या का विवाह न हो रहा हो तो इस प्रयोग को अवश्य करें। किसी भी मंगलवार के दिन कन्या निराहार व्रत करे। पीपल के 108 पत्ते प्रातःकाल तोड़ लाएँ। किसी सिद्ध हनुमान मंदिर में जाकर हनुमान जी के विग्रह के समक्ष बैठ जाएँ। वहीं केसर की स्याही बनाएँ तथा लाल चन्दन की कलम से पीपल के पत्तों पर ‘राम’ लिखें। कन्या मौली ले और इन पत्तों की माला बना लें। फिर हनुमान जी के सामने हाथ जोड़कर कहें- ‘‘मेरा विवाह आप शीघ्र करा दें, अन्यथा आज से 108 वें दिन आकर यही वरमाला आपको पहना दूंगी।’’ इसके बाद कन्या वापस मंदिर से चली जाए और वापस मुड़कर न देखे। इस प्रयोग के बाद कन्या का विवाह अतिशीघ्र हो जाता है।
* शिवरात्रि के दिन जिस मंदिर में शिव पार्वती विवाह का अनुष्ठान हुआ हो। कन्या वहां जाय और विवाह की पूरी विधि को देखे। इस विवाहोत्सव में ‘लाजा’ (खील) भी बिखेरे जाते हैं। कन्या प्रातःकाल मंदिर जाए और वहां से इन खील के 11 दाने चुन कर खा ले। शीघ्र विवाह का योग बनेगा।
* रामचरितमानस के शिव पार्वती विवाह प्रसङ्ग का 11 सोमवार तक सश्रद्धा पाठ करें।
" श्रीरामजानकी के विवाह प्रसङ्ग का पाठ भी आश्चर्यजनक सफलता देता है।
* यदि कालसर्पयोग के कारण विवाह में विलम्ब हो रहा हो तो वैदिक विधि से इस दोष की शान्ति घर में करवाएँ। शुद्ध स्वर्ण के आठ नाग (सवाग्राम प्रति) बनवाकर जल में प्रवाह दें।
वैवाहिक कलहपूर्ण जीवन से मुक्ति
* इन परिस्थितियों को उत्पन्न करने वाले ग्रहों की पहचान योग्य ज्योतिषी से करवाने के बाद उत्तरदायी ग्रहों की शान्ति करवाएँ।
* पति की अवहेलना तथा तिरस्कार से पीडि़त कन्याएँ अधोलिखित मन्त्र का 108 बार जप नित्य करें। आश्चर्यजनक फल शीघ्र ही प्राप्त होंगे-
‘‘अभित्वा मनुजातेन दधामि मम वासना।
यशसो मम केवलो नान्यसा कीर्तयश्चन।।
यथा नकुलो विच्छिद्य संदधात्यहिं पुनः।
एवं कामस्य विच्छिन्नं से धेहि वो यादितिः।।
ऊँ क्लीं त्र्यम्बकम् यजामहे सुगन्धिम् पतिवेदनम्।
उर्वारूकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् क्लीं ऊँ।।’'
संपूर्ण जप काल में घी का दीपक प्रज्जवलित रखें।
शीघ्र फलदायक शाबर मन्त्र
यदि किसी पराई स्त्री अथवा पर पुरूष के कारण वैवाहिक जीवन विषाक्त हो रहा हो तो यह प्रयोग करें-
‘‘ओम् सत्यनाम आदेश गुरू को, लौंग-लौग मेरा भाई, इन्हीं लौंग ने शक्ति चलाई पहली लौंग राती मती, दूजी लौंग जोबन मती, तीजी लौंग अंग मरोड़े, चौथी लाैंग दोऊ कर जोड़े, चारों लौंग जो मेरी खाय---------- के पास से --------------- के पास आ जाय, गुरू की शक्ति मेरी भक्ति, फुरोमन्त्र ईश्वरी वाचा।’’ चार साबुत लौंग लें। उपरोक्त मन्त्र को 108 बार पढ़कर इस लौंग को खिला दें। पहले खाली स्थान में परस्त्री या परपुरूष का नाम हो जबकि दूसरे खाली स्थान में उपासक अपना नाम रखें।
रत्नधारण व रूद्राक्ष
* वैवाहिक विलम्ब के सन्दर्भ में गणेश रूद्राक्ष धारण करना चमत्कारिक फल देता है।
* वैवाहिक सुख हेतु बृहस्पति तथा शुक्र सर्वाधिक महत्वपूर्ण माने जाते हैं। जहाँ वैवाहिक जीवन के आरम्भ हेतु बृहस्पति उत्तरदायी हैं। वहीं शुक्र शय्या सुख व शारीरिक सुख प्रदान करते हैं। इनसे सम्बन्धित शान्ति उपाय सुखद वैवाहिक जीवन की कुञ्जी सिद्ध होती है।
* वैवाहिक विलम्ब व प्रतिबन्ध आदि परिस्थिति में पीला पुखराज (निर्दोष) साढ़े सात रत्ती का लें। स्वर्ण की मुद्रिका में बनवाकर गुरूवार के दिन तर्जनी अंगुली में धारण करें।
* शारीरिक अक्षमता आदि के कारण वैवाहिक जीवन नष्ट हो रहा हो तो हीरा (न्यूनतम एक कैरेट) धारण करेे।
* गौरी शंकर रूद्राक्ष विधि-पूर्वक धारण करने से वैवाहिक जीवन की विसंगतियों का नाश सहज ही हो जाता है।
* जन्माङ्ग में यदि वैधव्य या विधुर होने का योग हो तो एकमुखी रूद्राक्ष स्वर्ण में जड़वाकर धारण करें।
* जीवन संबंधी संकट हो तो महामृत्युञ्जय मंत्र का अनुष्ठान योग्य पुरोहित के निर्देश में करें।

विविध वैवाहिक समस्याएँ एवं ज्योतिषशास्त्रीय निदान

       स्त्री तथा पुरूष के मध्य का आकर्षण, प्रेम, स्नेह तथा रागात्मक सम्बन्ध सृष्टि के आरम्भ से लेकर आज तक विद्यमान है। इसी रागात्मक आकर्षण को विवाह नामक संस्था के उदय का कारण माना जाता रहा है। स्त्री-पुरूष के मध्य संपर्क तथा शारीरिक निकटता तो आदि काल से ही अस्तित्व में था, परन्तु इस  संबध को मर्यादित रखना ही विवाह का मूल उद्देश्य है। जहां आरम्भ में विवाह हेतु कोई आयु सीमा नहीं थी, वहीं कालान्तर में विवाह के लिए स्त्री तथा पुरूष की आयु का निर्धारण किया गया। यह निर्धारण राजकीय या शासकीय न होकर सामाजिक था। वैवाहिक आयु-सीमा का यह सामाजिक निर्धारण आज भी देखा जा सकता है। क्षेत्र-जाति-समूह आदि के आधार पर इसमें विविधता भी है। प्रत्येक माता-पिता अपनी संतति के विवाह के विषय में काफी सजग रहते हैं। परन्तु काफी प्रयास के बाद भी जब सभी योग्यताओं से पूर्ण पुत्र अथवा पुत्री के विवाह की संभावना क्षीण होने लगती है, तब उस अभिभावक तथा उनकी संतति को होने वाली पीड़ा का अनुमान लगा पाना भी दुष्कर होता है। जबकि कुछ परिस्थितियों में यह देखा गया है कि विवाह तो बड़ी शीघ्रतापूर्वक और सहजता से हो गया, परन्तु विवाह के बाद नवविवाहित दम्पत्ति का जीवन कष्टप्रद तथा कलहपूर्ण हो जाता है। विवाह से जुड़ी इन समस्त समस्याओं को हम वैवाहिक विलम्ब, विवाह प्रतिबन्ध, वैवाहिक कलह, तलाक, वैधव्य-विधुरता आदि में विभाजित कर सकते हैं। मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन ग्रह-योगों से ही निर्धारित होता है, अतः इन दुःखद तथा कष्टप्रद परिस्थितियों के लिए भी विभिन्न ग्रहयोगों को ही उत्तरदायी मानना होगा। संतोष का विषय यह है कि इन समस्याओं के ज्योतिषीय समाधान (वैदिक, तांत्रिक, मंत्र, यंत्र, व्रत, रूद्राक्ष, रत्न, लाल किताब के उपाय, घरेलू टोटके) भी उपलब्ध हैं। किसी भी समस्या से मुक्ति के लिए यह आवश्यक है कि समस्या के मूल कारण को समझा जाय और फिर उसे दूर करने के उपाय किए जाएँ। इस सन्दर्भ में भी हमें इसी प्रक्रिया का आश्रय लेना होगा। विवाह से जुड़ी अलग-अलग समस्याओं के लिए विभिन्न ग्रहस्थितियाँ या ग्रहयोग उत्तरदायी होते हैं। अतः आवश्यक यह है कि पहले इन समस्याओं के कारणों का अन्वेषण किया जाय और फिर उनसे मुक्ति के उपायों पर दृष्टिपात किया जाय।

वैवाहिक विलम्ब के लिए उत्तरदायी ज्योतिषीय ग्रहयोग- जन्मपत्रिका के विभिन्न भावों के साथ-साथ, भावों के आधिपति ग्रह तथा उनका अन्य ग्रहों के साथ सम्बन्ध आदि कारक ही इस समस्या के जनक माने जा सकते हैं। कुछ ऐसे ही ग्रहयोग निम्नलिखित हैं-
* जन्मांग में मंगलीक दोष की उपस्थिति। अर्थात् लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम तथा द्वादश भाव में मंगल हो।
* सप्तम भाव अथवा सप्तमेश से शनि का सम्बन्ध हो।
* सूर्य लग्न अथवा सप्तम भाव में हो।
ऽ जन्मांग में कालसर्पयोग की उपस्थिति विवाह में पर्याप्त विलम्ब का कारण बनती है।
* शुक्र द्वितीय भाव में हो तथा द्वितीयेश मंगल के प्रभाव में हो।
* शनि सूर्य के साथ युति या दृष्टि सम्बन्ध बना रहा हो।
* शनि यदि उच्चस्थ हो पर लग्नेश या योगकारक न हो।
* मंगल तथा शुक्र साथ हो तथा इस पर शनि की दृष्टि हो।
* शुक्र चतुर्थ भाव में हो तथा बुध षष्ठस्थ हो।
* सूर्य तथा शनि सम सप्तक में हों।
* नवमेश तृतीय भाव में हो तथा सप्तमेश नवम भाव में हो।
* चन्द्र तथा शुक्र एक साथ हों अथवा परस्पर सप्तम भाव में हों।
* शनि वक्री हो तथा चतुर्थेश अथवा सप्तमेश होकर पाप प्रभाव में हो।
* वक्री शनि का प्रभाव द्वितीय भाव, द्वितीयेश, सप्तम भाव अथवा सप्तमेश पर हो।
* सूर्य शुक्र की राशियों (वृष, तुला) में हो तथा शुक्र सिंह राशि में हो।
* चन्द्रमा और शनि एक दूसरे की राशियों या समसप्तक में हों।
* सप्तम भाव में कर्क राशि हो और वहां शनि और चन्द्र के मध्य युति सम्बन्ध हो।
* शनि एवं मंगल एक दूसरे को पूर्ण दृष्टि से देख रहे हों अथवा उनमें राशि विनिमय हों।
* सप्तमेश वक्री होकर द्वितीय भावस्थ हो तथा शनि से दृष्ट हो।
* अष्टम भाव की नवांश राशि सप्तम भाव में हो और लग्न नवांश राशि में शुक्र हो।
* शुक्र पंचम भाव में हो और चतुर्थ भाव में राहु हो।
* राहु तथा केतु क्रमशः लग्न-सप्तम, द्वितीय-अष्टम अथवा पंचम-एकादश भाव में हो।
* सप्तम भाव पर वक्री ग्रहों का प्रभाव हो।
* जन्मलग्न तथा नवांश दोनों में ही बृहस्पति शनि से दृष्ट हो।
* बृहस्पति यदि शनि की राशियों में हो, विशेष रूप से कुंभ में।
* शुक्र तथा सप्तमेश पर शनि दृष्टिपात कर रहा हो।

विवाह प्रतिबन्धक योग- ज्योतिषशास्त्र के विभिन्न ग्रन्थों में ऐसे ग्रहयोगों के भी वर्णन मिल जाते हैं, जिनके कारण जातक अथवा जातिका का विवाह आजीवन नहीं हो पाता है। कुछ ऐसे ही ग्रहयोग द्रष्टव्य हैं-
* शनि तथा सूर्य, लग्न या सप्तम भाव में स्थित हों तथा इन दोनों ग्रहों के अंश भी समान हों।
* शनि तथा सूर्य का शुक्र के साथ युति संबंध हो अथवा शुक्र पर शनि तथा सूर्य दृष्टिपात कर रहे हों।
* द्वितीय, सप्तम तथा द्वादश भाव पाप पीडि़त हों।
* शनि लाभेश हाें तथा वक्री होकर सप्तम अथवा नवम भाव में स्थित हों।
* चन्द्र व शुक्र एक ही राशि में हो तथा इन ग्रहों पर शनि तथा मंगल की दृष्टि हो।
* शनि सूर्य की राशि में हों तथा सूर्य शनि की राशियों में हो।
* शुक्र सिंह या तुला राशि में हों तथा इसके द्वितीय तथा द्वादश भाव में शनि हो।
* सूर्य और शुक्र के मध्य 43 अंश तथा 20 कला से अधिक का अन्तर हो।
* द्वितीयेश, नवमेश, चतुर्थेश और सप्तमे में से जितने अधिक ग्रह बन्ध्या राशियों (मिथुन, सिंह, कन्या) में हों, विवाह की संभावना उतनी ही क्षीण होती जाती है।
* चन्द्रमा और शुक्र यदि एक दूसरे की राशि में स्थित हों, साथ ही पाप प्रभाव से युक्त हो, विशेष रूप से राहु तथा केतु।
* चन्द्रमा अथवा शुक्र यदि सप्तम अथवा लग्न भाव के अधिपति होकर बन्ध्या राशियों में स्थित हों।
* मंगल और शनि समान अंशों में हों और ये लग्नेश तथा सप्तमेश में भी हो।
कलहपूर्ण वैवाहिक जीवन- कुछ घटनाओं में देखा गया है कि विवाह के कुछ समय बाद ही पति पत्नी के मध्य लड़ाई-झगड़े, वैमनस्य आदि की अधिकता हो जाती है। वैसे कुछ सीमा तक यह सामान्य घटना ही है, परन्तु जब इस प्रकार के घटनाओं की पुनरावृत्ति होने लगती है तो दोनों का जीवन नरक के समान हो जाता है। कुछ ऐसे ही ग्रहयोग सूचीबद्ध किए जा रहे हैं-
* सप्तम में मंगल की राशि हो तथा मंगल का संबंध केतु से बन रहा हो तो दम्पत्ति कलहपूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं।
* मंगल यदि पृथिवी तत्व राशियों (वृष, कन्या, मकर) में हो।
* सप्तमस्थ मंगल पर शनि या राहु का प्रभाव हो।
* जन्मांग में गुरू वक्री हों साथ ही वक्री शनि के साथ कोई संबंध भी हो।
* लग्न में एक शुभ तथा एक अशुभ ग्रह हों।
* मंगल के साथ शनि लग्न, सप्तम, अष्टम या दशम स्थान में हों।
* लग्न में सिंह राशि हो तथा शनि सप्तमेश होकर द्वितीय भाव में स्थित हों।
* पंचमेश सप्तम भाव में तथा सप्तमेश पाप प्रभाव में हों तो पति-पत्नी एक दूसरे पर शक करते हैं।
* सप्तम भाव में सूर्य तथा राहु स्थित हों।
* सप्तम भाव में सूर्य तथा मंगल एक साथ हों।
* सप्तम भाव का आधिपति पंचम भाव में हों तथा सप्तमेश व पंचमेश पाप प्रभाव में हो तो जातक की स्त्री बहुधा अपने पिता के पास ही रहती है।
* सप्तमेश निर्बल हो तथा एकादश भाव का स्वामी सप्तम भाव में पाप ग्रहों के प्रभाव में हो।
* क्रूर ग्रह षष्ठेश होकर सप्तम भाव में हों तो ऐसे जातक की पत्नी झगड़ालू स्वभाव की होती है।
* शुक्र आर्द्रा, मूल, ज्येष्ठा अथवा कृत्तिका नक्षत्र में हों।
* राहु का बुध के साथ सम्बन्ध हो।
* यदि स्त्री के जन्मांग में नवमेश अथवा दशमेश नीच राशि में हो अथवा शत्रु राशियों में हो तो सास, ननद आदि से कष्ट।
* बृहस्पति राहु के साथ हो तो स्त्री से अलगाव।
* सप्तम भाव में शनि हो तो स्त्री झगड़ालू होती है।
* सप्तमेश पाप ग्रहों के नवांश में हो।
* सप्तमेश क्रूर षष्ठ्यंश में हो।
* चन्द्रमा सप्तमेश हो और पाप ग्रह के नवांश या पाप प्रभाव में हो।
* शनि, मंगल और राहु यदि सप्तम भाव में स्थित हो तो प्रेतजन्य पीड़ा के कारण वैवाहिक जीवन का विनाश हो जाता है।


वैवाहिक पार्थक्य (तलाक)- कुछ ग्रहस्थितियों के कारण पति-पत्नी आपसी सहमति से अलग हो जाते हैं अथवा कानूनन तलाक ले लेते हैं। ऐसी परिस्थितियों का निर्माण करने वाले ग्रहयोग निम्नलिखित हैं-
* सप्तमेश द्वादश भाव में द्वादशेश के साथ हो।
* द्वादशेश सप्तम भाव में सप्तमेश के साथ हो।
* द्वादशेश व सप्तमेश पंचम भाव में हो तथा पंचमेश का सम्बन्ध राहु तथा केतु के साथ हो।
* राहु और शनि लग्न या सप्तम भाव में एक साथ स्थित हों।
* अकेला सप्तमस्थ सूर्य भी वैवाहिक पार्थक्य कराने में सक्षम है।
* षष्ठेश अष्टम भाव में हो तथा सप्तमेश षष्ठ भाव में हो।
* सूर्य व चन्द्र एक साथ सप्तम भाव में हो।
* सूर्य, शुक्र व बुध एक साथ चतुर्थ भाव में हो तो पति-पत्नी अलग रहते हैं।
* अष्टम भाव में कोई भी शुभ ग्रह शनि या मंगल की राशि में हो।
* शुक्र व मंगल के मध्य राशि या नवांश परिवर्तन हो।
* सप्तमेश द्वादश भाव में हो तथा राहु लग्नस्थ हो।
* शुक्र बुध के साथ अष्टम भाव में हो।
* लग्नेश व सप्तमेश की द्वि-द्वादश स्थिति हो।
* शुक्र यदि आर्द्रा, मूल, कृत्तिका अथवा ज्येष्ठा नक्षत्र में हो।
वैधव्य/विधुर योग- जन्मांग में उपस्थित कुछ ग्रहयोग के कारण जीवन साथी की मृत्यु भी हो सकती है। कुछ ऐसे ही योग-
* शुक्र से चतुर्थ या अष्टम भाव पाप प्रभाव में हो तो जातक अपनी पत्नी को जलाकर मार देता है।
* द्वादश भाव में चन्द्रमा और सप्तम भाव में शुक्र स्थित हो तो भी जातक अपनी पत्नी की हत्या कर देता है।
* पाप ग्रहों के मध्य यदि शुक्र स्थित हो तो जातक की पत्नी की मृत्यु ऊँचाई से गिरकर होती है।
* पाप ग्रहों के मध्यस्थ शुक्र यदि अष्टम भावगत हो अथवा चतुर्थ भावगत हो तो जातक के पत्नी की मृत्यु फाँसी से होती है।
* ऐसा शुक्र यदि शुभ ग्रहों से युत अथवा दृष्ट न हो तो भी पत्नी का निधन फाँसी से होता है।
* पंचमेश सप्तमभाव में स्थित हो, सप्तमेश पाप ग्रहों से युत हो तथा शुक्र निर्बल हो तो गर्भ के कारण स्त्री की मृत्यु होती है।
* 'सारावली' के अनुसार अष्टमस्थ क्रूर ग्रह वैधव्य देते हैं।
* शुक्र नीच राशिस्थ हो या फिर चन्द्रमा नीच राशि में स्थित हो तो जातक की पत्नी की मृत्यु जल में डूूबने से होती है।
* यदि सप्तमेश पाप द्रेष्काण, भुजंग द्रेष्काण में हो पत्नी की मृत्यु फाँसी लगाकर होती है।
* सप्तमेश राहु तथा मान्दि के साथ हो तो पत्नी की मृत्यु विषभक्षण से होती है।
* यदि सप्तमेश शनि एवं मंगल के साथ हो अथवा क्रूर षष्ट्यंश में हो तो स्त्री की मृत्यु।
* यदि सप्तम भाव तथा सप्तमेश पाप ग्रहों के मध्य हों तो पत्नी का मरण होता है।
* सप्तमेश तथा बुध दोनों पापग्रहों के साथ नीच राशि, शत्रुक्षेत्री या अस्त होकर आठवें या बारहवें भाव में हो या पाप प्रभाव में हो तो ऐसी कन्या पति को मारने वाली होती है।
* सप्तमेश यदि अष्टम भाव में हो तो जीवनसाथी की मृत्यु होती है।
* चन्द्र से षष्ठ भाव में शनि, सातवें में राहु तथा आठवें में मंगल हो तो भी जीवनसाथी का मरण।
* सप्तमेश तथा अष्टमेश में युति सम्बन्ध हो तथा ये पाप प्रभाव में भी हों।
* दो या तीन पापग्रहों के साथ मंगल अष्टम भाव में हों।
* सप्तमेश बुध यदि नीचस्थ तथा पापप्रभाव में आकर अष्टम भाव में स्थित हो तो स्त्री पति की हत्या करने वाली होती है।
* षष्ठेश एवं अष्टमेश पापग्रहों के साथ षष्ठ या अष्टम स्थान में हों, तो युवावस्था में ही वैधव्य।
* सप्तमेश एवं द्वितीयेश राहु या केतु के साथ स्थित हों तथा शनि से दृष्ट हों तो पत्नी की मृत्यु शीघ्र।